पुरी से बस्तर तक कैसे पहुंची रथयात्रा की परंपरा? 16 पहियों वाले रथ से जुड़ा गोंचा पर्व का इतिहास छत्तीसगढ़ एक महीने पहले 55
छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाया जाने वाला गोंचा पर्व 600 साल से भी अधिक पुरानी परंपरा है, जिसकी शुरुआत पुरी के 16 पहियों वाले रथ से मानी जाती है।

गोंचा पर्व और बस्तर का अनोखा रिश्ता

ओडिशा के पुरी की तर्ज पर छत्तीसगढ़ के बस्तर में हर साल उत्साह के साथ गोंचा पर्व मनाया जाता है। इस साल भी बस्तर में यह भव्य आयोजन संपन्न हुआ, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों की परिक्रमा कराई गई। बस्तर में रथयात्रा की अपनी एक विशेष पहचान है, जो इसे देश के अन्य हिस्सों से अलग बनाती है। इस पर्व का इतिहास 600 साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बस्तर में रथयात्रा की शुरुआत का श्रेय चालुक्य वंश के राजा पुरुषोत्तम देव को जाता है।

पुरी से बस्तर कैसे आया रथ?

ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, राजा पुरुषोत्तम देव भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे। वे भगवान को सोना और चांदी अर्पित करने के लिए पुरी गए थे। उनके भक्ति भाव और चढ़ावे से प्रसन्न होकर पुरी के राजा ने जगन्नाथ मंदिर के पुजारियों को निर्देश दिया कि राजा पुरुषोत्तम देव को विशेष सम्मान दिया जाए। मंदिर के पुजारियों ने उन्हें प्रतीक के रूप में 16 पहियों वाला एक विशाल रथ भेंट किया। इतिहासकार और 360 अरण्य ब्राह्मण समाज के पूर्व अध्यक्ष हेमंत कुमार पांडे के अनुसार, उस समय साल और सागौन की लकड़ी से निर्मित इस विशाल रथ को अलग-अलग हिस्सों में विभाजित करके बस्तर लाया गया था। इसके चार पहिए बस्तर में भगवान जगन्नाथ को समर्पित किए गए, जो बस्तर की रथयात्रा की नींव बने। शेष आठ पहियों का रथ दंतेश्वरी देवी को अर्पित कर दिया गया। इसी परंपरा के साथ बस्तर में गोंचा पर्व की शुरुआत हुई, जिसे आज बस्तर दशहरा के बाद दूसरा सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है।

तुपकी से सलामी की अनूठी परंपरा

बस्तर की रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता तुपकी है। बस्तर के लोगों ने तोप से प्रेरणा लेकर तुपकी का स्वरूप विकसित किया है। यह पूरी तरह से बांस से बनाई जाती है और इसमें पेग का उपयोग किया जाता है। पेग डालने के बाद इसे जब चलाया जाता है, तो यह बिल्कुल बंदूक की तरह तीव्र आवाज करती है। रथयात्रा के दौरान भगवान को 108 तुपकियों से सलामी दी जाती है, जिसके बाद ही रथ को आगे बढ़ाया जाता है। यह परंपरा बस्तर के अलावा भारत में कहीं और देखने को नहीं मिलती, जो इसे वैश्विक स्तर पर अनूठा बनाती है।

धार्मिक अनुष्ठान और यात्रा का सफर

गोंचा पर्व का आयोजन 360 अरण्य ब्राह्मण समाज द्वारा किया जाता है। रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ अपने मंदिर से बाहर निकलते हैं और रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं। यह रथ गोल बाजार, मिथाली चौक, दंतेश्वरी मंदिर और सिरहासार भवन तक जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में जनकपुरी भी कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान अपनी मौसी के घर जाते हैं। इस दौरान हेरा पंचमी की रस्म निभाई जाती है, जिसमें भक्त डोली लेकर भगवान को खोजने निकलते हैं। मान्यता के अनुसार, लक्ष्मी माता से नाराज होकर भगवान वहां से चले आते हैं। पहले राज परिवार में भगवान की खोज की जाती थी। इसके बाद बहुड़ा गोंचा की प्रक्रिया पूरी होती है, जिसमें भगवान भ्रमण करके वापस लौटते हैं। अंत में कपाट फेड़ा की रस्म के साथ भगवान पुनः मंदिर के भीतर प्रवेश करते हैं।

सामूहिक भागीदारी का प्रतीक

बस्तर के इस पर्व में समाज के हर वर्ग और संप्रदाय के लोग पूरी निष्ठा के साथ शामिल होते हैं। हर साल इस उत्सव के लिए नया रथ तैयार किया जाता है, जिसे खींचने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ता है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण भी है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप