बिहार
3 घंटे पहले
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बिहार के बेगूसराय के चकिया थाना क्षेत्र में 11 जून को हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। इस जघन्य वारदात के कई दिन बाद भी पांचों आरोपी फरार हैं और पुलिस के हाथ खाली हैं। एक तरफ प्रशासन छापेमारी के दावे कर रहा है, दूसरी तरफ पुलिस की संवेदनहीनता के एक के बाद एक चौंकाने वाले आरोप सामने आ रहे हैं।
तीन महीने पहले भी हुई थी शिकायत, पुलिस ने नहीं सुनी
यह मामला इसलिए और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि करीब तीन महीने पहले भी इसी महिला के साथ दुष्कर्म का प्रयास हो चुका था। उस वक्त पीड़िता खुद चकिया थाने पहुंचकर मौखिक शिकायत दे चुकी थी, लेकिन आरोप है कि पुलिस ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अगर तब उसकी बात गंभीरता से सुनी जाती, तो शायद 11 जून की यह घटना टाली जा सकती थी।
थाने पहुंची पीड़िता को डांटकर भगाया
11 जून को पांच दरिंदों ने महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इसके बाद जब पीड़िता न्याय की उम्मीद लेकर चकिया थाने पहुंची, तो आरोप है कि वहां मौजूद पुलिस पदाधिकारी ने उसकी बात सुनने के बजाय उसे डांट-फटकार कर भगा दिया। न पीड़िता का दर्द समझा गया और न ही आरोपियों के खिलाफ कानून के मुताबिक कोई कार्रवाई की गई।
जब मीडिया ने इस मामले को लगातार उठाया, तब बेगूसराय-खगड़िया रेंज के DIG Shailesh Kumar Sinha ने चकिया थानाध्यक्ष को निलंबित किया।
BJP नेता का दावा: यह तीसरी बड़ी वारदात है
BJP नेता एवं पूर्व सांसद प्रतिनिधि Amarendra Kumar Amar ने घटनास्थल का दौरा करने के बाद आरोप लगाया कि यह उस महिला के साथ तीसरी बड़ी घटना है।
- पहले उसके साथ दुष्कर्म का प्रयास किया गया।
- फिर लूटपाट की वारदात हुई।
- और अब सामूहिक दुष्कर्म जैसी जघन्य घटना को अंजाम दिया गया।
Amarendra Kumar Amar के इस बयान से पुलिस के 'पीपुल्स फ्रेंडली' होने के दावों की जमीनी हकीकत खुलकर सामने आ जाती है।
SP तक गई फरियाद, वहां से भी नहीं मिला न्याय
सूत्रों के मुताबिक, महिला ने जिले के पुलिस कप्तान तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन वहां से भी उसे राहत नहीं मिली। इसके अलावा आरोप है कि दुष्कर्म के बाद दरिंदों ने महिला के प्राइवेट पार्ट में 9 एमएम की बुलेट और लकड़ी के टुकड़े डाल दिए, जिससे उसकी हालत बेहद गंभीर हो गई।
सदर अस्पताल में भी नहीं मिली बुनियादी सुविधा
जब महिला की हालत और बिगड़ी तो परिजन उसे सदर अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन वहां भी व्यवस्था की पोल खुल गई। पीड़िता को स्ट्रेचर तक नसीब नहीं हुआ, न ही कोई अन्य सुविधा दी गई। परिजनों को मजबूरन उसे कंधे पर उठाकर अस्पताल के अंदर ले जाना पड़ा। अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मियों ने भी कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। फिलहाल महिला सदर अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है।
दावे बड़े, नतीजा अब भी शून्य
प्रशासन लगातार कार्रवाई और छापेमारी की बातें कर रहा है, लेकिन सच यह है कि घटना के कई दिन बाद भी सभी आरोपी फरार हैं। पीड़ित परिवार न्याय का इंतजार कर रहा है। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने जांच में दोषी पाए जाने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिया है, लेकिन यह भरोसा कितना कारगर साबित होगा, यह देखना अभी बाकी है।
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