सिर्फ 6 महीने की उम्र में गंवा दिए दोनों पैर, फिर भी बहराइच के नसीम ने नहीं मानी हार व्यापार 2 महीने पहले 82
उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के रहने वाले नसीम ने शारीरिक विकलांगता को मात देते हुए संघर्ष भरी जिंदगी को एक नई दिशा दी है। आज वे जोमैटो में डिलीवरी एजेंट के रूप में काम कर अपना पेट पाल रहे हैं और शिक्षक बनने का सपना देख रहे हैं।

बहराइच के नसीम की संघर्षपूर्ण यात्रा

बहराइच जिले का एक छोटा सा गांव है जिसका नाम बनिया भदिम कोलवा है। इसी गांव में मोहम्मद नसीम हाशमी का जन्म हुआ था। जीवन की शुरुआत तो सामान्य थी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। महज 6 महीने की छोटी सी उम्र में नसीम एक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए, जिसके कारण उनके दोनों पैर हमेशा के लिए लाचार हो गए। शारीरिक रूप से अक्षम होने के बाद नसीम के लिए बचपन का दौर बहुत चुनौतीपूर्ण रहा। जब उनके हमउम्र बच्चे खेलकूद रहे थे और दौड़ना सीख रहे थे, तब नसीम रेंगने को मजबूर थे। दूसरों पर अपनी निर्भरता देख उनका मन अक्सर उदास हो जाता था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और संकल्प लिया कि वे कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे।

शिक्षा बनी नसीम का सबसे बड़ा हथियार

नसीम ने यह समझ लिया था कि अगर उन्हें समाज में अपनी पहचान बनानी है और सम्मान से जीना है, तो शिक्षा ही एकमात्र जरिया है। उन्होंने पूरे मन से पढ़ाई की और दिव्यांगता को अपनी सफलता के मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया। नसीम का सपना एक शिक्षक बनने का था ताकि वे बच्चों को पढ़ा सकें और खुद भी आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकें। उन्होंने डीएलएड की पढ़ाई पूरी की और कड़ी मेहनत के बल पर सुपरटेट की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। हालांकि, वैकेंसी न निकलने के कारण उन्हें सरकारी नौकरी के लिए और अधिक इंतजार करना पड़ रहा है। बेरोजगारी के इस दौर में उन्होंने हार मानने के बजाय खुद को संभालने की कोशिश की।

व्यवसाय में असफलता के बाद मिला नया रास्ता

शिक्षक बनने की राह में आई अड़चनों को दूर करने के लिए नसीम ने खुद का काम शुरू करने का फैसला लिया। उन्होंने 200000 रुपए का कर्ज लिया और एक परचून की दुकान शुरू की। दुर्भाग्यवश, दुकान में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली और वे आर्थिक तंगी से घिर गए। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में जब उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था, तब उन्हें गिफ्टएबल्ड फाउंडेशन नामक एक गैर-सरकारी संगठन के बारे में पता चला। यह संस्था दिव्यांगजनों को सशक्त बनाने और उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा करने का काम करती है।

अब ट्राई साइकिल पर शहर में कर रहे डिलीवरी

नसीम ने जब इस संस्था से संपर्क किया, तो उन्होंने न केवल नसीम का दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाने में मदद की, बल्कि उन्हें जोमैटो जैसी कंपनी में रोजगार भी दिलाया। अब नसीम अपनी ट्राई साइकिल के जरिए शहर की तंग गलियों में लोगों तक उनके ऑर्डर पहुंचाते हैं। नसीम बताते हैं कि काम के दौरान कभी-कभी मुश्किल आती है, जब किसी ऐसी जगह पहुंचना होता है जहां उनकी ट्राई साइकिल नहीं जा पाती, तब लोग स्वयं घर से बाहर आकर उनका सहयोग करते हैं और अपना सामान लेते हैं।

शिक्षक बनने का सपना अभी भी जिंदा है

अपनी शारीरिक सीमाओं के बावजूद नसीम का हौसला बुलंद है। वे कहते हैं कि उनका संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। जिस दिन शिक्षा विभाग में नई वैकेंसी आएगी, वे निश्चित रूप से एक अध्यापक बनेंगे और तब वे खुद को एक सफल इंसान के रूप में देखेंगे। नसीम की कहानी उन हजारों लोगों के लिए प्रेरणा है जो छोटी-छोटी समस्याओं के सामने घुटने टेक देते हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि शरीर का साथ न होने पर भी संकल्प और कड़ी मेहनत के दम पर जीवन की दिशा बदली जा सकती है।

श्वेता भाटिया पाबना की बिजनेस फीचर लेखिका हैं, जो सक्सेस स्टोरी और कारोबारी फीचर लिखती हैं। उद्यमियों के संघर्ष, नए कारोबारी मॉडल और प्रेरक कहानियों को वे रोचक अंदाज में पेश करती हैं। उनका लेखन पाठकों को प्रेरणा और जानकारी दोनों देता है।

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