मानसून में रफ्तार पकड़ेगा मछली पालन, इस सीजन तगड़ी कमाई चाहिए तो 15 जून से पहले निपटा लें ये जरूरी काम जीवनशैली एक घंटा पहले 2
मानसून के साथ मत्स्य पालन का नया सत्र शुरू होने वाला है और 15 जून से मछली बीज वितरण शुरू हो जाएगा। इससे पहले तालाब की जुताई, चूने का प्रयोग और प्राकृतिक चारे की व्यवस्था जैसी तैयारियां पूरी करना बेहतर मुनाफे की कुंजी मानी जा रही है।

बारिश का मौसम आते ही मत्स्य पालन का नया सत्र दस्तक देने जा रहा है। ऐसे समय में मछली पालकों के लिए वैज्ञानिक तरीके से तालाब को तैयार करना सबसे अहम कदम होता है। बिलासपुर के सहायक मत्स्य पालन अधिकारी दीनदयाल के मुताबिक 15 जून से मछली बीज वितरण की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। उन्होंने सलाह दी कि इससे पहले किसान तालाब की जुताई, चूने का प्रयोग, प्राकृतिक चारा तैयार करना और मछलियों के स्वास्थ्य प्रबंधन से जुड़ी सभी तैयारियां पूरी कर लें। उनका कहना है कि सही समय पर उचित प्रबंधन करने से मछलियों की बढ़त तेज होती है, उत्पादन बढ़ता है और किसानों को बेहतर लाभ हाथ लगता है।

सबसे पहले तालाब की तैयारी

अधिकारी ने बताया कि मछली पालन की असली शुरुआत तालाब की तैयारी से ही होती है। जिन तालाबों का पानी गर्मी के दौरान सूख जाता है, उनकी अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए। वहीं बारहमासी तालाबों में प्रति हेक्टेयर करीब 100 kg चूने का इस्तेमाल जरूरी बताया गया है। इससे तालाब में मौजूद हानिकारक जीवाणु और कीटाणु नियंत्रित होते हैं और मछलियों के लिए अनुकूल माहौल बन जाता है।

मछली बीज डालने से पहले यह कदम

उन्होंने आगे बताया कि मछली बीज डालने से 24 घंटे पहले तालाब में प्राकृतिक चारे का इंतजाम कर लेना चाहिए। इसके लिए गोबर खाद, सरसों खली और सिंगल सुपर फॉस्फेट का उपयोग किया जाता है। इन सामग्रियों के प्रयोग से तालाब में प्लैंकटन पनपते हैं, जो मछलियों के बच्चों का मुख्य भोजन होते हैं।

तालाब में इस तरह तैयार करें चारा

जिन तालाबों में पहले से पानी भरा हुआ है, वहां किनारे पर एक गड्ढा बनाकर उसमें गोबर खाद, सरसों खली और सुपर फॉस्फेट मिलाकर दो दिनों तक सड़ने के लिए छोड़ देना चाहिए। तीसरे दिन इस मिश्रण को तालाब में डालने पर प्लैंकटन तेजी से बढ़ते हैं, जिससे मछलियों को भरपूर भोजन मिलता है।

प्लैंकटन क्यों है मछली बीज का सहारा

मत्स्य पालन अधिकारी ने समझाया कि मछली बीज बेहद छोटे आकार के होते हैं और बड़े दानों वाला चारा नहीं खा पाते। यही वजह है कि तालाब में प्लैंकटन तैयार किए जाते हैं। ये सूक्ष्म पौधे और जीव-जंतु होते हैं, जिन्हें मछलियों के बच्चे आसानी से खाकर तेजी से बढ़ते हैं।

नियमित चारे से बेहतर बढ़ोतरी

मछली बीज छोड़ने के बाद सरसों खली को पानी में भिगोकर पतला घोल बनाकर तालाब में डालना चाहिए। इसके करीब 15 दिन बाद धान से निकलने वाले कोड़हा यानी भूसी मिश्रित अवशेष का इस्तेमाल भी चारे के रूप में किया जा सकता है। नियमित रूप से चारा देने से मछलियों की वृद्धि अच्छी होती है और मृत्यु दर भी घटती है।

समय-समय पर मछलियों की जांच जरूरी

हर दो महीने में जाल लगाकर मछलियों की बढ़त और सेहत की पड़ताल करनी चाहिए। इससे यह साफ हो जाता है कि मछलियां ठीक से बढ़ रही हैं या नहीं, और किसी बीमारी के लक्षण भी समय रहते पकड़ में आ जाते हैं।

बीमारी दिखे तो चूने का छिड़काव

अगर मछलियां बीमार नजर आएं तो चूने का घोल बनाकर तालाब के चारों ओर डालना चाहिए। इससे तालाब में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और कीटाणु नष्ट होते हैं और मछलियों की सेहत में सुधार आता है।

साल में दो बार उत्पादन संभव

दीनदयाल रात्रि के मुताबिक उचित प्रबंधन अपनाने पर साल में दो बार मछली उत्पादन लिया जा सकता है। बड़ी मछलियों को समय-समय पर निकालते रहने से छोटी मछलियों को पर्याप्त जगह और भोजन मिलता है, जिससे उनकी बढ़त भी तेज होती है। उन्होंने बताया कि कुछ पुरानी प्रजातियों की मछलियां महज तीन महीने में ही बाजार योग्य आकार हासिल कर लेती हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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