हिमाचल प्रदेश
एक घंटा पहले
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प्रदेश भर में बदलेंगे निर्माण के नियम
हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार ने राज्य में प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने और भविष्य में आने वाली आपदाओं के जोखिम को न्यूनतम करने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़ा निर्णय लिया है। सरकार का उद्देश्य राज्य की जैव विविधता, पारिस्थितिकी तंत्र और प्राकृतिक सौंदर्य की रक्षा करना है। इस नीति के तहत, अब न केवल राजधानी शिमला बल्कि पूरे प्रदेश की प्रत्येक पंचायत में संवेदनशील क्षेत्रों को नो-कंस्ट्रक्शन जोन के तौर पर चिन्हित किया जाएगा। नगर एवं ग्राम नियोजन एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि आने वाले समय में टीसीपी विभाग इस विषय पर एक औपचारिक अधिसूचना जारी करेगा, जिसके माध्यम से आम जनता से आपत्तियां और सुझाव मांगे जाएंगे।
शिमला के कोर एरिया में निर्माण पर सख्ती
हाल ही में सुक्खू कैबिनेट ने राजधानी शिमला के भीड़भाड़ वाले कोर एरिया में नए निर्माण कार्यों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि शिमला के प्रमुख स्थानों, जिनमें संजौली, कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, आईजीएमसी, लक्कड़ बाजार, रिज, रानी झांसी पार्क, मॉल रोड, इंदिरा गांधी खेल परिसर, क्लार्क्स होटल, ओकओवर, छोटा शिमला और वापस संजौली तक का सड़क मार्ग शामिल है, वहां अब किसी भी तरह का नया निर्माण कार्य नहीं किया जा सकेगा। हालांकि, जनहित के सरकारी भवनों के निर्माण और पुराने ढांचों के पुनर्निर्माण की छूट बनी रहेगी, लेकिन पुनर्निर्माण का काम केवल पुरानी लाइनों के प्रारूप के अनुरूप ही मान्य होगा।
पंचायतों को सौंपी जाएगी बड़ी जिम्मेदारी
राजेश धर्माणी ने बताया कि सरकार प्रत्येक शहर में अर्बन फॉरेस्ट विकसित करने की योजना पर भी काम कर रही है। इसके लिए संबंधित विभागों को उपयुक्त भूमि की तलाश करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त, सरकार हर पंचायत को एक एजेंडा भेजेगी। इन पंचायतों को यह जिम्मेदारी दी जाएगी कि वे अपने कार्यक्षेत्र के भीतर ऐसे स्थानों की पहचान करें जहां भविष्य में किसी भी प्रकार का निर्माण करना खतरनाक हो सकता है। विशेष रूप से भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों, जल स्रोतों, संवेदनशील ढलानों और पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाकों को प्राथमिकता के आधार पर नो-कंस्ट्रक्शन जोन की सूची में शामिल किया जाएगा।
वर्ष 2023 की आपदा से मिला सबक
मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि साल 2023 में राज्य ने जिस भीषण प्राकृतिक आपदा का सामना किया, उसने सरकार को अपनी नीतियों पर गंभीरता से पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है। पुरानी व्यवस्था के तहत लोग अपनी समझ के आधार पर मकान बना लेते थे, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन के बिना किए जा रहे निर्माण ने स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ऐसे अनियोजित निर्माण कार्य न केवल सड़क, पानी, सीवरेज और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर दबाव डालते हैं, बल्कि आपदा के खतरे को भी कई गुना बढ़ा देते हैं। अब सरकार ऐसी जगहों पर निर्माण को हतोत्साहित करने की नीति अपना रही है, जहां भविष्य में जान-माल का नुकसान होने की संभावना सबसे अधिक है।
सड़कों के किनारे निर्माण के लिए तय होंगे नए मानक
सरकार का ध्यान अब ग्रामीण सड़कों और प्रमुख जिला मार्गों यानी एमडीआर के किनारे होने वाले निर्माण कार्यों पर भी है। इन सड़कों के किनारे निर्माण के लिए न्यूनतम दूरी के नियम निर्धारित किए जा रहे हैं। वर्तमान में जो नियम राष्ट्रीय राजमार्गों पर लागू हैं, उनकी तर्ज पर ही अब अन्य सड़कों के लिए भी मानक तैयार किए जाएंगे ताकि भविष्य के विकास कार्यों, जल निकासी और सड़क सुरक्षा में कोई बाधा उत्पन्न न हो। यदि किसी व्यक्ति की जमीन ऐसे क्षेत्र में आती है जिसे भविष्य में निर्माण के लिए प्रतिबंधित किया जाएगा, तो सरकार उन्हें उचित विकल्प भी प्रदान करेगी। राजेश धर्माणी के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपनी ऐसी भूमि सरकार को बेचना चाहेगा, तो मौजूदा सरकारी प्रावधानों और सर्किल रेट के आधार पर उचित विचार किया जाएगा।
ग्रीन बेल्ट का दायरा और महत्व
सरकार का यह निर्णय उन क्षेत्रों पर और अधिक सख्ती से लागू होगा जो पहले से ही ग्रीन बेल्ट का हिस्सा हैं। आपको याद दिला दें कि वर्ष 2000 में शिमला की 17 ग्रीन बेल्ट को नो-कंस्ट्रक्शन जोन घोषित किया गया था। हालांकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय से शिमला विकास योजना-2041 को मंजूरी मिलने पर कुछ विशेष परिस्थितियों में निर्माण की अनुमति दी गई थी। इसके बाद 17 जनवरी 2024 को 8 नई ग्रीन बेल्ट अधिसूचित की गईं, जिससे यह संख्या 25 हो गई थी। वहीं, 11 जनवरी 2025 को तारा देवी क्षेत्र को 26वीं ग्रीन बेल्ट घोषित किया गया है।
देवदार के जंगल ही शिमला की पहचान
राजेश धर्माणी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शिमला की पहचान कंक्रीट के जंगलों से नहीं, बल्कि यहां के देवदार के घने जंगलों और प्राकृतिक सुंदरता से है। यदि अनियोजित निर्माण की प्रक्रिया जारी रही, तो न केवल पर्यटन पर नकारात्मक असर पड़ेगा, बल्कि पर्यावरण भी पूरी तरह नष्ट हो जाएगा। पर्यावरण विशेषज्ञों का भी मानना है कि ये देवदार के जंगल शिमला के फेफड़ों के समान हैं। नए निर्माण पर रोक लगाने का सरकार का यह साहसिक कदम राज्य की हरित विरासत, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण को लंबे समय के लिए मजबूती प्रदान करेगा।
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