खेत की मेड़ पर सागवान और बीच में मौसमी: पलामू के किसान का यह दोहरा कमाई मॉडल हुआ बेहद सफल झारखंड एक महीने पहले 64
झारखंड के पलामू जिले के एक प्रगतिशील किसान ने अपनी चार एकड़ जमीन पर सागवान और मौसमी का एक शानदार एकीकृत कृषि मॉडल तैयार किया है, जिससे भविष्य में लाखों रुपये की आमदनी तय मानी जा रही है।

झारखंड के पलामू जिले के एक प्रगतिशील किसान ने पारंपरिक फसलों की खेती से अलग हटकर कृषि क्षेत्र में एक अनूठा और बेहद लाभकारी प्रयोग किया है। आज के समय में जब किसान पारंपरिक खेती से कम आय होने की शिकायत करते हैं, तब इस किसान ने अपनी चार एकड़ की कृषि भूमि को एक अत्यंत आधुनिक और मुनाफेदार कृषि मॉडल में तब्दील कर दिया है। इस अनोखे मॉडल के तहत उन्होंने खेत की बाहरी सीमाओं पर बेशकीमती सागवान के पौधे लगाए हैं, जबकि बीच के मुख्य हिस्से में रसदार मौसमी का बाग विकसित किया है। कृषि का यह एकीकृत मॉडल न केवल वर्तमान में फसलों की विविधता को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि आने वाले वर्षों में किसान के लिए दोहरा मुनाफा सुनिश्चित करने वाला है।

सीमा पर सागवान और मुख्य हिस्से में मौसमी का अनूठा संगम

पलामू जिले के बसना गांव के रहने वाले किसान सतीश दुबे ने अपनी 4 एकड़ जमीन पर इस नायाब कृषि मॉडल को धरातल पर उतारा है। सतीश दुबे का मानना है कि केवल पारंपरिक फसलों के भरोसे खेती को मुनाफे का सौदा बनाना मुश्किल है। इसलिए उन्होंने दूरगामी योजना बनाई। उन्होंने अपने खेत के चारों ओर की मेड़ पर टिशू कल्चर विधि से तैयार किए गए सागवान के दोहरे पौधों की कतारें लगाई हैं। इसके साथ ही, खेत के मुख्य हिस्से का व्यावसायिक उपयोग करने के लिए उन्होंने वहां करीब 800 नटाल प्रजाति के मौसमी के पौधे रोपे हैं। उन्होंने जमीन के बेहतर उपयोग का पूरा ध्यान रखा है और मौसमी के पौधों के बीच बची खाली जगहों को भी खाली नहीं छोड़ा है। इस खाली जमीन पर वे अन्य सहायक फसलों की खेती (इंटरक्रॉपिंग) कर रहे हैं, जिससे उन्हें लगातार अतिरिक्त आमदनी मिल रही है और जमीन का एक-एक इंच हिस्सा उपयोगी बन गया है।

नागपुर से लाए गए विशेष टिशू कल्चर पौधे

अपनी इस परियोजना को सफल बनाने के लिए सतीश दुबे ने पौधों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया। वे उन्नत किस्म के पौधों की खोज में विशेष रूप से महाराष्ट्र के नागपुर गए और वहां की प्रसिद्ध ग्रीन नर्सरी से टिशू कल्चर तकनीक वाले सागवान के पौधे खरीदे। इन पौधों को चुनने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं:

  • साधारण सागवान के पौधों की तुलना में टिशू कल्चर वाले पौधों की वृद्धि बहुत तीव्र गति से होती है।
  • इन पौधों की ऊंचाई सामान्य पेड़ों से अधिक होती है, जिससे इनसे मिलने वाली लकड़ी की लंबाई और गुणवत्ता काफी बेहतर होती है।
  • इनमें बीमारियां लगने की आशंका बेहद न्यूनतम होती है, जिससे इनकी देखरेख में अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ती।
  • भविष्य में बाजार में इस उच्च गुणवत्ता वाली सागवान की लकड़ी की बेहद शानदार कीमत मिलने की पूरी उम्मीद है।

पलामू की जलवायु और सिट्रस फलों की अनुकूलता

सतीश दुबे ने मौसमी की खेती का फैसला पलामू के वातावरण को ध्यान में रखकर लिया। उनका कहना है कि पलामू जिले की जलवायु और मिट्टी की प्रकृति सिट्रस यानी खट्टे फलों के उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल है। इसी वजह से उन्होंने बंपर पैदावार और उत्कृष्ट मिठास के लिए पहचानी जाने वाली नटाल प्रजाति की मौसमी के पौधों को अपने बाग के लिए चुना। अपनी इस शुरुआती सफलता से उत्साहित होकर वे आने वाले समय में अपने इसी खेत के एक हिस्से में नींबू का एक नया बाग लगाने की भी योजना बना रहे हैं। इससे उनके खेत में फसलों की विविधता और बढ़ेगी, जिससे उनकी नियमित आय में भी भारी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।

लागत और बंपर मुनाफे का पूरा समीकरण

इस पूरे प्रोजेक्ट के आर्थिक पहलू की जानकारी देते हुए सतीश दुबे ने बताया कि इस एकीकृत मॉडल को पूरी तरह स्थापित करने में अब तक उनका लगभग 5 से 7 लाख रुपये का खर्च आया है। यह खर्च मुख्य रूप से उन्नत पौधों की खरीद, भूमि की तैयारी और सिंचाई व्यवस्था पर हुआ है। हालांकि, उन्हें इस निवेश के बदले मिलने वाले रिटर्न पर पूरा भरोसा है। उनका गणित इस प्रकार है:

  • लगभग 5 साल की अवधि बीतने के बाद जब मौसमी के ये पौधे पूरी तरह से फल देने के लिए परिपक्व हो जाएंगे, तब केवल मौसमी की बिक्री से ही प्रति सीजन लगभग 15 से 16 लाख रुपये की बंपर आमदनी होने का अनुमान है।
  • इसके साथ ही, खेत की सीमाओं पर लगे सागवान के पेड़ जब अगले कुछ वर्षों में परिपक्व होकर इमारती लकड़ी के रूप में तैयार हो जाएंगे, तो उन्हें बेचकर लाखों रुपये की एकमुश्त अतिरिक्त कमाई होगी।
  • इस तरह एक ही भूमि खंड से किसान को लघु अवधि में मौसमी से और दीर्घ अवधि में सागवान से दोहरा आर्थिक लाभ मिलेगा।

देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से पूरी तरह जैविक खेती

सतीश दुबे की इस आधुनिक खेती की एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पूरी तरह से जैविक खेती (ऑर्गेनिक फार्मिंग) कर रहे हैं। वे अपने खेत में रासायनिक खादों और सिंथेटिक कीटनाशकों का बिल्कुल भी उपयोग नहीं करते। इसके स्थान पर वे पूरी तरह से प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं:

  • पौधों के समुचित विकास और पोषण के लिए केवल देसी गाय के गोबर से बनी प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल किया जाता है।
  • फसलों को कीटों और बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए गोमूत्र और अन्य जैविक औषधियों का छिड़काव किया जाता है।

सतीश दुबे को बचपन से ही पेड़-पौधों और बागवानी का गहरा शौक रहा है। वे जब भी किसी नए स्थान के भ्रमण पर जाते हैं, वहां की सफल कृषि तकनीकों और नए पौधों के बारे में जानकारी जरूर एकत्र करते हैं। इसके बाद वे उन तकनीकों को अपने खेत की परिस्थितियों के अनुसार अपनाने की कोशिश करते हैं। उनका मानना है कि पर्यावरण-अनुकूल जैविक खेती और वैज्ञानिक कृषि तकनीकों का सही समन्वय ही देश के किसानों की आर्थिक दशा को सुधारने का सबसे सशक्त माध्यम है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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