राष्ट्रीय राजनीति
2 घंटे पहले
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विचारों
लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के लिए जरूरी है असहमति
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए अभिव्यक्ति की आजादी और वैचारिक असहमति को सबसे मजबूत रीढ़ माना गया है। इसी महत्वपूर्ण विषय पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने एक बेहद प्रेरणादायक और स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल पूछना या व्यवस्था से अलग राय रखना कोई अवज्ञा या अनुशासनहीनता नहीं है। इसके विपरीत, यह तो नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक जिम्मेदारी का एक अनिवार्य हिस्सा है।
जस्टिस भुइयां ने यह बात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली (NLU Delhi) के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित नव-स्नातकों और कानूनविदों के सामने लोकतंत्र की गरिमा, अभिव्यक्ति के अधिकार और अकादमिक संस्थानों की जिम्मेदारियों पर खुलकर अपने विचार साझा किए।
छात्रों को अलग विचार रखने या सवाल पूछने पर डराना असंवैधानिक
अपने संबोधन में जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की स्वतंत्रता का दृढ़ता से समर्थन किया। उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि छात्रों को सिर्फ इसलिए डराया-धमकाया नहीं जा सकता क्योंकि वे एक अलग दृष्टिकोण रखते हैं या किसी मुद्दे पर सवाल पूछते हैं। उन्हें सजा की धमकी देना पूरी तरह से गलत और अलोकतांत्रिक है।
जस्टिस भुइयां ने कहा, लोकतंत्र में सवाल करने का अधिकार अवज्ञा का काम नहीं है। यह नागरिकता, आजादी और संवैधानिक जिम्मेदारी का एक जरूरी अभिव्यक्ति है। उन्होंने आगे कहा कि जब छात्र किसी विषय पर एक अलग नजरिया सामने रखते हैं या सत्ता और व्यवस्था से सवाल करते हैं, तो उन्हें दंडित करने की धमकी नहीं दी जानी चाहिए। ऐसा करना पूरी तरह से गैर-संवैधानिक है और इसे सत्ता तथा पद का दुरुपयोग माना जाएगा। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान समाज या शैक्षणिक संस्थानों में विचारों की एकरूपता की मांग नहीं करता। लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए असहमति और स्वतंत्र विचारों को फलने-फूलने का अवसर मिलना अत्यंत आवश्यक है।
विश्वविद्यालयों का काम केवल डिग्री बांटना नहीं
जस्टिस भुइयां ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि शैक्षणिक संस्थानों को केवल डिग्री देने वाले केंद्रों में नहीं बदला जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल अकादमिक डिग्रियां देने तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनका मुख्य कार्य छात्रों के भीतर स्वतंत्र सोच विकसित करना होना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शैक्षणिक संस्थानों को अपने परिसरों के भीतर ऐसा अनुकूल माहौल बनाना चाहिए जहां छात्र स्वतंत्र होकर विचार कर सकें, सवाल उठाने की क्षमता विकसित कर सकें और बेहद तर्कपूर्ण तरीके से अपनी असहमति व्यक्त कर सकें। समाज के बौद्धिक और लोकतांत्रिक विकास के लिए यह बेहद जरूरी है।
वकालत केवल रोजी-रोटी नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका
वकालत के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे नए वकीलों को प्रेरित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज ने इस पेशे की नैतिक बारीकियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कानून का पेशा कई ऐसी नैतिक जिम्मेदारियों और आदर्शों पर टिका है, जिनमें से अधिकांश किसी भी लिखित नियम या पुस्तक में दर्ज नहीं हैं। पेशेवर ईमानदारी को अक्षुण्ण रखने के लिए बहुत साहस और मजबूत दृढ़ विश्वास की आवश्यकता होती है।
इस संदर्भ में उन्होंने अमेरिकी न्यायाधीश जस्टिस ओलिवर वेंडेल होम्स के विचारों का विशेष उल्लेख किया। जस्टिस होम्स का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वकालत को केवल अपनी आजीविका चलाने या पैसा कमाने का जरिया नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे जीवन जीने के एक तरीके के रूप में अपनाया जाना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा, एक शानदार जीवन जीने का मतलब केवल धन और प्रसिद्धि हासिल करना नहीं होता। इसका वास्तविक अर्थ यह है कि व्यक्ति खुद से बड़ी किसी चीज के लिए लगातार संघर्ष करे और समाज में न्याय की स्थापना के लिए समर्पित रहे। उन्होंने स्नातक हो रहे छात्रों को सचेत किया कि उनके पेशेवर जीवन में बार-बार उनके साहस, उनकी प्रतिबद्धता और उनके चरित्र की कठिन परीक्षा होगी। उन्होंने कहा कि ईमानदारी की राह कठिन है, विशेषकर तब जब कोई आपको देख नहीं रहा हो, लेकिन इसी कठिन परीक्षा में एक सार्थक और गरिमापूर्ण जीवन की नींव छिपी है।
न्यायपालिका और अकादमिक जगत एक-दूसरे के पूरक
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने न्याय व्यवस्था और शैक्षणिक संस्थानों के बीच के मजबूत अंतर्संबंधों पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि मजबूत अकादमिक संस्थान देश की न्यायपालिका के लिए एक अमूल्य संपत्ति की तरह होते हैं। न्यायपालिका जहां महत्वपूर्ण और जटिल कानूनी मामलों में आवश्यक बौद्धिक इनपुट के लिए अकादमिक जगत की तरफ देख सकती है, वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालय कानून के विभिन्न क्षेत्रों में शोध और अनुसंधान को बढ़ावा देकर न्याय व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ बनाने का काम कर सकते हैं।
उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि न्यायपालिका और अकादमिक जगत को कभी भी एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि वे वास्तव में एक-दूसरे के पूरक हैं जो देश में कानून के शासन को बनाए रखने में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं।
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