टीएमसी में बगावत: क्या बागी सांसदों का गुट सच में 'दो-तिहाई' तक पहुंच गया, ममता की स्थिति क्या है? राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 6
पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर बगावत की चर्चा तेज है। बागी बताए जा रहे सांसदों की संख्या 19 है, जो पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों के दो-तिहाई आंकड़े को पार करती है।

पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों एक ही सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है — क्या तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतुष्ट सांसदों का ऐसा खेमा खड़ा हो चुका है, जो पार्टी के लोकसभा सांसदों के दो-तिहाई आंकड़े तक जा पहुंचा है? शुरुआत में 17 सांसदों के नाम सामने आए, जिनमें कई नाम चौंकाने वाले रहे। दावा यह है कि ये सांसद एक नया गुट बनाकर पार्टी से अलग हो गए हैं। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या वाकई यह संख्या दो-तिहाई तक पहुंचती है?

पहले समझें पूरा गणित

पश्चिम बंगाल में लोकसभा की कुल 42 सीटें हैं। इनमें से टीएमसी के पास 28 सांसद हैं, बीजेपी के पास 12 और कांग्रेस के पास 1 सांसद है, जबकि बशीरहाट की 1 सीट खाली है।

अब अगर सिर्फ टीएमसी के 28 सांसदों को आधार बनाया जाए, तो दो-तिहाई संख्या 18.66 बनती है। यानी व्यावहारिक रूप से अगर 19 सांसद किसी गुट के साथ खड़े हो जाएं, तो वह दो-तिहाई के आंकड़े को छू लेता है। यहीं से असली राजनीतिक उठापटक शुरू होती है।

बागी खेमे में बताए जा रहे 19 सांसद

राजनीतिक गलियारों में जिन सांसदों के नाम लिए जा रहे हैं, उनकी संख्या 19 बताई जा रही है। इस सूची में शामिल नाम इस प्रकार हैं:

  • कूचबिहार से जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया
  • जंगीपुर से खलीलुर रहमान
  • बहरामपुर से यूसुफ पठान
  • मुर्शिदाबाद से अबू ताहेर खान
  • बैरकपुर से पार्थ भौमिक
  • बारासात से काकोली घोष दस्तिदार
  • मथुरापुर से बापी हलदार
  • जादवपुर से सायोनी घोष
  • कोलकाता दक्षिण से माला रॉय
  • आरामबाग से मिताली बाग
  • घाटाल से देव अधिकारी
  • झाड़ग्राम से कालीपदा सोरेन
  • मेदिनीपुर से जून मालिया
  • बांकुड़ा से अरूप चक्रवर्ती
  • बर्धमान पूर्व से शर्मिला सरकार
  • आसनसोल से शत्रुघ्न सिन्हा
  • बोलपुर से असित कुमार माल
  • बीरभूम से शताब्दी रॉय
  • हुगली से रचना बनर्जी

अगर इस पूरी सूची को सही मान लिया जाए और ये सभी सांसद एकजुट होकर किसी अलग राजनीतिक रास्ते पर खड़े हो जाएं, तो आंकड़ा सीधे 19 तक पहुंच जाता है।

दो-तिहाई का आंकड़ा क्यों इतना अहम है?

भारत में दल-बदल कानून के तहत किसी राजनीतिक दल में टूट या विलय से जुड़े मामलों में संख्या का बेहद बड़ा महत्व होता है। पहले अलग गुट यानी स्प्लिट बनाने के लिए अलग प्रावधान हुआ करता था, लेकिन अब संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत मुख्य रूप से विलय का ही रास्ता बचा है। आम तौर पर दो-तिहाई विधायकों या सांसदों का समर्थन किसी बड़े राजनीतिक कदम को कानूनी और राजनीतिक मजबूती देता है। यही कारण है कि 19 का आंकड़ा महज एक संख्या नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत का प्रतीक बन जाता है।

हालांकि सिर्फ संख्या जुटा लेना ही पर्याप्त नहीं होता। इसके आगे कई संवैधानिक, कानूनी और प्रक्रियागत सवाल भी खड़े हो जाते हैं।

क्या वाकई टीएमसी टूटने की कगार पर है?

कहानी यहीं दिलचस्प हो जाती है। राजनीतिक चर्चा और जमीनी राजनीतिक कार्रवाई में बड़ा अंतर होता है। किसी सांसद का किसी नेता के संपर्क में रहना, किसी आयोजन में हिस्सा लेना या पार्टी नेतृत्व से नाराज होना — यह जरूरी नहीं कि वह पार्टी ही छोड़ने जा रहा हो। लेकिन जिस तरह ममता के सांसद खुलकर बयानबाजी कर रहे हैं और बीजेपी नेताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं, उससे संकेत साफ है कि ममता के घर में सेंध लग चुकी है।

बीजेपी को इसका क्या फायदा?

लोकसभा में पहले से 12 सांसदों वाली बीजेपी लंबे समय से बंगाल में अपना विस्तार करने की कोशिश में जुटी है। टीएमसी के भीतर किसी भी तरह की कमजोरी विपक्ष के लिए मौके में बदल सकती है। हालांकि यह भी सच है कि बंगाल में राजनीतिक समीकरण कई बार अचानक बदलते देखे गए हैं, लेकिन चुनाव नजदीक आते-आते तस्वीर पूरी तरह अलग हो जाती है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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