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2 घंटे पहले
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सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के मामलों में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि किसी भी सरकारी कर्मी को केवल इस आधार पर नौकरी से नहीं हटाया जा सकता कि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत यह कहता है कि किसी भी व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का मौका मिलना अनिवार्य है, खासकर जब मामला उनकी रोजी-रोटी और सेवा समाप्ति से जुड़ा हो। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने एक सिपाही को नौकरी से हटाने के निर्णय को पूरी तरह से अवैध और अनुचित करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक कर्मचारी को किसी अपराध में दोषी करार नहीं दिया जाता, तब तक उसे महज लंबित केस के चलते सेवामुक्त नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायालय की बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि संबंधित कर्मचारी को इसलिए नहीं हटाया गया कि वह किसी अपराध का दोषी पाया गया था, बल्कि आधार केवल लंबित चल रहा क्रिमिनल केस था। कोर्ट ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं मिला जो नियोक्ता को किसी ऐसे कर्मचारी को हटाने का अधिकार देता हो, जो पुलिस महकमे में एक दशक से अधिक समय से अपनी सेवाएं दे रहा था। कोर्ट के अनुसार, बिना किसी ठोस आधार और उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना नौकरी से निकाला जाना कानून की नजर में सही नहीं ठहराया जा सकता है। इस प्रकार, इस निर्णय ने सरकारी सेवा की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा संदेश दिया है।
मुआवजे का आदेश और पुरानी पृष्ठभूमि
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दो दशक से भी लंबा समय बीत जाने के कारण कर्मचारी को दोबारा नौकरी पर बहाल करने का निर्देश नहीं दिया। इसके बजाय, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कोर्ट ने पंजाब सरकार को आदेश दिया कि वह अपीलकर्ता को 5 लाख रुपये का हर्जाना प्रदान करे। गौरतलब है कि यह मामला वर्ष 2002 का है, जब संबंधित व्यक्ति को ड्यूटी जॉइन नहीं करने दी गई थी। अपीलकर्ता को साल 1991 में पंजाब पुलिस में स्पेशल पुलिस ऑफिसर के तौर पर भर्ती किया गया था, जिसके बाद उसका चयन पटियाला की फर्स्ट इंडियन रिजर्व बटालियन में सिपाही के पद पर हुआ था। इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में न्यायिक सेवा परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों को भी बड़ी राहत दी है, जिसके तहत अब जज बनने के लिए केवल 1 साल का वकालत का अनुभव ही अनिवार्य कर दिया गया है।
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