नासा का सैटेलाइट देगा पानी की हर बूंद का हिसाब, अंतरिक्ष से होगी नदियों की लाइव निगरानी अमेरिका 2 घंटे पहले 2
वैज्ञानिकों ने नदियों की निगरानी के लिए एक नई तकनीक विकसित की है, जिससे अंतरिक्ष से पानी की गुणवत्ता और स्वास्थ्य का पता लगाया जा सकेगा। यह तकनीक प्रदूषण और जहरीले शैवाल के फैलाव को समय रहते पहचानने में मदद करेगी।

नदियों की निगरानी का महाप्लान

वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष से दुनिया की सभी नदियों की निगरानी के लिए एक बड़ा योजना बनाया है। हालिया रिसर्च के अनुसार, सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग तकनीक अब इतनी विकसित हो चुकी है कि इसके माध्यम से नदियों के पानी की गुणवत्ता और स्वास्थ्य को वैश्विक स्तर पर ट्रैक किया जा सकता है। यह तकनीक नदियों में प्रदूषण और जहरीले शैवाल के फैलाव का समय पर पता लगाने में सहायक होगी। यह अध्ययन नेचर वॉटर जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

नदियों की स्थिति पर नजर

नई दिल्ली: वैज्ञानिक अब अंतरिक्ष से पृथ्वी की हर नदी पर ध्यान देने की योजना बना रहे हैं। आमतौर पर लोग नदियों के बारे में तब सोचते हैं जब बाढ़ या सूखा पड़ता है। लेकिन नदियाँ हमारे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को जोड़ती हैं। बड़ी संख्या में लोग पीने के पानी के लिए नदियों पर निर्भर हैं। समस्या यह है कि कई नदियाँ दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां जाकर पानी की गुणवत्ता की जांच करना मुश्किल है। इसी चुनौती का सामना करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई विधि खोजी है।

रिमोट सेंसिंग तकनीक की आवश्यकता

रिमोट सेंसिंग तकनीक की आवश्यकता क्यों पड़ी? नदियों को ट्रैक करना पहली नजर में सरल लग सकता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी की प्रोफेसर डोंगमी फेंग ने कहा, 'नदियों और विशेषकर छोटे झरनों को परिभाषित करना बहुत कठिन है। नदियाँ लगातार बदलती रहती हैं और कई बार गायब भी हो जाती हैं।'

नदियों की निगरानी की नई तकनीक

वैज्ञानिक अब जिस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, वह अद्भुत है। यह नई तकनीक पानी से परावर्तित होने वाली रोशनी के स्पेक्ट्रम में बदलाव को पकड़ती है। पानी में मौजूद विभिन्न पोषक तत्व और प्रदूषक तत्व रोशनी को अलग तरीके से अवशोषित करते हैं। सैटेलाइट अंतरिक्ष की कक्षा में घूमते हुए इस बदलाव को आसानी से पहचान लेते हैं। जब इस सैटेलाइट डेटा को कंप्यूटर मॉडलिंग के साथ मिलाया जाता है, तो पानी की गुणवत्ता का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है।

एल्गल ब्लूम के खतरनाक प्रभाव

इस सैटेलाइट मॉनिटरिंग तकनीक का सबसे बड़ा लाभ पानी में फैलने वाले एल्गल ब्लूम को रोकने में होगा। यह एक ऐसी समस्या है जिससे कई देश परेशान हैं। खेतों में उपयोग होने वाले उर्वरक और सीवेज का गंदा पानी जब नदियों में मिलता है, तो पानी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे एल्गी तेजी से फैलने लगती है। यह एल्गी पानी की सतह पर एक मोटी परत बना लेती है, जिससे सूरज की रोशनी पानी के नीचे मौजूद पौधों तक नहीं पहुँच पाती।

नदियों के संकट से जुड़े तथ्य

दुनिया की 90% आबादी नदियों के 6 मील (लगभग 10 किलोमीटर) के दायरे में रहती है। अकेले अमेरिका की 40% से अधिक नदियाँ इस समय न्यूट्रिएंट पॉल्यूशन का सामना कर रही हैं। नदियों का दूषित पानी समुद्र में जाकर वहां 'डेड जोन' यानी ऑक्सीजन विहीन इलाके बना देता है।

पानी के संकट से निपटने की योजना

प्रोफेसर डोंगमी फेंग का बैकग्राउंड हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग और रिमोट सेंसिंग से जुड़ा हुआ है। वह अपने नए प्रोजेक्ट को लेकर उत्साहित हैं, जिसमें दुनिया की नदियों के पचास साल के पुराने डेटा का विश्लेषण किया जाएगा। इस विश्लेषण से एक ऐसा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम विकसित किया जाएगा जो पानी के प्रबंधन को बेहतर बनाएगा।

नदियों की सेहत पर नजर रखना आवश्यक

नदियों ने ही मानव सभ्यता को आकार दिया है। इसलिए नदियों में क्या चल रहा है, यह जानना हमारे भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अंतरिक्ष से मिलने वाला डेटा इस कार्य को आसान बना देगा। यह रिसर्च नेचर वॉटर जर्नल में प्रकाशित हुई है।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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