वैश्विक संघर्षों के बीच भारत के सामने दोहरी चुनौती, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने टैरिफ और व्यापार के हथियारीकरण पर जताई चिंता राष्ट्रीय राजनीति एक दिन पहले 15
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वैश्विक मंच पर भारत के सामने मौजूद बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक चुनौतियों को रेखांकित करते हुए कहा कि बदलती दुनिया में भारत को अपनी रणनीति खुद तय करनी होगी।

नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वर्तमान समय में वैश्विक मंच पर भारत के सामने खड़ी जटिल कूटनीतिक और आर्थिक चुनौतियों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि आज की तारीख में पूरी दुनिया दो बेहद गंभीर और बड़े संघर्षों से जूझ रही है। इनमें से एक तनावपूर्ण संघर्ष खाड़ी क्षेत्र में चल रहा है, तो दूसरी तरफ यूक्रेन में युद्ध की स्थिति बनी हुई है। विदेश मंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इन दोनों ही मोर्चों पर भारत के संबंध सभी संबंधित पक्षों के साथ बेहद मजबूत और दोस्ताना हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में किसी एक पक्ष की ओर झुके बिना एक पूरी तरह संतुलित दृष्टिकोण अपनाना भारत के लिए कोई साधारण या आसान काम नहीं है।

वैश्विक संघर्ष और भारत का संतुलित दृष्टिकोण

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को अपने संबोधन में वैश्विक तनावों का जिक्र करते हुए कहा कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में संतुलन साधना बेहद जटिल हो गया है। यूक्रेन और खाड़ी देशों के संकट में भारत के हित इन दोनों ही क्षेत्रों और वहां के देशों से गहराई से जुड़े हुए हैं। दोनों ही मामलों में भारत के सभी पक्षों के साथ गहरे संबंध होने के कारण, कूटनीतिक स्तर पर एक ऐसा रास्ता निकालना जो देश के हितों की रक्षा करे, एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के कठिन समय में भारत को अपनी रणनीति खुद ही तय करनी होगी और समय के अनुसार उसमें बदलाव भी करने होंगे।

आर्थिक मोर्चे पर नई चुनौतियां: टैरिफ और व्यापार का हथियारीकरण

कूटनीतिक चुनौतियों के साथ-साथ विदेश मंत्री ने आर्थिक मोर्चे पर आ रहे बदलावों और खतरों के प्रति भी आगाह किया। उन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते हथियारीकरण की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की। जयशंकर के अनुसार, भारत के सामने प्रमुख आर्थिक चुनौतियां इस प्रकार हैं:

  • टैरिफ में बढ़ती अस्थिरता: अंतरराष्ट्रीय बाजार में टैरिफ की दरों में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव व्यापार को अस्थिर कर रहे हैं।
  • विदेशी बाजारों में डंपिंग: दूसरे देशों द्वारा अपने सामान को औने-पौने दामों पर खपाने की डंपिंग नीति भारतीय हितों के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है।
  • व्यापार का हथियारीकरण: आर्थिक नीतियों और व्यापारिक समझौतों को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है।

विदेश मंत्री ने सवाल उठाया कि इन बढ़ती चुनौतियों का सबसे प्रभावी और सुरक्षित तरीके से मुकाबला कैसे किया जाए, यह आज सबसे बड़ी चुनौती है। भारत को अपनी घरेलू आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इन कूटनीतिक हथकंडों से निपटने के मजबूत रास्ते तलाशने होंगे।

बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की नई रणनीति

जैसे-जैसे भारत का आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ रहा है, वैसे-वैसे वैश्विक मंच पर उसकी जिम्मेदारियां भी कई गुना बढ़ गई हैं। विदेश मंत्री ने बताया कि वर्तमान समय में भारत के हित पहले की तुलना में कहीं अधिक वैश्विक हो चुके हैं। भारत का अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर बढ़ा है और उसके रणनीतिक साझेदारों की संख्या में भी भारी इजाफा हुआ है। लेकिन इसके साथ ही देश के रणनीतिक परिदृश्य की जटिलता भी काफी बढ़ गई है।

बदलते हुए अंतरराष्ट्रीय माहौल के अनुकूल खुद को ढालने के लिए भारत को निरंतर अपनी रणनीतियों और प्रतिक्रियाओं को नए सिरे से तैयार करना होगा। उन्होंने कहा कि कई बार किसी बड़ी समस्या का समाधान केवल एक ही रास्ते पर चलने से नहीं मिलता, बल्कि अलग-अलग रणनीतियों और प्रतिक्रियाओं के बीच एक बेहतर संतुलन और तालमेल बिठाने से ही निकाला जा सकता है। आज भारत पहले की तुलना में कहीं अधिक देशों और क्षेत्रों के साथ मिलकर काम कर रहा है। इसी अनुपात में दुनिया की भारत से उम्मीदें भी काफी बढ़ चुकी हैं।

ग्लोबल साउथ की आवाज और भारत का अपना नजरिया

एस जयशंकर ने इस बात को गर्व के साथ रेखांकित किया कि भारत अब वैश्विक चुनौतियों और मुद्दों पर पहले से कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनी राय रख रहा है। विशेष रूप से ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों से जुड़े मसलों पर भारत एक मजबूत आवाज बनकर उभरा है। उनका मानना है कि जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे अंतरराष्ट्रीय मामलों को लेकर देश के भीतर होने वाले बौद्धिक विमर्श और चिंतन को भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ाना होगा।

उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि अब तक अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़ी ज्यादातर अवधारणाएं और विमर्श दूसरे देशों में विकसित अनुभवों पर ही आधारित रहे हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि उभरते हुए भारत को दुनिया को अपनी नजर से देखने और समझने का एक नया तरीका खुद विकसित करना चाहिए। भारत को अपने समृद्ध इतिहास, अपने अनूठे अनुभवों, अपने राष्ट्रीय हितों, अपनी मूल अवधारणाओं और यहां तक कि अपनी भाषा व शब्दावली को वैश्विक मामलों के प्रति अपने दृष्टिकोण में अधिक प्रमुखता देनी होगी। विभिन्न देशों के अलग-अलग और कभी-कभी विपरीत हितों के बीच एक सही संतुलन कैसे स्थापित किया जाए, यही आज के समय का सबसे महत्वपूर्ण विषय है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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