तेलंगाना के किसानों के लिए वरदान बनी सीताफल की खेती, कम लागत में कमा रहे लाखों का मुनाफा भारत 3 घंटे पहले 2
तेलंगाना की सूखी और पथरीली जमीन पर सीताफल की खेती किसानों के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन गई है। कम पानी और मेहनत में किसान अब हर एकड़ से 3 लाख रुपये तक का मुनाफा आसानी से कमा रहे हैं।

बंजर जमीन पर मीठी फसल का जादू

तेलंगाना की शुष्क जलवायु और पथरीली मिट्टी में एक ऐसा बदलाव आया है जिसने किसानों के जीवन स्तर को पूरी तरह बदल दिया है। कभी इसे केवल जंगली या बाड़ के आसपास उगने वाला सामान्य फल माना जाता था, लेकिन अब सीताफल यानी कस्टर्ड एप्पल बड़े पैमाने पर किसानों की आय बढ़ाने वाला प्रमुख फल बन चुका है। महाराष्ट्र की तर्ज पर अब तेलंगाना के किसान भी इसकी व्यावसायिक बागवानी की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। इस फसल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें लागत बेहद कम आती है और इसे बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, जंगली जानवरों या बंदरों से फसल को नुकसान का डर भी अन्य फसलों की तुलना में काफी कम रहता है, जो इसे सूखे क्षेत्रों के लिए एक आदर्श विकल्प बनाता है।

प्रमुख उत्पादन क्षेत्र और उन्नत किस्में

राज्य के कई जिलों में सीताफल की खेती का विस्तार हो रहा है। विशेष रूप से महबूबनगर, रंगारेड्डी, विकराबाद, नलगोंडा, मेंडक और नागरकुरनूल जिलों में इसकी बंपर पैदावार देखी जा रही है। महबूबनगर और विकराबाद के पहाड़ी क्षेत्रों में तो यह प्राकृतिक रूप से भी बहुतायत में पाया जाता है। अब किसान पुरानी देसी किस्मों की जगह आधुनिक और उन्नत किस्मों को तरजीह दे रहे हैं, जिनमें बालानगर, एनएमके-1 (गोल्डन) और आर्का सहन प्रमुख हैं। ये किस्में न केवल अधिक फल देती हैं बल्कि बाजार में भी इनकी मांग बहुत अधिक रहती है।

खेती की प्रक्रिया और सही समय

तेलंगाना में सीताफल की बागवानी के लिए जून से सितंबर तक का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। यह फसल लाल बलुई, पथरीली या हल्की दोमट मिट्टी में बहुत अच्छी तरह विकसित होती है, बशर्ते खेत में पानी रुकने की समस्या न हो। विशेषज्ञों की सलाह है कि सितंबर के महीने में हमेशा नर्सरी से तैयार किए गए ग्राफ्टेड पौधे या पॉलीबैग वाले पौधे ही लगाने चाहिए, क्योंकि सीधे बीज बोने की प्रक्रिया में समय अधिक लगता है और परिणाम अनिश्चित हो सकते हैं। सघन बागवानी के लिए किसान आमतौर पर 4×4 मीटर की दूरी पर 2×2 फीट के गड्ढे खोदते हैं और उनमें गोबर की खाद डालते हैं। अगस्त की शुरुआती बारिश के बाद कलमी पौधे लगाना सबसे अच्छा रहता है। चूँकि यह पौधा सूखा सहने की क्षमता रखता है, इसलिए ड्रिप इरिगेशन यानी बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली का उपयोग करके बेहद कम पानी में भी बेहतरीन उपज प्राप्त की जा सकती है।

मुनाफा और बाजार मांग

पौधे लगाने के करीब 2 से 3 साल बाद ही इनसे फल मिलना शुरू हो जाता है। मानसून के दौरान फूल आने की प्रक्रिया होती है और नवंबर से दिसंबर के बीच फल पूरी तरह पककर बिक्री के लिए तैयार हो जाते हैं। इस दौरान हैदराबाद की फल मंडियों और विशेष रूप से मोअज्जम जाही मार्केट में विकराबाद और महबूबनगर के मीठे सीताफल की भारी मांग रहती है। वर्तमान समय में आइसक्रीम निर्माण और पल्प इंडस्ट्री में सीताफल का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इसी बढ़ी हुई मांग के चलते किसान एक एकड़ की खेती से 2 से 3 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं, जो उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम साबित हो रहा है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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