मध्य प्रदेश
2 घंटे पहले
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विचारों
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को रद्द किए जाने का मामला इन दिनों चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देने के बजाय पार्टी को सलाह दी है कि वह हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल करे। दरअसल यह पूरा मामला चुनाव याचिका से जुड़ा है, जिसमें संभावना है कि कांग्रेस अपने प्रत्याशी का नामांकन रद्द करने के आदेश को चुनौती देने के साथ-साथ भाजपा उम्मीदवारों के निर्विरोध निर्वाचन पर भी आपत्ति दर्ज कराएगी।
कांग्रेस का पक्ष
कांग्रेस प्रवक्ता भूपेंद्र गुप्ता का कहना है कि नामांकन रद्द होने का यह मामला अब संवैधानिक स्वरूप ले चुका है। उनके मुताबिक एक फोटो कॉपी के आधार पर नामांकन निरस्त कर दिया गया, जबकि रिटर्निंग अधिकारी को ऐसा करने का अधिकार ही नहीं था। वह अपनी सिफारिश आयोग को भेज सकता था और इस पर निर्णय आयोग को लेना था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
उनका दूसरा तर्क यह है कि जो मामला किसी अदालत में विचाराधीन ही नहीं था, उसे आधार बना लिया गया। पार्टी ने इन दोनों बिंदुओं को लेकर जनता के बीच जाने की भी तैयारी कर ली है। कांग्रेस 45 दिनों के भीतर हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल करेगी।
क्या होती है चुनाव याचिका
भारतीय चुनाव प्रक्रिया में चुनाव परिणाम या चुनाव से जुड़े किसी विवाद—जैसे नामांकन का रद्द होना, भ्रष्टाचार या कदाचार—को चुनौती देने का कानूनी रास्ता चुनाव याचिका है। यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) के तहत दायर की जाती है।
कानूनी जानकारों के अनुसार संविधान का अनुच्छेद 329 कहता है कि संसद या राज्य विधानमंडल के चुनाव को केवल चुनाव याचिका के जरिए ही चुनौती दी जा सकती है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान सामान्य रिट याचिका (Writ Petition) के माध्यम से हस्तक्षेप संभव नहीं है। RPA 1951 की धारा 80 से 100 में इससे संबंधित प्रावधान दिए गए हैं, जिसमें उच्च न्यायालय को मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) प्राप्त है। राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति चुनाव जैसे कुछ विशेष मामलों को छोड़कर यह याचिका सीधे सुप्रीम कोर्ट में दायर नहीं की जा सकती।
कौन दायर कर सकता है याचिका
- कोई भी उम्मीदवार, जो उस चुनाव में खड़ा था।
- कोई भी निर्वाचक (Elector), यानी ऐसा व्यक्ति जो उस चुनाव में मतदान करने का हकदार था—चाहे उसने वोट डाला हो या नहीं।
- राजनीतिक दल भी अपने उम्मीदवार के माध्यम से याचिका दायर कर सकता है।
समय सीमा क्या है
चुनाव परिणाम घोषित होने की तारीख से 45 दिनों के भीतर याचिका दायर करनी होती है। नामांकन रद्द होने या अन्य पूर्व-चुनाव मुद्दों के मामले में भी आमतौर पर याचिका परिणाम की घोषणा के बाद ही दाखिल की जाती है। तय समय सीमा बीत जाने पर याचिका खारिज हो सकती है।
मीनाक्षी नटराजन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नामांकन रद्द करने को चुनौती देने वाली रिट याचिका खारिज कर दी और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दायर करने की सलाह दी, क्योंकि चुनाव प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और इसमें भाजपा उम्मीदवार निर्विरोध चुने जा चुके हैं।
कहां दायर होती है याचिका
चुनाव याचिका संबंधित राज्य के हाईकोर्ट में दायर की जाती है, जहां मुख्य न्यायाधीश सुनवाई के लिए एक या एक से अधिक न्यायाधीशों को नियुक्त करते हैं। आमतौर पर इसकी सुनवाई एकल पीठ करती है।
किन आधारों पर दी जा सकती है चुनौती
धारा 100 और 101 के तहत चुनाव याचिका मुख्यतः इन आधारों पर दायर की जा सकती है:
- नामांकन को गलत तरीके से स्वीकार या अस्वीकार करना, जैसा मीनाक्षी नटराजन मामले में हुआ।
- भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practices)—जैसे रिश्वत, धमकी, जाति या धर्म के आधार पर अपील, फर्जी वोटिंग आदि (धारा 123)।
- अयोग्य उम्मीदवार का चुनाव जीतना।
- मतदान या मतगणना में गड़बड़ी।
- अन्य अवैध प्रभाव या प्रक्रिया का उल्लंघन।
- चुनाव को शून्य (Void) घोषित कराने या नया चुनाव कराने की मांग।
याचिका में क्या होना जरूरी है
धारा 83 के अनुसार याचिका में सामग्री तथ्य (Material Facts) यानी स्पष्ट और विस्तृत आरोप तथा सबूत होने चाहिए, साथ ही दस्तावेज और गवाह जैसे साक्ष्य भी जरूरी हैं। याचिका में राहत (Relief) की मांग की जाती है, जैसे—
- चुनाव को शून्य घोषित करना।
- याचिकाकर्ता को विजयी घोषित करना।
- नया चुनाव कराना।
कैसी होती है ट्रायल प्रक्रिया
याचिका दायर करने के बाद जिसे चुनौती दी गई है, उस विपक्षी को नोटिस दिया जाता है और उससे लिखित जवाब (Written Statement) मांगा जाता है। इसके बाद दस्तावेजों की खोज (Discovery) और जांच (Inspection), मुद्दों का निर्धारण (Framing of Issues), गवाहों की परीक्षा और बहस होती है, और अंत में उच्च न्यायालय अपना फैसला सुनाता है।
RPA की धारा 86(7) के तहत प्रयास किया जाता है कि फैसला 6 महीने के भीतर हो जाए, लेकिन व्यवहार में कई मामले वर्षों तक खिंचते हैं। फैसले के बाद धारा 116A के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।
चुनाव याचिका भले ही सिविल मुकदमे की तरह चलती है, लेकिन इसमें सार्वजनिक हित (Public Interest) भी जुड़ा रहता है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के अनुसार फैसला केवल रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर ही होना चाहिए। यदि याचिका में लगाए गए आरोप अस्पष्ट या निराधार हों, तो उसे खारिज किया जा सकता है।
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