राजस्थान
एक घंटा पहले
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विचारों
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि भारत का इतिहास कभी भी पराधीनता या गुलामी का नहीं रहा, बल्कि यह विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध एक अटूट संघर्ष की गौरवशाली गाथा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हल्दीघाटी का युद्ध महज महाराणा प्रताप या उनकी सेना तक सीमित कोई टकराव नहीं था, बल्कि यह समूचे समाज के सामूहिक प्रतिरोध का एक महान प्रतीक था।
संघ प्रमुख ने जोर देते हुए कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण और यहां तक कि स्वयं मुगल इतिहासकारों के लेखन से यह स्पष्ट होता है कि हल्दीघाटी के युद्ध में असली जीत महाराणा प्रताप की ही हुई थी। उन्होंने महाराणा प्रताप को 'हिंदुआ सूरज' यानी सन ऑफ हिन्दू कहकर संबोधित किया।
किस अवसर पर हुआ संबोधन
मोहन भागवत बुधवार को उदयपुर में आयोजित 'राष्ट्र चेतना संकल्प सभा' को संबोधित कर रहे थे। यह सभा महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती और हल्दीघाटी के युद्ध में मिली विजय की 450वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित की गई थी।
इस मौके पर उन्होंने कहा कि आज पूरे देश में महाराणा प्रताप की जयंती गहरी श्रद्धा और गर्व के साथ मनाई जाती है, जो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि हमारा राष्ट्र उन महापुरुषों को सदैव स्मरण रखता है जिन्होंने स्वाभिमान, स्वतंत्रता और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए जीवनभर संघर्ष किया।
हल्दीघाटी में हार गई थी मुगल सेना
दोनों पक्षों की सैन्य ताकत और संसाधनों की तुलना करते हुए भागवत ने कहा कि हल्दीघाटी के युद्ध में सेना के आकार, संसाधनों और हथियारों के मामले में मुगलों का पलड़ा कहीं भारी था, जबकि महाराणा प्रताप के पास सीमित संसाधन और छोटी सैन्य शक्ति थी; इसके बावजूद उन्होंने संघर्ष का रास्ता कभी नहीं छोड़ा।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारतीय समाज ने कभी भी सहजता से अधीनता स्वीकार नहीं की और जब-जब किसी आक्रांता ने इस धरती पर कब्जा जमाने का प्रयास किया, तब-तब प्रतिरोध की प्रक्रिया तत्काल शुरू हो गई।
उन्होंने बताया कि इतिहास को अक्सर एक खास नैरेटिव के तहत प्रस्तुत किया गया है, जबकि मुगल इतिहासकारों ने स्वयं लिखा है कि युद्ध के दौरान मुगल सेना को पीछे हटने पर विवश होना पड़ा था।
युद्ध के चरणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि शुरुआती हमले में ही मुगल सेना पीछे हट गई थी। दूसरे चरण में प्रताप की सेना और उनके घोड़े चेतक की वीरता ने दुश्मनों को भारी क्षति पहुंचाई, और तीसरे चरण के बाद मुगलों की स्थिति ऐसी हो गई कि वे खुलकर आगे बढ़ने का साहस नहीं जुटा सके और केवल अपनी जान बचाने में लगे रहे।
बप्पा रावल और ललितादित्य का स्मरण
संघ प्रमुख ने याद दिलाया कि पश्चिम से उठी आक्रामकता की लहर को भारत में बप्पा रावल और ललितादित्य जैसे वीरों ने नाकाम कर दिया था। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज ने अनेक कठिनाइयों को झेलते हुए भी अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखा है और संकट के समय के साथ-साथ सामान्य परिस्थितियों में भी समाज को एकजुट रहने की जरूरत है।
बाबू कुंवर सिंह का उदाहरण देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि इतिहास प्रायः विजेताओं या सत्ता के निकट रहने वालों के दृष्टिकोण से लिखा गया है, इसलिए हल्दीघाटी के युद्ध से जुड़े तथ्यों की भी फिर से पड़ताल करने की नितांत आवश्यकता है।
'धर्म और स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया'
महाराणा प्रताप को 'हिंदुआ सूरज' बताते हुए भागवत ने कहा कि उन्होंने कभी अपने धर्म, स्वाभिमान या मूल्यों से समझौता नहीं किया और उनका संघर्ष सत्ता के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र की रक्षा के लिए था। उन्होंने युवा पीढ़ी से प्रताप के आदर्श प्रशासन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया।
इसी सभा में निम्बार्क पीठ के प्रमुख श्रीजी श्यामचरण महाराज ने भी उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए समाज में एकता, संगठन और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने लोगों से विभाजनकारी प्रवृत्तियों को छोड़कर सद्भाव, एकता और राष्ट्रहित के मार्ग पर चलने का आग्रह किया।
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