राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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विचारों
भारत और अमेरिका के बीच जिस गहरी दोस्ती की मिसालें दी जाती थीं, उसका शुरुआती जोश अब ढलता नज़र आ रहा है। हाल ही में अमेरिका ने अपनी इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर यूएस पैसिफिक कमांड कर दिया है, यानी एक झटके में 'इंडो' शब्द को इससे अलग कर दिया गया। इस फैसले में एक छिपा हुआ संदेश भी देखा जा रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अमेरिका भारत की बढ़ती ताकत से असहज है। यही वजह है कि एक ओर डोनाल्ड ट्रंप चीन के साथ अपने समीकरण साध रहे हैं, तो दूसरी ओर भारत को नियंत्रित करने के लिए पाकिस्तान को दोबारा सहारा देने की तैयारी में दिख रहे हैं।
इस कूटनीतिक कदम को समझने की कोशिश रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी और पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने की है।
ब्रह्मा चेलानी की राय
ब्रह्मा चेलानी ने एक्स पर लिखा कि पेंटागन द्वारा 'इंडो' शब्द हटाकर दोबारा यूएस पैसिफिक कमांड नाम अपनाने का फैसला और हाल की अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भारत का नाममात्र का उल्लेख यह साफ दर्शाता है कि वॉशिंगटन भारत को कितनी अहमियत देता है।
उनके मुताबिक अब यह संबंध किसी साझा दृष्टिकोण पर नहीं, बल्कि पूरी तरह सौदेबाजी और लेन-देन पर आधारित होता जा रहा है। उन्होंने इसकी वजह बताते हुए कहा कि ट्रंप चीन के साथ बीच का रास्ता निकालने में जुटे हैं। साथ ही, इस क्षेत्र में किसी एक शक्ति यानी भारत का दबदबा न बने, इसे रोकने के लिए ट्रंप को एक बार फिर पाकिस्तान की उपयोगिता याद आ गई है।
निरुपमा राव ने क्या कहा
पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने एक्स पर लिखा कि असली सवाल यह है कि क्या अमेरिका आज भी भारत को इस क्षेत्र की व्यवस्था गढ़ने वाला साझेदार मानता है, या फिर अपने लक्ष्यों को पूरा करने वाली कई मोहरों में से सिर्फ एक उपयोगी मोहरा। उनके अनुसार यह बात प्रधानमंत्री मोदी के उस बयान से पूरी तरह मेल खाती है, जिसमें उन्होंने भरोसे की बात कही थी।
राव का मानना है कि अगर हाल के कई संकेतों को एक साथ जोड़कर देखा जाए तो एक बड़ी तस्वीर उभरती है। इनमें शामिल हैं—
- ट्रंप का भारत को 'डेड इकॉनमी' कहना
- रायसीना डायलॉग में अमेरिकी अधिकारी लैंडौ की यह चेतावनी कि अमेरिका भारत के साथ चीन जैसी गलती नहीं दोहराएगा
- भारतीय नाविकों की मौत और अमेरिकी सीनेटर मार्को रुबियो के साथ हुई तीखी बहस
- G7 सम्मेलन में दिखी दूरी और ठंडी तस्वीरें
- प्रधानमंत्री मोदी का दुनिया में भरोसे की कमी पर जोर देना
- और अब इंडो-पैसिफिक के प्रतीक को ही छोटा कर देना
राव के अनुसार इनमें से कोई अकेली घटना रिश्ते टूटने का प्रमाण नहीं है, लेकिन इन सबको मिलाकर देखने पर साफ पता चलता है कि भारत-अमेरिका रिश्तों का सुनहरा और जोशीला दौर अब समाप्ति की ओर है। यह संबंध अब अधिक सामान्य, अधिक हितों पर आधारित, लेन-देन वाला और संभवतः कहीं ज्यादा कठिन होने जा रहा है।
भारत के लिए इसके मायने
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अब यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि अमेरिका उसका पक्का दोस्त है। उनका मानना है कि अमेरिका भारत को तभी तक तवज्जो देगा, जब तक उसका अपना फायदा है—जरूरत खत्म होते ही दोस्ती भी खत्म।
जानकारों के मुताबिक सबसे बड़ा खतरा यह है कि अमेरिका इस क्षेत्र में भारत को अगुआ नहीं बनने देना चाहता। भारत को उलझाए रखने के लिए वह दोबारा पाकिस्तान को ताकत और समर्थन दे सकता है। ट्रंप चीन से टकराने के बजाय उसके साथ व्यापारिक समझौते तय करने में लगे हैं, और यदि यह सौदा पक्का हो गया तो अमेरिका को भारत की कोई खास जरूरत नहीं रह जाएगी।
विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने भरोसे की कमी की जो बात कही थी, वह सटीक साबित हो रही है। भारत को अब अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होगी, क्योंकि अमेरिका के भरोसे बैठकर अपनी सुरक्षा को जोखिम में नहीं डाला जा सकता।
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