राजस्थान
एक घंटा पहले
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विचारों
राजस्थान के सीकर जिले में इन दिनों फूल कारोबार और इससे जुड़े किसान गहरी आर्थिक मंदी से जूझ रहे हैं। शादियों और मांगलिक आयोजनों का दौर थमते ही बाजार में फूलों की मांग लगभग पूरी तरह ठहर गई है। ऑफ सीजन की मार ऐसी है कि सुबह मंडियों और थोक बाजारों से खरीदा गया बड़ा हिस्सा शाम तक खरीदार के अभाव में बिना बिके पड़ा रह जाता है।
तेज गर्मी और उमस भरे मौसम में फूलों की ताजगी बहुत जल्दी खत्म हो जाती है, जिसके चलते शाम होते-होते स्टॉक खराब हो जाता है और व्यापारियों को मजबूरन इसे फेंकना पड़ता है। हालत यह है कि मुनाफा तो दूर, यह कारोबार अब अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रहा और घाटे का सौदा बनकर रह गया है।
एक महीने में 50 से 60 फीसदी तक गिरी बिक्री
सीकर के प्रमुख फूल विक्रेता जयप्रकाश प्रधान के अनुसार, मांग में लगातार आ रही गिरावट के कारण फुटकर विक्रेताओं ने मंडियों से खरीद बेहद सीमित कर दी है। हालत यह है कि मंडी में रोजाना 20 से 30 प्रतिशत फूल बिना बिके ही रह जाते हैं। बीते महज एक महीने में फूलों की कुल बिक्री में 50 से 60 प्रतिशत तक की भारी कमी दर्ज की गई है।
इस मंदी की सबसे तगड़ी चोट सबसे ज्यादा बिकने वाले गुलाब, गेंदा और मोगरा जैसे फूलों पर पड़ी है। भारी नुकसान से बचने के लिए कई छोटे दुकानदारों ने अपनी रोजमर्रा की इन्वेंट्री घटा दी है, जिससे पूरा फूल बाजार सुस्त पड़ गया है।
शेखावाटी से बीकानेर तक फैली सप्लाई, अब केवल मंदिरों का सहारा
सीकर मंडी में करीब 5 बड़े थोक कारोबारी और एक दर्जन से ज्यादा फुटकर व्यापारी सक्रिय हैं। इस मुख्य मंडी से स्थानीय स्तर के साथ-साथ बीकानेर, झुंझुनूं, चूरू और रतनगढ़ समेत आस-पास के कई जिलों में फूलों की बड़ी सप्लाई भेजी जाती है।
फूल उत्पादक किसान जवान सिंह बताते हैं कि फिलहाल मंदिरों में होने वाली रोजाना की पूजा, जन्मदिन के आयोजनों और छोटे-मोटे पारिवारिक कार्यक्रमों के ऑर्डर ही किसी तरह इस कारोबार को सहारा दे रहे हैं। उनका कहना है कि आगामी बड़े विवाह सीजन और प्रमुख धार्मिक आयोजन शुरू होने से पहले बाजार में किसी खास सुधार की उम्मीद नहीं दिख रही।
50 लाख का टर्नओवर सिमटा 8 लाख पर, किसानों ने उखाड़े पौधे
व्यापारियों के मुताबिक, सीकर के घंटाघर के पास स्थित मुख्य फूल मंडी में सीजन के दौरान रोजाना का कारोबार 50 से 60 लाख रुपए तक पहुंच जाता था, जो इस ऑफ सीजन में घटकर महज 8 से 10 लाख रुपए रोजाना पर आ गया है।
फूल खराब होने के डर से बचा हुआ स्टॉक कारोबारी शाम को सड़कों पर ही छोड़ जाते हैं, ताकि आवारा मवेशी उसे खा सकें। दूसरी ओर, उचित दाम न मिलने के कारण फूल उत्पादक किसान भी अब खेतों से तुड़ाई में देरी कर रहे हैं। लगातार घाटे से परेशान होकर कई किसानों ने तो अपने खेतों से फूलों के पौधे तक उखाड़कर फेंक दिए हैं।
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