मध्य प्रदेश
2 घंटे पहले
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विचारों
बालाघाट में बदला दौर
मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला पिछले 35 वर्षों तक नक्सली हिंसा और लाल आतंक की छाया में रहा। इस दौरान नक्सलियों ने एक बड़े हिस्से में समांतर सरकार चलाने का प्रयास किया और हमेशा जल, जंगल और जमीन की लड़ाई को अपना मुख्य एजेंडा बनाया। नक्सलियों का मुख्य हथियार आदिवासियों को सरकार के खिलाफ भड़काना था, जहाँ वे दावा करते थे कि भूमि पर सिर्फ उनका अधिकार है और प्रशासन उन्हें बेदखल कर रहा है। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में जमीनी हकीकत तेजी से बदली है। ग्रामीण अब नक्सलियों के बहकावे से पूरी तरह दूर हो चुके हैं और सरकारी तंत्र में उनका भरोसा बढ़ा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हाल ही में मिली 86 हेक्टेयर वन भूमि के अधिकार हैं, जो अब आदिवासियों की आजीविका का मुख्य साधन बनेंगे।
तीन गांवों को मिला सामुदायिक वन संसाधन का हक
बालाघाट के कलेक्टर मृणाल मीना ने जानकारी देते हुए बताया कि जिले के बिरसा विकासखंड के तीन गांवों के लोगों को बड़ी राहत और आर्थिक मजबूती दी गई है। इन गांवों की वन अधिकार समितियों को सामुदायिक वन संसाधन यानी सीएफआर पट्टे सौंपे गए हैं। इस प्रक्रिया के तहत सुंदरवाही, झकोरदा और लातरी गांव के निवासियों को अब वनों पर कानूनी अधिकार मिल गया है। इन समितियों को मिले वन क्षेत्र का विवरण इस प्रकार है:
- सुंदरवाही वन अधिकार समिति को 35 हेक्टेयर भूमि मिली है।
- झकोरदा समिति के अधिकार क्षेत्र में 16 हेक्टेयर भूमि आई है।
- लातरी समिति को 34.26 हेक्टेयर वन भूमि का प्रबंधन सौंपा गया है।
इन पट्टों को हासिल करने वालों में प्रमुख रूप से नंदलाल वल्के, देवीलाल तेकाम, डुलीचंद मर्सकोले और सकलूसिंह तिलगाम जैसे ग्रामीण शामिल हैं, जिन्होंने अपनी समितियों का नेतृत्व किया है।
चिरौंजी से होगी मोटी कमाई
प्रशासन की ओर से दिए गए ये पट्टे व्यक्तिगत वनाधिकार से अलग हैं। इनमें ग्रामीणों को न केवल वनों के संरक्षण की जिम्मेदारी दी गई है, बल्कि वे बिना किसी रोकटोक के वनोपज का संग्रहण और व्यापार भी कर सकेंगे। उत्तर सामान्य वन विभाग के डीएफओ रेशम सिंह धुर्वे के अनुसार, इन वन क्षेत्रों में चिरौंजी के पेड़ों की भरमार है। ग्रामीण लंबे समय से चिरौंजी एकत्र करते रहे हैं, लेकिन अब इसे कानूनी मान्यता मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आएगा।
आंकड़ों के अनुसार, चिरौंजी के बीज करीब 200 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकते हैं, जबकि इसके बीज से निकाली गई गिरी बाजार में 3 हजार से 4 हजार रुपये प्रति किलोग्राम तक के ऊंचे दामों पर बिकती है। इन गांवों के आसपास करीब 150 से अधिक परिवार ऐसे हैं जो चिरौंजी संग्रहण और इसकी प्रोसेसिंग का काम करते हैं। अनुमान के मुताबिक, इस नई व्यवस्था से हर परिवार को साल भर में 40 हजार से 60 हजार रुपये तक की शुद्ध आय प्राप्त हो सकेगी।
परंपरा और रोजगार का संगम
ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से जंगल से चिरौंजी और अन्य वनोपज एकत्र करते थे, लेकिन वन विभाग की सख्ती के कारण उन्हें अक्सर परेशानी का सामना करना पड़ता था। अब सामुदायिक वन संसाधन का अधिकार मिलने के बाद वे पूरी निडरता के साथ अपना काम कर सकेंगे। आदिवासी समाज में चिरौंजी का महत्व सिर्फ आजीविका तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी सांस्कृतिक आस्था का भी हिस्सा है। आदिवासी विवाह में मंडप बनाने के लिए चिरौंजी की लकड़ी का उपयोग करना एक शुभ परंपरा मानी जाती है। मान्यता है कि चिरौंजी के पेड़ की तरह ही सुख-समृद्धि और संतान का आशीर्वाद परिवार को प्राप्त होता है। प्रशासन की इस पहल से अब इन पेड़ों के संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।
प्रशासनिक सक्रियता और व्यक्तिगत पट्टे
कलेक्टर मृणाल मीना के मुताबिक, केवल सामुदायिक पट्टे ही नहीं बल्कि सरकार ने व्यक्तिगत स्तर पर भी आदिवासियों को सशक्त बनाने के कदम उठाए हैं। पिछले एक वर्ष के दौरान जिले में 6 हजार 800 से अधिक हितग्राहियों को व्यक्तिगत वनाधिकार अधिनियम के अंतर्गत खेती के लिए पट्टे प्रदान किए गए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में जिला प्रशासन के साथ-साथ वन विभाग के अधिकारियों और पंचायत सचिवों ने समन्वय बिठाकर एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। अब नक्सल प्रभावित रहे इन क्षेत्रों के किसान बिना किसी डर और संशय के अपनी कृषि भूमि पर खेती कर सकेंगे, जिससे क्षेत्र में विकास की नई धारा बह रही है।
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