चीन का टाइप-15 बनाम भारत का ज़ोरावर: हिमालय की ऊंचाइयों पर कौन साबित होगा बाजीगर? चीन 2 महीने पहले 104
हिमालयी सीमाओं पर भारत ने अपने स्वदेशी लाइट टैंक ज़ोरावर को उतारकर चीन के टाइप-15 को सीधी चुनौती पेश की है। आइए जानते हैं कि वजन, तकनीक और मारक क्षमता के मामले में दोनों टैंकों के बीच क्या अंतर है।

हिमालय की दुर्गम चोटियों पर सैन्य शक्ति का प्रदर्शन

आधुनिक युद्धकला में हल्के टैंक यानी लाइट टैंक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है, विशेषकर लद्दाख जैसे ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में जहां भारी-भरकम मुख्य युद्धक टैंकों का पहुंचना मुश्किल होता है। चीन के साथ सीमा पर चल रहे तनाव के बीच, भारत ने स्वदेशी रूप से विकसित 'ज़ोरावर' लाइट टैंक को पेश करके अपनी सामरिक तैयारी को एक नया आयाम दिया है। लंबे समय से चली आ रही इस जरूरत को पूरा करने के लिए भारत ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के साथ मिलकर इस अत्याधुनिक परियोजना को अंजाम दिया है।

भारत का स्वदेशी ज़ोरावर टैंक

भारतीय सेना ने काफी समय से हल्के टैंकों की कमी महसूस की थी। वर्ष 1989 में सोवियत युग के PT-76 टैंकों को सेवा से हटाने के बाद, सेना ने कई बार नए विकल्प तलाशने की कोशिश की, लेकिन साल 2020 में लद्दाख के घटनाक्रम के बाद इस परियोजना को युद्धस्तर पर शुरू किया गया। ज़ोरावर टैंक की कुछ प्रमुख खूबियां निम्नलिखित हैं:

  • इसका कुल वजन 25 टन है, जो इसे पहाड़ी ढलानों पर दौड़ने में सक्षम बनाता है।
  • इसमें 760 हॉर्सपावर का शक्तिशाली कमिंस इंजन लगा है।
  • टैंक का पावर-टू-वेट अनुपात 30 हॉर्सपावर प्रति टन है, जो इसे जबरदस्त गतिशीलता प्रदान करता है।
  • इसमें 105 मिमी की घातक कॉकरिल गन लगाई गई है, जो ऑटोलोडर से जुड़ी हुई है।
  • इसमें दुश्मन के हमलों को नाकाम करने के लिए एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) का इस्तेमाल किया गया है।
  • बेहतर निगरानी के लिए इसमें इंटीग्रेटेड यूएवी (UAV) का प्रावधान है।
  • टैंक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) दागने में भी पूरी तरह सक्षम है।

ज़ोरावर में लगा डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम और आधुनिक बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम इसे दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों, हेलीकॉप्टरों और छिपे हुए ठिकानों को ध्वस्त करने की क्षमता देता है। यह टैंक 70 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ सकता है और पानी में चलने की भी क्षमता रखता है। हंटर-किलर तकनीक, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंजफाइंडर जैसी प्रणालियों के साथ यह किसी भी आधुनिक युद्धक्षेत्र में दुश्मन के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी मल्टी-मोडल ट्रांसपोर्ट क्षमता है, जिससे इसे हवाई मार्ग, सड़क या रेल द्वारा आसानी से सीमावर्ती इलाकों तक पहुंचाया जा सकता है।

चीन का टाइप-15 लाइट टैंक

चीनी सेना ने हिमालयी क्षेत्रों में अपनी बढ़त बनाने के लिए टाइप-15 लाइट टैंक को तैनात कर रखा है। चीन का यह टैंक काफी समय से सीमा पर मौजूद है। इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • टाइप-15 का कुल वजन 36 टन है।
  • इसमें 1000 हॉर्सपावर का शक्तिशाली इंजन लगा है।
  • इसका पावर-टू-वेट अनुपात 28.5 हॉर्सपावर प्रति टन है।
  • टैंक में 105 मिमी की राइफल्ड गन लगी है, जिसकी मारक क्षमता 3 किलोमीटर तक मानी जाती है।
  • इसमें GL5 एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) दिया गया है।
  • ऑटोलोडर सिस्टम के कारण चालक दल की संख्या तीन तक सीमित है, जिससे निरंतर फायरिंग संभव है।
  • इसमें लेजर रेंजफाइंडर, बैलिस्टिक कंप्यूटर, रडार और पैनोरमिक साइट्स जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।

टाइप-15 की बनावट में कंपोजिट आर्मर का उपयोग किया गया है। चीन ने इसमें ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सैनिकों की सुविधा के लिए एयर कंडीशनिंग और ऑक्सीजन उत्पादन जैसी प्रणालियों का भी इंतजाम किया है। यह टैंक भी APFSDS और HEAT जैसे कई प्रकार के आधुनिक गोला-बारूद दागने की क्षमता रखता है।

किसका पलड़ा है भारी?

जब हम इन दोनों टैंकों की तुलना करते हैं, तो ज़ोरावर का कम वजन और अधिक पावर-टू-वेट अनुपात इसे दुर्गम इलाकों में ज्यादा तेज गतिशीलता प्रदान करता है, जो पहाड़ जैसे कठिन युद्धक्षेत्रों में एक बड़ी बढ़त है। दूसरी तरफ, टाइप-15 का वजन 36 टन है, जो इसे ज़ोरावर की तुलना में थोड़ा भारी बनाता है, लेकिन इसकी सुरक्षा कवच इसे मजबूती देता है। ज़ोरावर का इंटीग्रेटेड यूएवी इसे दुश्मन की स्थिति भांपने में बढ़त दिलाता है, जबकि टाइप-15 लंबे समय से चीन की रणनीति का हिस्सा रहा है।

हालांकि, केवल आंकड़ों से किसी टैंक की जीत तय नहीं होती। युद्ध के मैदान में चालक दल का प्रशिक्षण, सामरिक सूझबूझ, और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में टैंक का रखरखाव भी बहुत मायने रखता है। दोनों टैंक अपनी-अपनी जगह पर अत्याधुनिक हैं। जहाँ टाइप-15 अपनी मारक क्षमता और सुरक्षा के लिए जाना जाता है, वहीं ज़ोरावर अपनी फुर्ती, आधुनिक डिजिटल प्रणालियों और तैनाती की सहजता के लिए एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है। आने वाले समय में, यह स्पष्ट हो जाएगा कि 'आत्मनिर्भर भारत' का यह मिशन हिमालय की कठिन सीमाओं पर किस तरह की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। अभी के लिए, दोनों देशों के पास ऐसी मशीनें हैं जो ऊंचाई वाले युद्धक्षेत्र की तस्वीर बदलने का माद्दा रखती हैं।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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