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5 घंटे पहले
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रतन टाटा के निधन के बाद देश के सबसे प्रभावशाली परोपकारी संस्थानों में गिने जाने वाले टाटा ट्रस्ट्स की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। पूर्व ट्रस्टी मेहली मिस्त्री ने महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर के समक्ष याचिका दाखिल कर अपने कार्यकाल को आगे न बढ़ाए जाने के फैसले को चुनौती दी है। इसके साथ ही उन्होंने निर्णय लेने की प्रक्रिया, हितों के टकराव और पारदर्शिता को लेकर कई गंभीर प्रश्न उठाए हैं, जिससे ट्रस्ट के कामकाज पर नई बहस छिड़ने की संभावना बन गई है।
मुंबई से सामने आई इस घटना में रतन टाटा के निधन के पश्चात नेतृत्व और प्रशासन से जुड़े जो फैसले लिए गए, वे अब जांच के दायरे में आते दिख रहे हैं। मिस्त्री ने चैरिटी कमिश्नर के पास दाखिल एक विस्तृत आपत्ति में आरोप लगाया है कि उनके ट्रस्टी पद का नवीनीकरण नहीं किया गया, जबकि इससे पहले ट्रस्ट के भीतर निरंतरता बनाए रखने पर सहमति बन चुकी थी। उनका कहना है कि यह निर्णय अचानक लिया गया और पहले की सहमति की भावना के विपरीत था।
ट्रस्टी पद के नवीनीकरण पर आपत्ति
मेहली मिस्त्री ने अपनी याचिका में दावा किया है कि अक्टूबर 2024 में ट्रस्टियों ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया था, जिसका मकसद ट्रस्ट के प्रशासन में स्थिरता और निरंतरता बनाए रखना था। उनके अनुसार, इसी समझ के तहत मौजूदा ट्रस्टियों के कार्यकाल को आगे बढ़ाने का समर्थन किया गया था। हालांकि जब बात उनके अपने मामले की आई, तो यही सिद्धांत लागू नहीं किया गया।
मिस्त्री का आरोप है कि उनके कार्यकाल को आगे न बढ़ाने का फैसला मनमाने ढंग से लिया गया और इससे ट्रस्ट के भीतर समानता तथा पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े होते हैं।
गवर्नेंस और हितों के टकराव पर सवाल
याचिका में केवल नियुक्तियों का मसला ही नहीं, बल्कि ट्रस्ट की पूरी गवर्नेंस व्यवस्था को भी कठघरे में रखा गया है। मिस्त्री ने आरोप लगाया है कि कुछ ट्रस्टियों को टाटा समूह की कंपनियों से वित्तीय लाभ मिला, जबकि वे एक ही समय में ट्रस्टी और नामित निदेशक की भूमिका भी निभा रहे थे।
उनका कहना है कि ऐसे मामलों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं हितों का टकराव तो नहीं हुआ। मिस्त्री ने यह भी रेखांकित किया कि ट्रस्टियों का पहला दायित्व ट्रस्ट और उसके उद्देश्यों के प्रति होना चाहिए।
टाटा समूह से जुड़े वित्तीय लेनदेन का उल्लेख
याचिका में कुछ विशिष्ट वित्तीय व्यवस्थाओं का भी जिक्र किया गया है। मिस्त्री का आरोप है कि कुछ ट्रस्टियों को वर्षों के दौरान टाटा समूह की विभिन्न कंपनियों से पारिश्रमिक और कमीशन प्राप्त हुआ। उनका तर्क है कि इन भुगतानों और ट्रस्ट में निभाई जा रही भूमिकाओं के बीच संभावित हितों के टकराव की पड़ताल होनी चाहिए।
हालांकि ये सभी आरोप फिलहाल केवल याचिका का हिस्सा हैं और इन पर किसी सक्षम प्राधिकरण द्वारा अब तक कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है।
टाटा संस से जुड़े फैसलों पर भी सवाल
अपनी आपत्ति में मेहली मिस्त्री ने टाटा संस से जुड़े कुछ अहम फैसलों का भी उल्लेख किया है। उन्होंने दावा किया कि कुछ महत्वपूर्ण निर्णय पर्याप्त चर्चा और पारदर्शिता के बिना लिए गए। याचिका के अनुसार, जुलाई 2025 में टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल विस्तार के समर्थन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ था, परंतु बाद में उठाए गए कुछ कदम उस रुख से अलग प्रतीत हुए।
इसके अतिरिक्त, टाटा संस को गैर-सूचीबद्ध कंपनी बनाए रखने और अल्पांश शेयरधारकों के लिए वैकल्पिक समाधान तलाशने से संबंधित प्रस्तावों का भी इसमें जिक्र किया गया है।
स्वतंत्र निगरानी की मांग
इस पूरे विवाद के बीच मेहली मिस्त्री ने चैरिटी कमिश्नर से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने ट्रस्टियों के आचरण, संभावित हितों के टकराव और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जांच कराने का अनुरोध किया है। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया है कि जब तक इन मुद्दों का समाधान नहीं हो जाता, तब तक ट्रस्ट के कामकाज की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र प्रशासक नियुक्त किया जाए।
फिलहाल याचिका में लगाए गए सभी आरोप केवल दावे हैं और इन पर अब तक कोई न्यायिक या प्रशासनिक फैसला नहीं आया है। वहीं इस मामले पर टाटा ट्रस्ट्स अथवा संबंधित ट्रस्टियों की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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