AI-171 हादसे के इकलौते जीवित यात्री विश्वास कुमार रमेश की पीड़ा: 'जिंदा बचना ही सबसे बड़ी सजा बन गई'
गुजरात
2 घंटे पहले
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विचारों
एयर इंडिया की उड़ान AI-171 के हादसे ने विश्वास कुमार रमेश को दुनिया भर में 'चमत्कारी इंसान' बना दिया, क्योंकि बोइंग 787 के मलबे से जीवित निकलने वाले वे अकेले यात्री थे, जबकि इस त्रासदी में 260 लोगों की जान चली गई थी। मगर हादसे को एक साल बीत जाने के बाद विश्वास कुमार कहते हैं कि उनके लिए जिंदा बच जाना मुश्किलों का अंत नहीं, बल्कि एक नई जंग की शुरुआत थी। भले ही उन्हें सबसे भाग्यशाली कहा जा रहा हो, लेकिन वे खुद इस भयावह सदमे से उबरने के लिए आज भी जूझ रहे हैं।
बच तो गए, पर मन के घाव नहीं भरे
हादसे की पहली बरसी पर जारी एक बयान में विश्वास कुमार ने कहा, "लोग सिर्फ इतना देखते हैं कि मैं बच गया, लेकिन बंद दरवाजों के पीछे चलने वाली मेरी लड़ाई किसी को नजर नहीं आती। आज भी मुझे नींद न आने, बेचैनी और तकलीफदेह यादों से जूझना पड़ता है। पूरा एक साल गुजर जाने के बावजूद मैं अपनी जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने और अपने परिवार की हरसंभव मदद करने की कोशिश में लगा हूं।"
हादसे में भाई को खोया
12 जून, 2025 को अहमदाबाद हवाई अड्डे से लंदन के गैटविक एयरपोर्ट के लिए रवाना हुआ बोइंग 787 ड्रीमलाइनर उड़ान भरने के महज 32 सेकंड बाद ही BJ मेडिकल कॉलेज परिसर में जा गिरा था। इस हादसे में विमान में सवार 242 में से 241 लोगों और जमीन पर मौजूद 19 लोगों की मौत हो गई थी। भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक विश्वास कुमार रमेश घायल हालत में जिंदा बच गए, लेकिन विमान में दूसरी जगह बैठे उनके भाई अजय की जान नहीं बच सकी।
'सिर्फ जिंदा रहना ही पूरी कहानी नहीं'
विश्वास कुमार ने कहा, "मैं जिंदा रहने के लिए शुक्रगुजार हूं, मगर महज सांसें चलते रहना ही पूरी दास्तान नहीं है। उसके बाद मैंने जो कुछ सहा, वह इतना कठिन था कि उसे शब्दों में बयां कर पाना मुमकिन नहीं।" उनकी ये बातें 40 वर्षीय विश्वास पर पड़े गहरे भावनात्मक असर को बयां करती हैं, जो भारत के सबसे भयावह विमान हादसों में से एक के इकलौते जीवित यात्री के रूप में अचानक चर्चा के केंद्र में आ गए थे।
'हर ओर लाशें देखकर सहम गया था'
हादसे के तुरंत बाद खून से सने और लंगड़ाते हुए विश्वास कुमार की तस्वीरें टीवी और सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गई थीं। कुछ घंटों बाद अस्पताल के बिस्तर से बात करते हुए उन्होंने बताया कि मलबे और शवों के बीच उनकी आंख कैसे खुली और फिर वे किसी तरह सुरक्षित जगह तक पहुंचे। उन्होंने कहा, "जब मेरी आंख खुली तो मेरे चारों ओर लाशें बिखरी थीं। मैं डर गया था। मैं उठा और भागने लगा।"
एक साल बाद भी नींद और यादों से जंग
इस हादसे में उनके भाई अजय कुमार रमेश की मौत हुई, जो भारत में परिवार से मिलने के बाद उनके साथ लंदन लौट रहे थे। बीते एक साल में कई इंटरव्यू में विश्वास कुमार ने बार-बार इसका जिक्र किया है और इसे इस त्रासदी का सबसे गहरा घाव बताया है। दुर्घटनास्थल के मंजर, खुद के चमत्कारिक तरीके से बचने और भाई की मौत की भयावह यादें आज भी उन्हें परेशान करती हैं। उनके मुताबिक, शरीर के जख्म तो भर गए, मगर मन के घावों से उबरना कहीं ज्यादा कठिन साबित हुआ।
भाई की मौत, जमा-पूंजी का नुकसान और अकेलापन
दोस्तों और परिजनों के मुताबिक, विश्वास कुमार को हादसे की बार-बार लौटती यादों, नींद न आने और उस घटना के बाद जिंदगी में दोबारा ढलने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जिसमें उनके आसपास मौजूद लगभग हर शख्स की जान चली गई थी। इस त्रासदी ने आर्थिक संकट भी खड़ा कर दिया। पहले सामने आई जानकारी के अनुसार, विश्वास कुमार और उनके भाई अजय ने अपनी बचत का बड़ा हिस्सा भारत में मछली पकड़ने के कारोबार में लगाया था। हादसे और अजय की मौत के बाद परिवार की सारी योजनाएं अधर में लटक गईं, जिसने पहले से ही बेहद कठिन रहे उस साल में उनका तनाव और बढ़ा दिया।
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