अंतरिक्ष में एक अनोखा प्रयोग: पानी से जीवन रक्षक दवा बना रहे भारतीय मूल के एस्ट्रोनॉट अनिल मेनन अमेरिका एक महीने पहले 67
नासा के एस्ट्रोनॉट अनिल मेनन इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर एक क्रांतिकारी प्रयोग के जरिए पीने के पानी को मेडिकल ग्रेड आईवी फ्लूइड में बदल रहे हैं, जो भविष्य के मंगल मिशन और धरती पर आपदा प्रबंधन के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

अंतरिक्ष की ऊंचाइयों में चिकित्सा क्रांति

भारतीय मूल के नासा एस्ट्रोनॉट अनिल मेनन इन दिनों पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर दूर स्थित इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रोमांचक वैज्ञानिक प्रयोग को अंजाम दे रहे हैं। अपने सहकर्मी एस्ट्रोनॉट जेसिका के साथ मिलकर, मेनन ने एक ऐसी तकनीक पर काम शुरू किया है जो भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण के तौर-तरीकों को पूरी तरह से बदल सकती है। यह प्रयोग पीने के पानी को सीधे मेडिकल ग्रेड आईवी (IV) फ्लूइड में बदलने से संबंधित है।

आईवीजेन मिनी मशीन का कमाल

इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए अंतरिक्ष यात्री लाइफ साइंसेस ग्लवबॉक्स के भीतर एक विशेष मशीन का उपयोग कर रहे हैं, जिसका नाम आईवीजेन मिनी है। यह छोटा सा सिस्टम स्पेस स्टेशन के अंदर मौजूद पीने वाले पानी को पूरी तरह शुद्ध करके उसे चिकित्सीय उपयोग योग्य आईवी फ्लूइड में रूपांतरित करने में सक्षम है। अनिल मेनन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किया है कि एस्ट्रोनॉट जेसिका बहुत ही धैर्य के साथ उन्हें इस जटिल कार्य की बारीकियां सिखा रही हैं। एक इमरजेंसी मेडिसिन फिजिशियन के तौर पर काम करने का अनुभव रखने वाले मेनन के लिए यह प्रयोग काफी व्यक्तिगत महत्व रखता है।

मंगल मिशन के लिए क्यों है यह तकनीक जरूरी?

भविष्य में मंगल ग्रह जैसे सुदूर और लंबे अंतरिक्ष अभियानों की कल्पना करें तो वहां दवाइयां और चिकित्सा उपकरण भेजना एक बड़ी चुनौती है। सामान्य आईवी फ्लूइड बैग की एक्सपायरी डेट करीब 16 महीने की होती है, जबकि मंगल ग्रह तक पहुंचने में ही लंबा समय लग सकता है। इसके अलावा, पृथ्वी से 100 लीटर से अधिक मेडिकल फ्लूइड अंतरिक्ष में ले जाना न केवल तकनीकी रूप से कठिन है, बल्कि यह वजन के लिहाज से बेहद खर्चीला और लॉन्च के दौरान मुश्किल भी होता है। नासा की यह नई तकनीक इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए विकसित की जा रही है ताकि अंतरिक्ष यात्री खुद ही अपनी जरूरत का जीवन रक्षक फ्लूइड तैयार कर सकें।

कैसे काम करता है पानी से फ्लूइड बनाने का प्रोसेस?

वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान बहुत ही चतुर और प्रभावी ढंग से निकाला है। अब उन्हें भारी-भरकम सलाइन बैग पृथ्वी से ले जाने की आवश्यकता नहीं होगी। इसके बजाय, वे केवल फिल्टर और नमक का एक छोटा सा किट अंतरिक्ष में ले जाते हैं। प्रक्रिया के मुख्य चरण इस प्रकार हैं:

  • सबसे पहले स्पेस स्टेशन के पीने वाले पानी को उच्च स्तर तक शुद्ध (Sterilize) किया जाता है ताकि वह मेडिकल ग्रेड बन सके।
  • इसके बाद, शुद्ध पानी में एक निश्चित मात्रा में सोडियम क्लोराइड (नमक) मिलाया जाता है।
  • यह पूरी प्रक्रिया आईवीजेन मिनी मशीन के अंदर पूरी होती है।
  • अंत में, मिश्रण एक सामान्य सलाइन (IV Fluid) के रूप में तैयार होकर निकलता है, जिसका उपयोग चिकित्सा के लिए किया जा सकता है।

धरती पर आपदा प्रबंधन के लिए वरदान

यह शोध सिर्फ अंतरिक्ष तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा लाभ पृथ्वी पर भी मिलेगा। अनिल मेनन का मानना है कि यदि 250 मील की ऊंचाई पर अंतरिक्ष में मेडिकल फ्लूइड बनाया जा सकता है, तो इस तकनीक को धरती के सुदूर या आपदा प्रभावित इलाकों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जिन स्थानों पर चिकित्सा आपूर्ति श्रृंखला (Medical supply chain) समय पर नहीं पहुंच पाती, वहां यह तकनीक जीवन रक्षक सिद्ध होगी। फील्ड अस्पताल और आपदा राहत शिविरों में यह पोर्टेबल सिस्टम डॉक्टरों के लिए एक बड़ा सहारा बन सकता है।

कौन हैं एस्ट्रोनॉट अनिल मेनन?

अनिल मेनन का करियर बेहद प्रभावशाली रहा है। वह हाल ही में रूस के सोयुज एमएस-29 अंतरिक्ष यान के जरिए इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पहुंचे हैं। उनके पिता भारतीय और मां यूक्रेनी मूल की हैं। शैक्षणिक रूप से वे काफी योग्य हैं, उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से न्यूरोबायोलॉजी और स्टैनफोर्ड से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने इमरजेंसी मेडिसिन में विशेषज्ञता प्राप्त की है। नासा ने वर्ष 2021 में उन्हें अपनी एस्ट्रोनॉट क्लास के लिए चुना था। स्पेस स्टेशन पर अपने लगभग आठ महीने के प्रवास के दौरान, वह कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोधों को पूरा करेंगे। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में चक्कर लगाता है, जो पृथ्वी की सतह से 370 से 460 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच बनी रहती है।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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