राजस्थान
एक घंटा पहले
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पक्षियों के स्वर्ग के रूप में पहचाने जाने वाले केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान पर इन दिनों एक ऐसा संकट गहराता जा रहा है, जो सीधे आंखों से भले ही दिखाई न दे, लेकिन उद्यान के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को भीतर ही भीतर कमजोर कर रहा है। यह खतरा है अफ्रीकन कैटफिश का, जिसे आमतौर पर मांगुर के नाम से जाना जाता है। इस मछली का बढ़ता फैलाव उद्यान के लिए चिंता का बड़ा कारण बन गया है।
जलीय जीवन पर बढ़ता दबाव
मांगुर मछली न सिर्फ जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि उन प्रवासी पक्षियों के भोजन पर भी असर डाल रही है जो हर साल यहां पहुंचते हैं। तालाबों और जलाशयों में इस प्रजाति की मौजूदगी से छोटी मछलियों की संख्या लगातार घट रही है, जो पक्षियों के आहार का अहम हिस्सा हैं।
आक्रामक प्रजाति बनी चुनौती
डीएफओ चेतन कुमार के मुताबिक, अफ्रीकन कैटफिश एक बेहद आक्रामक प्रजाति है, जो बहुत तेजी से अपना विस्तार करती है और दूसरी छोटी मछलियों की आबादी को कम कर देती है। यही कारण है कि यह मछली उद्यान की प्राकृतिक खाद्य शृंखला के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है।
हर साल चलता है विशेष अभियान
इस समस्या से निपटने के लिए वन विभाग हर वर्ष विशेष अभियान चलाकर इन मछलियों को पकड़ता है। हालांकि इनकी प्रजनन क्षमता इतनी तेज है कि अभियानों के बावजूद इस मुसीबत को पूरी तरह खत्म कर पाना संभव नहीं हो पा रहा है। बार-बार प्रयास के बाद भी इनकी संख्या पर पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सका है।
जैव विविधता पर खतरा
लगातार बढ़ते इस फैलाव के चलते केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की जैव विविधता पर खतरा मंडरा रहा है। यदि समय रहते इस आक्रामक प्रजाति पर ठोस नियंत्रण नहीं किया गया, तो उद्यान के नाजुक पारिस्थितिकी संतुलन को दीर्घकालिक नुकसान पहुंच सकता है।
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