रिटायरमेंट के बाद भी नहीं रुके पूर्व DSP अजय राणा, 47 एकड़ में सजाया फलों का बाग, अब तीन राज्यों तक पहुंच रही सप्लाई हरियाणा एक महीने पहले 24
हरियाणा के अंबाला जिले के थंबर गांव में पूर्व डीएसपी अजय राणा ने रिटायरमेंट के बाद 47 एकड़ में ऑर्गेनिक फल बाग तैयार किया है, जिससे सालभर उत्पादन और अच्छी आमदनी हो रही है तथा सरकार से सब्सिडी भी मिल रही है।

खेती में लगातार बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के दौर में बागवानी किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आ रही है। अंबाला जिले की बराड़ा तहसील के गांव थंबर के रहने वाले पूर्व डीएसपी अजय राणा ने इसका जीता-जागता उदाहरण पेश किया है। जहां ज्यादातर किसान गेहूं और धान की पारंपरिक खेती तक ही सीमित रहते हैं, वहीं अजय राणा ने 47 एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक फलों का ऐसा बाग खड़ा किया है, जो आज उनकी पहचान बनने के साथ-साथ स्थायी आय का मजबूत जरिया भी बन चुका है।

पहाड़ी इलाकों की प्रजातियां भी मैदान में सफल

दिलचस्प बात यह है कि उनके बाग में सिर्फ हरियाणा में उगने वाले फल ही नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में मिलने वाली कई प्रजातियां भी कामयाबी के साथ तैयार की जा रही हैं। सेब, अखरोट, आड़ू, आलूबुखारा, लीची, चकोतरा, नींबू और आम जैसे फलों से लहलहाता यह बाग अब दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा का केंद्र बन गया है।

बचपन के शौक को बनाया खेती का आधार

लोकल मीडिया से बातचीत में अजय राणा ने बताया कि उन्हें बचपन से ही पेड़-पौधों से खास लगाव रहा है। पुलिस विभाग में लंबे समय तक सेवा देने के बाद उन्होंने अपने इसी शौक को खेती से जोड़ने का फैसला किया और धीरे-धीरे अपनी जमीन पर फलदार पौधे लगाने शुरू किए। आज यह बाग 47 एकड़ में फैल चुका है। खास बात यह है कि पूरा बाग ऑर्गेनिक तरीके से तैयार किया गया है, जहां रासायनिक खादों की जगह देसी खाद और प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है।

आम की कई मशहूर किस्में, सालभर रहती मांग

उन्होंने बताया कि बाग में आम की कई प्रसिद्ध किस्में भी लगाई गई हैं, जिनमें बॉम्बे ग्रीन, बिशहरी, लंगड़ा, चौसा और आम्रपाली प्रमुख हैं। गर्मियों में इन आमों की मांग हरियाणा के अलावा दिल्ली, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर और आसपास के कई शहरों में बनी रहती है, जबकि सर्दियों के मौसम में सेब, आड़ू और दूसरे फलों की अच्छी बिक्री होती है। यही वजह है कि पूरे साल बाग से किसी न किसी फल का उत्पादन होता रहता है और आय का सिलसिला बना रहता है।

दो साल में ही निकल गई शुरुआती लागत

अजय राणा का कहना है कि पारंपरिक खेती में किसानों को मौसम और बाजार दोनों की मार झेलनी पड़ती है, जबकि बागवानी लंबी अवधि का निवेश है, क्योंकि एक बार फलों के पेड़ तैयार हो जाएं तो कई वर्षों तक उनसे लगातार उत्पादन मिलता रहता है। उन्होंने बताया कि बाग लगाने के शुरुआती वर्षों में जो खर्च हुआ था, वह बाग लगने के करीब दो साल बाद ही फल बेचकर निकल गया। इसके बाद से उन्हें लगातार लाभ मिल रहा है और आज बाग से रोजाना हजारों रुपये की आमदनी हो रही है।

सरकारी सब्सिडी और सम्मान

दूसरे किसानों को भी बागवानी अपनाने की सलाह देते हुए अजय राणा कहते हैं कि जिन किसानों के पास पर्याप्त भूमि उपलब्ध है, वे फलदार बाग लगाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं, क्योंकि सरकार बागवानी को बढ़ावा देने के लिए प्रति एकड़ 30 से 40 हजार रुपये तक की सब्सिडी देती है। इसके अलावा पौधों की देखभाल और रखरखाव के लिए भी मदद दी जाती है। उन्होंने बताया कि फल उत्पादन के क्षेत्र में बेहतरीन काम करने के लिए उन्हें कई फल मेलों में सम्मानित भी किया जा चुका है।

आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत

उनका मानना है कि बागवानी सिर्फ आज की आय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत विरासत है। उन्होंने एक पुरानी कहावत का जिक्र करते हुए कहा कि बाग दादा लगाते हैं और उसके फल आने वाले पोते तक खाते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप