विश्व
एक घंटा पहले
3
विचारों
अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है, लेकिन हालिया कूटनीतिक हलचल से ऐसा लगता है कि दोनों देश अपने रिश्तों में स्थिरता लाने की कोशिश में हैं। दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों की पूर्व सहायक सचिव निशा देसाई बिस्वाल का मानना है कि यह कोशिश ज्यादातर आर्थिक कारणों से हो रही है, जबकि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच टकराव की असली जड़ें ज्यों की त्यों बनी हुई हैं।
आर्थिक मजबूरियां बना रहीं नरमी की वजह
एक खास बातचीत में बिस्वाल ने कहा कि बीजिंग को लेकर वॉशिंगटन का मौजूदा रवैया तनाव को संभालने और ज्यादा भरोसेमंद रिश्ता बनाने पर टिका है, खासकर इस साल के आखिर में होने वाली राजनीतिक रूप से अहम घटनाओं से पहले।
“मुझे लगता है कि अमेरिका इस समय ऐसी स्थिति में है, जहां वह चीन के साथ एक स्थिर संबंध चाहता है। इसके पीछे मजबूत आर्थिक कारण भी हैं।”
उनके अनुसार इस साल के आखिर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित अमेरिका यात्रा बड़ी रणनीतिक असहमतियों से नहीं, बल्कि तात्कालिक आर्थिक प्राथमिकताओं से तय हो सकती है।
मिडटर्म चुनाव से पहले निवेश और व्यापार पर जोर
बिस्वाल ने कहा कि मिडटर्म चुनावों से ठीक पहले इस पतझड़ में राष्ट्रपति शी का आपसी दौरा उन आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित रहेगा जिन्हें दोनों पक्ष ज्यादा जरूरी मानते हैं।
“इस दौरे में वे निवेश और खेती-बाड़ी के व्यापार जैसे मामलों पर गौर करना चाहेंगे।”
बुनियादी मतभेद अब भी जस के तस
हालांकि उन्होंने इस बात को लेकर आगाह किया कि मौजूदा कूटनीतिक बातचीत को वॉशिंगटन और बीजिंग के रिश्तों में किसी बड़े बदलाव के सबूत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने दो टूक कहा कि अमेरिका और चीन से जुड़ी बुनियादी बातें नहीं बदली हैं।
पूर्व सहायक विदेश सचिव ने यह भी संकेत दिया कि बीते सालों में रिश्तों को परिभाषित करने वाले कुछ कठिन मुद्दे अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद फिर से सिर उठा सकते हैं।
“मुझे हैरानी नहीं होगी अगर मिडटर्म के बाद अमेरिका और चीन के बीच कुछ मुश्किल मुद्दे टकराव के बिंदु बनकर दोबारा उभर आएं।”
भारत-चीन के बीच स्थिरता की कोशिश
भारत और चीन के संबंधों पर बिस्वाल ने कहा कि लगातार बने मतभेदों के बावजूद दोनों एशियाई शक्तियों के पास अपने रिश्तों में ज्यादा स्थिरता लाने की ठोस वजहें हैं। उनका मानना है कि इस संबंध में स्थिरता बनाए रखना भारत और चीन दोनों के हित में है।
उनके मुताबिक दोनों सरकारों ने सहयोग और संवाद के सीमित अवसरों को टटोलने में दिलचस्पी दिखाई है।
“हमने सुना है कि दोनों पक्ष आर्थिक और निवेश के मोर्चे पर कुछ सीमित अवसर बनाने, सीधे हवाई मार्ग शुरू करने और ऐसी ही चीजों पर विचार कर रहे हैं।”
बड़ी सफलता की उम्मीद कम
हालांकि बिस्वाल ने यह भी चेताया कि किसी बड़ी कामयाबी की उम्मीद कम ही रखी जानी चाहिए।
“भारत और चीन किस हद तक साझा जमीन तलाश पाएंगे, इसकी कुछ सीमाएं हैं।”
उल्लेखनीय है कि बिस्वाल ने 2013 से 2017 तक दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के लिए सहायक सचिव के तौर पर जिम्मेदारी संभाली है।
Comments
0 comment