अमेरिका
4 घंटे पहले
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विचारों
बलूचिस्तान का वैश्विक शक्तियों को कड़ा संदेश
रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अमेरिका और चीन के शीर्ष नेतृत्व के समक्ष अपना पक्ष मजबूती से रखा है। संगठन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को एक खुला संयुक्त पत्र भेजा है। इस पत्र का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान को दी जा रही सैन्य सहायता और आर्थिक सहयोग को तत्काल प्रभाव से रुकवाना है। बलूच संगठन का स्पष्ट आरोप है कि पाकिस्तान न केवल अपने क्षेत्र में मानवाधिकारों का हनन कर रहा है, बल्कि विदेशी हथियारों का उपयोग बलूचिस्तान के निहत्थे नागरिकों के विरुद्ध सैन्य अभियानों में किया जा रहा है।
हवाई हमलों का खौफनाक सच
पत्र में संगठन ने बलूचिस्तान की जमीनी हकीकत और पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का विस्तृत विवरण दिया है। विशेष रूप से 12 अगस्त 2026 की घटना का जिक्र करते हुए पत्र में बताया गया है कि सुराब क्षेत्र में पाकिस्तान सेना ने हवाई हमले किए। इन हमलों में महिलाओं और मासूम बच्चों समेत कुल 30 बलूच नागरिक मारे गए। संगठन का यह भी कहना है कि जब इस क्रूरता को लेकर सवाल उठाए गए, तो पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान ने सिरे से हमलों से इनकार कर दिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने झूठ का सहारा लिया। पत्र में यह चेतावनी दी गई है कि पाकिस्तान द्वारा दुनिया को गुमराह करना कोई नई बात नहीं है और अतीत में भी उसने ओसामा बिन लादेन की उपस्थिति जैसे गंभीर मुद्दों पर अमेरिका को अंधेरे में रखा था।
चीन और CPEC पर बलूच चिंताएं
रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने चीन को भी आगाह किया है कि पाकिस्तान उसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) और बलूचिस्तान की वास्तविक स्थिति को लेकर धोखा दे रहा है। संगठन ने दावा किया है कि बलूचिस्तान में पाकिस्तान का नियंत्रण पूरी तरह से कमजोर हो चुका है। स्थिति यह है कि शाम 6 बजे के बाद पाकिस्तानी सेना खुद सड़कों पर सुरक्षित यात्रा करने की स्थिति में नहीं है। चीन को सलाह दी गई है कि वह पाकिस्तान के दावों के बजाय जमीनी सच्चाई पर गौर करे।
अमेरिकी सैन्य हथियारों का घातक उपयोग
पत्र में अमेरिका से मिली सैन्य सहायता की समीक्षा की पुरजोर मांग की गई है। इसमें 1983 से 1987 के बीच पीस गेट I और II कार्यक्रमों के तहत मिले 40 F-16A/B विमानों का विवरण दिया गया है। इसके अलावा 2006 में स्वीकृत किए गए उस विशाल पैकेज का भी उल्लेख है, जिसकी कीमत करीब 5 अरब डॉलर थी। इस पैकेज में 18 F-16C/D Block 52 विमान, 34 पुराने विमानों का आधुनिकीकरण और AIM-120C मिसाइलें शामिल थीं। बलूच संगठन का तर्क है कि अमेरिका द्वारा दी गई ये सैन्य क्षमताएं बलूच राष्ट्र के खिलाफ उपयोग की जा रही हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का घोर उल्लंघन है।
चीन की सैन्य भूमिका पर सवाल
चीन और पाकिस्तान के दशकों पुराने सैन्य संबंधों की भी पोल खोली गई है। पत्र के अनुसार, 1960 के दशक से ही चीन पाकिस्तान को बड़े पैमाने पर हथियार दे रहा है। उस समय 165 MiG-19 विमान और अन्य उपकरण दिए गए थे, जिनकी कीमत 1970 के दशक की शुरुआत तक 20 करोड़ डॉलर आंकी गई थी। इन हथियारों का उपयोग कोहिस्तान मरी और झलावान में बलूचिस्तान के स्वतंत्रता आंदोलनों को कुचलने के लिए हुआ था। बाद के वर्षों में चीन पाकिस्तान का रक्षा साझेदार बन गया और उसने F-7, A-5 और K-8 विमानों के साथ-साथ नौसैनिक प्रणालियां भी मुहैया कराईं। 2015 में चीन द्वारा आठ युआन क्लास पनडुब्बियां देने का जो समझौता हुआ, उसकी कीमत 5 अरब डॉलर के आसपास है। संगठन का आग्रह है कि चीन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी तकनीक का इस्तेमाल दमन के लिए न हो।
युद्ध अपराध और संप्रभुता का मुद्दा
रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने कड़े शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान और बलूचिस्तान दो अलग राष्ट्र हैं और पाकिस्तान के पास बलूचिस्तान के भूमि, जल या वायु क्षेत्र पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है। संगठन ने अमेरिका और चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बताते हुए उनसे अपील की है कि वे अपनी नीतियों के परिणामों पर गंभीरता से विचार करें। यदि इन हमलों में आम नागरिकों के मारे जाने की पुष्टि होती है, तो यह कृत्य सीधे तौर पर युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है।
विकास के नाम पर छलावा
बलूच संगठन ने यह स्पष्ट किया है कि वे अंतरराष्ट्रीय निवेश या व्यापार के विरोधी नहीं हैं। हालांकि, वे यह कतई स्वीकार नहीं करेंगे कि विदेशी ताकतें पाकिस्तान को सैन्य मदद देकर बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों और बंदरगाहों तक पहुंच हासिल करें। संगठन का कहना है कि किसी भी प्रकार का आर्थिक सहयोग केवल बलूच लोगों और उनके वास्तविक प्रतिनिधियों के साथ सीधी बातचीत के माध्यम से ही संभव होना चाहिए।
निष्कर्ष और मान्यता की अपील
अंत में, रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने दुनिया के देशों से बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील की है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान को हथियार देने की नीति छोड़कर बलूच लोगों के साथ सम्मान और कानून के आधार पर व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध स्थापित करने चाहिए। पारदर्शी निगरानी व्यवस्था की मांग करते हुए उन्होंने कहा है कि जब तक सैन्य सहायता पर रोक नहीं लगेगी, तब तक बलूच नागरिकों के खिलाफ हिंसा का दौर नहीं थमेगा।
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