50 फीसदी आबादी और 45 फीसदी GDP की ताकत, वैश्विक कूटनीति में ब्रिक्स ने कैसे दी उपेक्षित देशों को नई आवाज? राष्ट्रीय राजनीति 4 घंटे पहले 3
पूर्व राजनयिकों के अनुसार ब्रिक्स अब ग्लोबल साउथ का सबसे मजबूत मंच बन चुका है जो किसी पश्चिमी देश के विरोध में नहीं बल्कि विकासशील देशों के साझा हितों को दुनिया के सामने रखने के लिए काम कर रहा है।

वैश्विक मंचों पर जहां कभी कुछ गिने-चुने देशों का दबदबा हुआ करता था, वहां अब एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। इस बदलाव की सबसे बड़ी धुरी बनकर उभरा है ब्रिक्स समूह। पूर्व राजनयिकों का मानना है कि ब्रिक्स अब केवल एक आर्थिक संगठन नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ के देशों के लिए एक युगांतरकारी और बेहद महत्वपूर्ण मंच साबित हो रहा है। यह एक ऐसा मंच है जिसने दुनिया की लगभग 50 फीसदी आबादी और 45 फीसदी GDP को अपने साथ जोड़कर अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।

राजनयिक विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि ब्रिक्स को किसी भी तरह से पश्चिमी देशों या किसी खास गुट के खिलाफ खड़े हुए मोर्चे के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके उलट, यह उन विकासशील और लंबे समय से उपेक्षित रहे राष्ट्रों को एक मजबूत साझा मंच और आवाज प्रदान कर रहा है, जिन्हें वैश्विक स्तर पर होने वाली बड़ी बहसों में कभी अपनी बात रखने का उचित अवसर नहीं मिलता था।

ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज बना ब्रिक्स

भारत के पूर्व राजनयिक सुधीर टी देवरे ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि इस सम्मेलन ने दुनिया के बेहद महत्वपूर्ण देशों के साथ-साथ उन तमाम छोटे और विकासशील देशों को भी एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है, जो अब तक वैश्विक कूटनीति की मुख्यधारा से कटे हुए थे। ब्रिक्स ने इन देशों को अपनी प्राथमिकताओं और चिंताओं को खुलकर साझा करने का एक नया रास्ता दिखाया है।

सुधीर टी देवरे ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि ब्रिक्स की ताकत को इसके आंकड़ों से समझा जा सकता है। वर्तमान में यह समूह दुनिया की आधी आबादी यानी लगभग 50 फीसदी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है। इसके साथ ही, वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसकी हिस्सेदारी भी करीब 45 फीसदी GDP तक पहुंच चुकी है। इतनी बड़ी ताकत होने के बावजूद यह संगठन किसी के विरोध की भावना से काम नहीं करता। यह पश्चिमी देशों के खिलाफ कोई मोर्चा नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से अपने सदस्य देशों के आर्थिक और कूटनीतिक हितों की सुरक्षा और उन्हें बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। आने वाले वर्षों में यह संगठन पूरी दुनिया के सामने अत्यंत सहयोगात्मक तरीके से अपने हितों की आवाज उठाता रहेगा।

विदेश नीति और ICWA का महत्वपूर्ण योगदान

पूर्व राजनयिक देवरे ने भारतीय वैश्विक मामले परिषद यानी ICWA के योगदान की भी जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि ICWA एक राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है जिसने भारत की विदेश नीति को आकार देने और उस पर गंभीर विचार-विमर्श करने में बहुत बड़ा योगदान दिया है। बदलते वैश्विक परिदृश्यों और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के साथ तालमेल बिठाने में इस संस्थान की भूमिका सराहनीय रही है।

भारत की अपनी विशिष्ट प्राथमिकताएं हैं और समय के साथ देश के सामने कई नई कूटनीतिक चुनौतियां भी आई हैं। यही वजह है कि भारत की विदेश नीति में लगातार विकास और बदलाव देखने को मिला है। यह सकारात्मक बदलाव ICWA द्वारा किए गए शोध और विचारों में साफ तौर पर झलकता है। सुधीर टी देवरे का मानना है कि राजनयिक अनुभवों को अकादमिक विचारों से जोड़ने में ICWA की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। यह संस्थान विभिन्न विश्वविद्यालयों, अकादमिक निकायों और स्वतंत्र विचारकों को एक साथ लाकर एक ऐसे साझा मंच के रूप में कार्य करता है जहां देश की विदेश नीति पर खुली और स्वस्थ बहस की जा सके। इसके अकादमिक विचारों से नीति-निर्माण को भी एक नया आयाम मिलता है।

शांति, संवाद और समूह का लगातार विस्तार

हालिया ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें किसी भी प्रकार का कोई आपसी टकराव या विवाद सामने नहीं आया। पूर्व राजनयिक के अनुसार, इस पूरे सम्मेलन का मूल मंत्र शांति, सहयोग और निरंतर संवाद स्थापित करना ही था। यही ब्रिक्स की सबसे बड़ी सफलता और कूटनीतिक योगदान भी है।

शुरुआत में ब्रिक्स केवल पांच देशों का एक समूह था, लेकिन समय के साथ इसका दायरा काफी बढ़ गया है। अब इस समूह में 5 से 6 नए देश और शामिल हो चुके हैं, जबकि कई अन्य देश भी इसके भागीदार या पूर्ण सदस्य बनने के लिए कतार में खड़े हैं। आने वाले समय में इस समूह में शामिल होने वाले ज्यादातर देश ग्लोबल साउथ के ही होंगे। चीन और रूस जैसी महाशक्तियों या कुछ अन्य विकसित देशों को छोड़ दें, तो ब्रिक्स के अधिकांश सदस्य विकासशील देशों की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में गुटनिरपेक्ष देशों के एक बड़े समूह के भीतर ही अब एक छोटा, अधिक प्रभावी और बेहद सक्रिय समूह तैयार हो गया है जो वैश्विक पटल पर एक नई और मजबूत कूटनीतिक आवाज के रूप में पहचाना जाएगा।

अफ्रीकी नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी की रणनीतिक मुलाकात

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारत की द्विपक्षीय कूटनीति भी बेहद सक्रिय रही। नाइजीरिया में भारत के पूर्व उच्चायुक्त और अल्जीरिया व नॉर्वे में भारत के पूर्व राजदूत रहे महेश सचदेव, IFS (सेवानिवृत्त) ने इस पर अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने सम्मेलन के दौरान अफ्रीकी नेताओं के साथ भारत की बातचीत को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।

महेश सचदेव के अनुसार, इस सम्मेलन में चार प्रमुख अफ्रीकी देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हुए। इनमें से तीन देश पहले से ही ब्रिक्स के पूर्ण सदस्य बन चुके हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • इजिप्ट (मिस्र)
  • इथियोपिया
  • दक्षिण अफ्रीका

इन तीनों सदस्य देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ने इस समिट में हिस्सा लिया। इनके अलावा चौथा देश बुरुंडी था, जिसके राष्ट्रपति को अफ्रीकी संघ के अध्यक्ष के रूप में विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था। कूटनीतिक स्तर पर यह भारत के लिए एक बड़ा अवसर था, जहां इन चारों अफ्रीकी देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अत्यंत महत्वपूर्ण और विस्तृत द्विपक्षीय बातचीत की। महेश सचदेव ने रेखांकित किया कि अफ्रीका के इन प्रमुख देशों का ब्रिक्स में शामिल होना और उनके नेताओं का भारत आकर प्रधानमंत्री मोदी से सीधी बातचीत करना इस बात का प्रमाण है कि भारत अफ्रीकी महाद्वीप के साथ अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों को कितनी गंभीरता से लेता है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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