सुल्तानपुर में साल 1921 में हुई थी जिला कांग्रेस कमेटी की स्थापना, बाबू गणपत सहाय बने थे पहले अध्यक्ष उत्तर प्रदेश 2 महीने पहले 75
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जगाने में साल 1921 में गठित जिला कांग्रेस कमेटी की भूमिका ऐतिहासिक रही है। इस कमेटी के पहले अध्यक्ष के रूप में बाबू गणपत सहाय ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली थी।

सुल्तानपुर में कांग्रेस की संगठनात्मक शुरुआत

भारत की आजादी की लड़ाई में कांग्रेस पार्टी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। पार्टी ने न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि देश के सुदूर इलाकों में भी आंदोलनकारियों को एक मंच पर लाने का कार्य किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन साल 1885 में होने के बाद समय के साथ इसके ढांचे को मजबूत करने के लिए विभिन्न जिलों में समितियां बनाई गई। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में भी क्रांतिकारी गतिविधियों को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से साल 1921 में पहली बार जिला कांग्रेस कमेटी का विधिवत गठन किया गया। इस ऐतिहासिक गठन के बाद सुल्तानपुर में स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों ने एक नई गति पकड़ ली थी।

बाबू गणपत सहाय का नेतृत्व और असहयोग आंदोलन

साल 1920 में महात्मा गांधी ने पूरे देश में असहयोग आंदोलन का आह्वान किया था। इस आंदोलन का प्रभाव सुल्तानपुर में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिला। असहयोग आंदोलन की शुरुआत से ठीक पहले बाबू गणपत सहाय ने सुल्तानपुर के निवासियों और कार्यकर्ताओं का एक बड़ा जत्था तैयार किया और वे लखनऊ अधिवेशन में शामिल हुए। उस दौरान खिलाफत कमेटी का गठन भी एक महत्वपूर्ण घटना थी। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के शंखनाद के बाद सुल्तानपुर में वर्ष 1921 में जिला कांग्रेस कमेटी की स्थापना हुई, जिसमें बाबू गणपत सहाय को सर्वसम्मति से पहला अध्यक्ष चुना गया। वहीं, संगठन की जिम्मेदारी महामंत्री के रूप में रमाकांत सिंह को सौंपी गई।

स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख सहयोगियों का योगदान

जिला कांग्रेस कमेटी के गठन के बाद आंदोलन को स्थानीय स्तर पर काफी मजबूती मिली। बाबू गणपत सहाय और रमाकांत सिंह के साथ मिलकर कई अन्य देशभक्तों ने सक्रिय भूमिका निभाई। इन सहयोगियों में बाबा रामलाल, मोहम्मद नाजिम, रामजस यादव और अनंत बहादुर सिंह जैसे प्रमुख नाम शामिल थे। इन नेताओं के प्रयासों से सुल्तानपुर के विभिन्न क्षेत्रों में असहयोग आंदोलन का प्रसार हुआ। जिले के तियरी, हसनपुर, बैकुंठी, कादीपुर का बरवारीपुर, बहरौली, बाजार शुक्ल और बल्दीराय जैसी जगहों पर स्थानीय लोगों ने बड़ी संख्या में जुड़कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की और आंदोलन में अपना सक्रिय योगदान दिया।

बाबू गणपत सहाय के जीवन का सफर

वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह के अनुसार, सुल्तानपुर को राष्ट्रीय मानचित्र पर पहचान दिलाने में बाबू गणपत सहाय का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। वे बंग-भंग की घटना के बाद विपिन चंद्र पाल के संपर्क में आए, जिससे उनके राजनीतिक विचारों में बड़ा बदलाव आया। उन्होंने राष्ट्र सेवा के लिए अपनी कॉलेज की नौकरी छोड़ दी और एक अधिवक्ता के तौर पर अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। वे लाल-बाल-पाल की तिकड़ी की राजनीति से बेहद प्रेरित थे।

संगठन के गठन से आंदोलन को मिली दिशा

वर्ष 1921 में जब तक सुल्तानपुर में जिला कांग्रेस कमेटी का गठन नहीं हुआ था, तब तक आजादी से संबंधित गतिविधियां अलग-अलग स्तरों पर बिखरी हुई थीं। कमेटी के गठन के बाद इन सभी गतिविधियों को एक सूत्र में पिरोया गया। इससे न केवल कार्यकर्ताओं के बीच एकता का संचार हुआ, बल्कि आंदोलन को लेकर ठोस योजनाएं भी बनाई जाने लगीं। कांग्रेस की उच्च नीतियों का जिले में प्रभावी ढंग से पालन किया गया, जिसका असर यह हुआ कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ जिले में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में तेजी आ गई और स्वतंत्रता सेनानियों का हौसला कई गुना बढ़ गया।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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