संसद के मानसून सत्र का आखिरी दौर: क्या हल निकल पाएगा या गतिरोध रहेगा बरकरार? भारत एक घंटा पहले 2
मानसून सत्र के अंतिम दो दिनों में FCRA बिल पर तनातनी और राजनीतिक खींचतान के बीच बड़े विधेयकों के भविष्य पर चर्चा तेज हो गई है। कॉफी पर कुरुक्षेत्र में जानिए सत्र से जुड़ी इनसाइड स्टोरी।

FCRA बिल और गतिरोध का मुद्दा

संसद के मानसून सत्र के समापन की ओर बढ़ते हुए सबसे बड़ा केंद्र बिंदु FCRA बिल बना हुआ है। सरकार इस विधेयक को पारित कराने के लिए बेहद गंभीर नजर आ रही है, वहीं विपक्ष इसे वापस लेने की मांग पर अड़ा है। इस गतिरोध को तोड़ने के लिए उच्च स्तर पर प्रयास किए गए। लोकसभा अध्यक्ष और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने समाधान निकालने के लिए पहल की। इसके तहत राहुल गांधी और गृह मंत्री अमित शाह के बीच भी बातचीत कराने का प्रयास किया गया, लेकिन राहुल गांधी ने बिल के मौजूदा प्रावधानों पर चर्चा करने से इनकार कर दिया। अब ऐसी संभावना प्रबल हो गई है कि इस विवादित बिल को JPC यानी संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा जा सकता है।

सत्र का कामकाज और सरकार का प्रदर्शन

सत्र के प्रदर्शन को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच जुबानी जंग जारी है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार अपने प्रमुख विधायी एजेंडे को लागू करने में विफल रही है। इसके विपरीत, सरकार का कहना है कि उसने सदन में कामकाज की गति को बनाए रखा है। चर्चा के दौरान यह सामने आया कि सत्र के दौरान कुल नौ विधेयक पारित किए गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या में बदलाव, सार्वजनिक परीक्षाओं में धांधली रोकने संबंधी कानून, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, बैंकर बुक एविडेंस, विभिन्न टैक्सेशन कानून, विनियोग विधेयक और ट्राइब्यूनल सुधार से जुड़े महत्वपूर्ण कानून शामिल हैं। हालांकि, इन विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा न हो पाने को लेकर विपक्ष ने सरकार पर सवाल भी उठाए हैं।

छात्र आंदोलन और राजनीतिक समीकरण

सत्र के आखिरी दिनों में झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन ने पूरे राजनीतिक माहौल को बदल दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि दिल्ली के छात्र आंदोलन के बाद सरकार पर जो दबाव बना था, झारखंड में विपक्षी गठबंधन की सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन उठने से वह दबाव अब संतुलित हो गया है। इससे सत्ता पक्ष को विपक्ष पर पलटवार करने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया है।

बढ़ती राजनीतिक तल्खी

संसद भवन के बाहर बीजेपी और विपक्षी दलों के प्रदर्शनों व पोस्टरों ने दोनों पक्षों के बीच बढ़ती कड़वाहट को उजागर किया है। गृह मंत्री द्वारा सदन में जवाब देने की पेशकश के बाद विपक्ष के सामने यह चुनौती है कि क्या वे बहस के लिए तैयार होंगे। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश की राजनीति का प्रभाव भी सदन के अंदर साफ दिख रहा है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच बेहतर तालमेल को आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की एक रणनीतिक जरूरत माना जा रहा है। इस दौरान राम मंदिर का मुद्दा भी राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में रहा।

इस पूरे घटनाक्रम और भविष्य की रणनीतियों के बारे में विस्तार से जानने के लिए ऊपर दिए गए वीडियो को जरूर देखें।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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