बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
बिहार के सीवान जिले में NEET पेपर लीक मामले के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कथित रूप से AK-47 राइफल से फायरिंग करने का मामला गरमाता जा रहा है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक पुलिस अधिकारी प्रदर्शनकारी छात्रों के सामने घातक हथियार से हवाई फायरिंग करता नजर आ रहा है। इस वीडियो के सामने आने के बाद पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारे में हड़कंप मच गया है। सरकार और पुलिस प्रशासन पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या निहत्थे छात्रों के खिलाफ इस तरह के सैन्य स्तर के घातक हथियारों का इस्तेमाल किया जा सकता है? मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी पुलिस अधिकारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है और उसके खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं।
सीवान का वह वीडियो जिसने मचाया बवाल
यह पूरा मामला पिछले हफ्ते का बताया जा रहा है, जब सीवान में बड़ी संख्या में छात्र इकट्ठा होकर NEET पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान स्थिति तब नियंत्रण से बाहर हो गई जब पुलिस और छात्रों के बीच झड़प की स्थिति बनी। इसी बीच पुलिस बल की तरफ से कथित तौर पर AK-47 जैसे अत्यंत घातक हथियार से फायरिंग की गई, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर सार्वजनिक हो गया।
इस वीडियो के वायरल होते ही बिहार की राजनीति में उबाल आ गया। विपक्षी दलों ने सरकार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने 25 जुलाई 2026 को अपने सोशल मीडिया हैंडल से इस वीडियो को साझा किया। उन्होंने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि प्रदर्शन कर रहे निर्दोष और निहत्थे छात्रों पर पुलिस ने सीधे गोलियां चलाईं और इस दौरान AK-47 का भी इस्तेमाल किया गया। तेजस्वी यादव ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग की है।
भीड़ नियंत्रण पर क्या कहता है भारतीय कानून?
इस पूरे विवाद के बाद सबसे बड़ा और कानूनी सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस को किसी भी स्थिति में प्रदर्शनकारी भीड़ या छात्रों पर AK-47 जैसे खतरनाक असॉल्ट राइफल का इस्तेमाल करने का अधिकार है? कानून विशेषज्ञों और भारतीय न्याय संहिता के नियमों के अनुसार, इसका सीधा और स्पष्ट जवाब नहीं है। सामान्य परिस्थितियों में भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस द्वारा इस तरह के घातक हथियारों का उपयोग करना पूरी तरह से गैर-कानूनी है।
भारतीय संविधान देश के सभी नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना किसी हथियार के इकट्ठा होने तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है। यदि कोई प्रदर्शन उग्र या हिंसक भी हो जाता है, तब भी पुलिस प्रशासन को अत्यधिक बल प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पुलिस की कार्रवाई हमेशा न्यूनतम बल प्रयोग के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए। हाल ही में लागू की गई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और पुलिस नियमावली में इस संबंध में बेहद कड़े और स्पष्ट नियम निर्धारित किए गए हैं। इनके अनुसार, भीड़ को हटाने के लिए पुलिस को चरणबद्ध तरीके से कार्रवाई करनी होती है, न कि सीधे गोलियां बरसानी होती हैं।
भीड़ को नियंत्रित करने की तय प्रक्रिया क्या है?
कानून के मुताबिक, किसी भी उग्र प्रदर्शन या गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा हुई भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को निम्नलिखित चरणों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:
- पहला कदम - आधिकारिक चेतावनी देना: पुलिस अधिकारियों को सबसे पहले प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्वक हटने की अपील करनी चाहिए। लाउडस्पीकर के जरिए उन्हें समझाने और वहां से हट जाने की चेतावनी दी जानी चाहिए।
- दूसरा कदम - गैर-घातक उपायों का प्रयोग: यदि चेतावनी के बावजूद भीड़ पीछे हटने को तैयार नहीं होती है, तो पुलिस बल को गैर-घातक तरीकों का सहारा लेना चाहिए। इसके तहत पानी की बौछारें (वाटर कैनन) छोड़ना, आंसू गैस के गोले दागना या स्मोक शेल का इस्तेमाल करना शामिल है ताकि प्रदर्शनकारियों को बिना चोट पहुंचाए तितर-बितर किया जा सके।
- तीसरा कदम - सीमित और कम घातक बल का प्रयोग: यदि स्थिति अभी भी नियंत्रण में नहीं आती है, तो पुलिस लाठीचार्ज कर सकती है। इसके अलावा रबर की गोलियां या प्लास्टिक की गोलियां चलाई जा सकती हैं, जो शरीर पर गहरा प्रभाव तो डालती हैं लेकिन इनसे अमूमन जान जाने का खतरा नहीं होता।
- चौथा कदम - अंतिम विकल्प के रूप में फायरिंग: जीवित कारतूसों (असली गोलियों) से फायरिंग का निर्णय केवल और केवल तब लिया जा सकता है जब भीड़ बेहद हिंसक हो चुकी हो, लोगों की जान को तत्काल खतरा पैदा हो गया हो और अन्य सभी उपाय पूरी तरह विफल साबित हो गए हों। यह कार्रवाई भी केवल मजिस्ट्रेट की अनुमति या बेहद गंभीर स्थिति में ही की जा सकती है, और इसमें भी पहली कोशिश पैर के निचले हिस्से पर गोली मारने की होती है ताकि जान न जाए।
आखिर भीड़ पर AK-47 चलाना क्यों है पूरी तरह गलत?
AK-47 एक उच्च क्षमता वाली असॉल्ट राइफल है, जिसे विशेष रूप से युद्ध के मैदान में दुश्मन सैनिकों का मुकाबला करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी गोलियां बेहद तेज रफ्तार से चलती हैं और इसमें अत्यधिक मारक क्षमता होती है। यही वजह है कि इसे नागरिक सुरक्षा या भीड़ नियंत्रण की किसी भी नियमावली में स्थान नहीं दिया गया है। भीड़ पर इसके इस्तेमाल न किए जाने के पीछे कई प्रमुख तकनीकी और मानवीय कारण हैं।
AK-47 से चलाई गई गोली में इतनी ताकत होती है कि वह एक शरीर को भेदकर उसके पीछे खड़े अन्य लोगों को भी अपनी चपेट में ले सकती है। चूंकि प्रदर्शनों में लोग बहुत पास-पास खड़े होते हैं, इसलिए ऐसी राइफल से की गई फायरिंग से उन लोगों की भी जान जा सकती है जो हिंसा में शामिल नहीं हैं और केवल तमाशबीन बनकर खड़े हैं। इसके अलावा, उग्र परिस्थितियों में इस हथियार से सटीक निशाना लगाना मुश्किल होता है।
कानूनी रूप से, निहत्थे नागरिकों या छात्रों के खिलाफ इतने घातक बल का उपयोग करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन माना जाता है, जो हर नागरिक को सम्मान के साथ जीवन जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। कानून के अनुसार, पुलिस का काम सुरक्षा प्रदान करना है, न कि युद्ध जैसी स्थिति पैदा करना।
क्या किसी भी परिस्थिति में इसका इस्तेमाल हो सकता है?
कानून में कुछ बेहद असाधारण परिस्थितियों का उल्लेख जरूर है जहां पुलिस आत्मरक्षा में किसी भी उपलब्ध हथियार का उपयोग कर सकती है। यदि कोई उग्र प्रदर्शन किसी बड़े हथियारबंद दंगे या हमले में तब्दील हो जाता है, जहां उपद्रवी तत्वों के पास भी अत्याधुनिक हथियार हों और वे पुलिस या आम नागरिकों पर लगातार गोलियां बरसा रहे हों, या फिर कोई आतंकवादी हमला जैसी स्थिति हो, तो ऐसी विकट परिस्थितियों में पुलिस अपनी और जनता की सुरक्षा के लिए AK-47 जैसे हथियारों का इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि, ऐसी स्थिति में की गई कार्रवाई को भीड़ नियंत्रण की श्रेणी में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आत्मरक्षा के अधिकार के तहत देखा जाता है, जिसका साबित होना भी कोर्ट में आवश्यक होता है।
किसके पास होता है AK-47 रखने का अधिकार?
भारत के हथियार कानूनों के तहत AK-47 को प्रतिबंधित श्रेणी (Prohibited Bore) के हथियारों में रखा गया है। इसका मतलब यह है कि देश का कोई भी आम नागरिक इसे कानूनी तौर पर न तो खरीद सकता है और न ही अपने पास रख सकता है।
इस हथियार का इस्तेमाल केवल भारत की अधिकृत सैन्य ताकतों, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF), राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG), विशेष कमांडो इकाइयों और राज्य पुलिस की विशेष आतंकवाद विरोधी शाखाओं तक ही सीमित है। सामान्य कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस या ट्रैफिक पुलिस को सामान्य ड्यूटी के दौरान AK-47 ले जाने की अनुमति नहीं होती है। ये हथियार पुलिस के केंद्रीय शस्त्रागार में सुरक्षित रखे जाते हैं और इन्हें केवल विशेष ऑपरेशन, दंगों जैसी अत्यंत गंभीर स्थितियों या उच्च अधिकारियों के विशिष्ट आदेश के बाद ही जारी किया जा सकता है। सीवान मामले में इस नियम की अनदेखी की भी जांच की जा रही है कि आखिर एक सामान्य ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के पास यह हथियार कैसे पहुंचा और उसने इसे किस आदेश के तहत चलाया।
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