भाई के वो 5 आखिरी शब्द दिल में संजोए हैं नेतन्याहू, बन गए इजराइल की सैन्य नीति विश्व 2 घंटे पहले 4
संयुक्त राष्ट्र महासभा में बेंजामिन नेतन्याहू ने गाजा में जारी युद्ध को अपने अस्तित्व की लड़ाई करार देते हुए अपने शहीद भाई योनातन नेतन्याहू की यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि किस तरह उनके भाई के कहे हुए 5 शब्द आज इजराइल की सुरक्षा नीति का आधार बन चुके हैं।

संयुक्त राष्ट्र के मंच से नेतन्याहू की हुंकार

संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दुनिया को स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। उनके भाषण में गाजा में हमास के खिलाफ चल रही सैन्य कार्रवाई को देश के अस्तित्व की रक्षा के लिए अपरिहार्य बताया गया। इस दौरान नेतन्याहू के लहजे में अपने प्रियजनों को खोने का दर्द और देश की सुरक्षा के प्रति अडिग संकल्प साफ झलक रहा था। उन्होंने अपने दिवंगत बड़े भाई योनातन योनी नेतन्याहू के बलिदान का जिक्र करते हुए उस दौर को याद किया, जिसने उनके जीवन और इजराइल की सैन्य विचारधारा को पूरी तरह बदलकर रख दिया।

1967 का वह खौफनाक दौर और एक भाई की सीख

भाषण के दौरान नेतन्याहू अतीत के पन्नों को पलटते हुए 1967 के सिक्स डे वॉर यानी छह दिवसीय युद्ध के पहले के उन दिनों में ले गए जब इजराइल पर विनाश का खतरा मंडरा रहा था। उस समय बेंजामिन नेतन्याहू अमेरिका के फिलाडेल्फिया में अपनी पढ़ाई कर रहे थे। मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की सेनाएं एक साथ इजराइल पर हमले की तैयारी कर रही थीं। इजराइल का अस्तित्व मिटने की कगार पर था और देश के भीतर अपने ही नागरिकों को दफनाने के लिए सामूहिक कब्रें खोदी जा रही थीं। युद्ध शुरू होने से महज पांच दिन पहले, 17 साल की उम्र में नेतन्याहू इजराइल पहुंचे। उस वक्त पूरा इजराइल ब्लैकआउट के सन्नाटे में डूबा था।

रामला के बागों में हुई ऐतिहासिक बातचीत

नेतन्याहू ने याद किया कि वे अपने 21 वर्षीय बड़े भाई योनी से मिलने गए, जो उस समय इजराइली सेना की पैराट्रूपर यूनिट में एक अधिकारी के तौर पर तैनात थे। रामला के संतरे के बागों में सैनिकों के तंबू लगे हुए थे। वहां कॉफी पीते हुए छोटे भाई नेतन्याहू ने अपने भाई से वह सवाल पूछा जो उस समय हर इजराइली नागरिक के मन में था, 'योनी, अब हमारा क्या होगा? आगे क्या होने वाला है?' उस पल योनी ने अपने भाई की आंखों में देखा और केवल 5 शब्द कहे, 'हम जीतेंगे क्योंकि हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।' नेतन्याहू के मुताबिक, ये शब्द उनके लिए महज एक वाक्य नहीं बल्कि इजराइल के अस्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण नियम बन गए।

एनटेबे ऑपरेशन और योनी का बलिदान

योनी नेतन्याहू केवल बातें करने वाले व्यक्ति नहीं थे, उन्होंने अपने शब्दों को सिद्ध कर दिखाया। वर्ष 1976 में जब फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने एयर फ्रांस के एक विमान को अगवा कर युगांडा के एनटेबे पहुंचा दिया था, तब योनी नेतन्याहू ही उस गुप्त कमांडो ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे थे। आतंकवादियों ने यहूदी बंधकों को अलग कर मारने की धमकी दी थी। इजराइल से हजारों मील दूर जाकर इजराइली कमांडो ने 103 बंधकों को सुरक्षित बचाया। हालांकि, इस मिशन की सफलता की भारी कीमत नेतन्याहू परिवार को चुकानी पड़ी, क्योंकि योनी इस ऑपरेशन में शहीद होने वाले एकमात्र इजराइली सैनिक थे।

7 अक्टूबर 2023 और हमास का खात्मा

योनी की शहादत के 47 साल बाद, 7 अक्टूबर 2023 को इजराइल ने अपने इतिहास का सबसे वीभत्स आतंकी हमला झेला। हमास के आतंकवादियों ने इजराइल में घुसकर 1200 से अधिक लोगों की हत्या कर दी और कई लोगों को बंधक बना लिया। नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट कहा कि यह हमला 1967 और 1976 की यादें ताजा कर गया है। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया युद्धविराम के लिए दबाव बना रही है, तो उन्हें अपने भाई के वे 5 शब्द याद आते हैं। नेतन्याहू का दृढ़ मत है कि हमास को अधूरा छोड़कर इजराइल कभी सुरक्षित नहीं रह पाएगा। हमास का पूर्ण विनाश इजराइल के लिए राजनीतिक जिद नहीं, बल्कि अपनी आने वाली नस्लों को बचाने की एकमात्र मजबूरी है।

इजराइल की नो-कॉम्प्रोमाइज नीति के मायने

नेतन्याहू के रुख से साफ है कि इजराइल किसी भी वैश्विक दबाव में आकर अपना गाजा सैन्य अभियान नहीं रोकेगा। उन्होंने हमास और हिजबुल्लाह जैसे समूहों को कड़ा संदेश दिया है कि इजराइल अपनी अंतिम सांस तक लड़ेगा क्योंकि उसके पास पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं है। इसके अलावा, घरेलू मोर्चे पर भी नेतन्याहू बंधकों की रिहाई और युद्ध की समाप्ति के दबाव का सामना कर रहे हैं। अपने भाई के बलिदान का उल्लेख करके वे इजराइली जनता को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि वे देश की सुरक्षा और संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे।

युद्ध का अंत और नेतन्याहू का संकल्प

संयुक्त राष्ट्र में नेतन्याहू का आक्रामक अंदाज यह संकेत देता है कि पश्चिम एशिया में युद्ध इतनी आसानी से नहीं थमेगा। बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह लड़ाई केवल हमास के विरुद्ध एक सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह योनी की विरासत और इजराइली राष्ट्र को बचाने का संकल्प है। 57 साल पहले रामला के एक संतरे के बाग में जो बात एक युवा फौजी ने कही थी, वह आज इजराइल की मिलिट्री डॉक्ट्रिन बन चुकी है। जब तक हमास का नामो निशान नहीं मिट जाता, तब तक नेतन्याहू इस युद्ध को विराम देने के मूड में नहीं हैं।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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