चीन
एक घंटा पहले
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विचारों
एशिया-प्रशांत में ताकत का नया प्रदर्शन
क्या प्रशांत महासागर के ऊपर मंडराते हुए चीन और रूस के बमवर्षक विमानों ने वैश्विक शक्ति संतुलन को एक नई चुनौती दी है? एक ऐसे नाजुक मोड़ पर जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पूरा ध्यान पश्चिम एशिया में छिड़े ईरान-इजरायल संकट को संभालने पर है, चीन और रूस ने अपनी बढ़ती जुगलबंदी का प्रदर्शन करते हुए जापान के पास एक संयुक्त हवाई गश्त (Joint Strategic Air Patrol) को अंजाम दिया है। यह सैन्य गतिविधि ऐसे क्षेत्र में देखी गई है, जिसे अमेरिका और उसके करीबी सहयोगी देश अपनी सुरक्षा का मुख्य केंद्र मानते हैं। इस संयुक्त सैन्य मिशन के बाद जापान को भी अपने लड़ाकू विमान तत्काल प्रभाव से हवा में उतारने पड़े ताकि स्थिति पर नजर रखी जा सके।
गश्त का विवरण और सैन्य क्षमता
चीनी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह दोनों देशों की वायु सेनाओं द्वारा संचालित 11वीं संयुक्त लंबी दूरी की रणनीतिक गश्त थी। बीजिंग ने अपने आधिकारिक बयान में इसे क्षेत्रीय शांति और स्थिरता की रक्षा करने के लिए दोनों देशों के साझा संकल्प और क्षमता का प्रदर्शन बताया है। हालांकि, इस सैन्य गतिविधि ने जापान के रक्षा तंत्र को तुरंत सक्रिय कर दिया। जापानी रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, शनिवार को हुई इस हरकत पर सुबह से दोपहर तक कड़ी निगरानी रखी गई और जवाबी कार्रवाई में लड़ाकू विमान तैनात किए गए।
इस संयुक्त मिशन में शामिल विमानों की सूची काफी प्रभावशाली है, जो दोनों देशों की सैन्य ताकत को दर्शाती है:
- चीन के चार H-6 रणनीतिक बमवर्षक और दो J-16 लड़ाकू विमान।
- रूस के दो Tu-95 रणनीतिक बमवर्षक, दो Tu-142 समुद्री गश्ती विमान और एक Su-30 लड़ाकू विमान।
यह पूरी गश्त करीब छह घंटे तक जारी रही। इस दौरान रूस के Su-30SM और Su-35S के साथ-साथ चीन के J-16 लड़ाकू विमानों ने बमवर्षकों को सुरक्षा घेरा (Fighter Cover) प्रदान किया।
भू-राजनीतिक निहितार्थ
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2019 से शुरू हुए चीन और रूस के ये मिशन अब अधिक गहन और संस्थागत होते जा रहे हैं। यह एक साफ संकेत है कि बीजिंग और मॉस्को ने अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया के त्रिपक्षीय रक्षा गठबंधन को घेरने के लिए प्रशांत क्षेत्र में एक नया और अभेद्य सैन्य मोर्चा खोल दिया है। विश्लेषकों के अनुसार, इस तरह की संयुक्त गश्त केवल एक सामान्य सैन्य अभ्यास नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदलने का एक राजनीतिक संदेश भी है।
ऐसे समय में जब वॉशिंगटन का प्रशासनिक ध्यान पश्चिम एशिया की उथल-पुथल पर टिका हुआ है, चीन और रूस का यह संयुक्त प्रदर्शन इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी सामरिक मौजूदगी को रेखांकित करने का एक जरिया है। भले ही दोनों देशों ने अपने आधिकारिक बयानों में इस मिशन को किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं बताया है, लेकिन इंडो-पैसिफिक में जिस तरह से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं, उसके जवाब में यह शक्ति प्रदर्शन काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भविष्य के संकेत
इस पूरी घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रशांत महासागर की लहरों और वहां के आसमान में आने वाले दिनों में भू-राजनीतिक तापमान और अधिक बढ़ने वाला है। जापान सागर (Sea of Japan), पूर्वी चीन सागर (East China Sea) और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में इस तरह की हलचल यह बताती है कि वैश्विक महाशक्तियों के बीच रस्साकशी अब एक नए और अधिक जटिल चरण में प्रवेश कर चुकी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिकी नेतृत्व वाला गठबंधन इस उभरती हुई चीन-रूस साझेदारी का किस प्रकार जवाब देता है।
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