एमपी का गौरव बना सतना! गिद्धों की सबसे बड़ी आबादी दर्ज, आंकड़े चौंकाने वाले मध्य प्रदेश 2 महीने पहले 72
मध्य प्रदेश के सतना जिले में हुई हालिया ग्रीष्मकालीन गणना में गिद्धों की रिकॉर्ड संख्या दर्ज की गई है, जो राज्य और देश में वन्यजीव संरक्षण प्रयासों के लिए एक ऐतिहासिक सफलता है।

मध्य प्रदेश के वन्यजीव इतिहास में एक नया और बेहद सुखद अध्याय जुड़ गया है। कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके प्रकृति के सबसे बड़े सफाईकर्मी यानी गिद्धों ने विंध्य के जंगलों में शानदार वापसी की है। प्रदेश के सतना जिले ने इस दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। हाल ही में हुई वन्यजीवों की गणना के बाद यह साफ हो गया है कि अब सतना जिला पूरे मध्य प्रदेश में गिद्धों का सबसे पसंदीदा और सुरक्षित ठिकाना बन चुका है। वन विभाग द्वारा जारी ताजा ग्रीष्मकालीन गणना के आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाले भी हैं।

गर्मियों की गणना में दर्ज हुआ नया रिकॉर्ड

वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस साल गर्मियों के मौसम में की गई गणना के दौरान सतना जिले में गिद्धों की रिकॉर्ड संख्या दर्ज की गई है। सतना के वनमंडलाधिकारी (DFO) मयंक चांदीवाल ने इस संबंध में बेहद महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं। उन्होंने बताया कि जिले में गिद्धों की सही संख्या और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए साल में दो बार गणना का आयोजन किया जाता है। पहली गणना सर्दियों के मौसम में होती है और दूसरी गर्मियों में। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि गिद्धों की कुछ प्रजातियां प्रवासी होती हैं, जो मौसम बदलने के साथ अपने ठिकाने बदल लेती हैं।

इस वर्ष 22 मई से 24 मई के बीच आयोजित की गई समर काउंटिंग (ग्रीष्मकालीन गणना) के दौरान जो आंकड़े सामने आए, वे बेहद उत्साहजनक हैं। इस तीन दिवसीय गणना के दौरान जिले में प्रतिदिन का औसत 1178 गिद्ध दर्ज किया गया। सबसे रोमांचक नजारा गणना के आखिरी दिन यानी 24 मई को देखने को मिला, जब वन विभाग की टीमों ने अकेले एक ही दिन में रिकॉर्ड 1568 गिद्धों की मौजूदगी दर्ज की। यह संख्या प्रदेश के किसी भी एक जिले के लिए अब तक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक संख्या मानी जा रही है।

अगर इसकी तुलना सर्दियों में की गई गणना से करें, तो गर्मियों के आंकड़े काफी बेहतर नजर आते हैं। इससे पहले 20 फरवरी से 22 फरवरी के बीच हुई विंटर काउंटिंग (शीतकालीन गणना) में तीन दिनों का दैनिक औसत 757 गिद्ध था। वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि गर्मियों के दौरान स्थानीय प्रजातियों की सक्रियता बढ़ने और बेहतर मॉनिटरिंग के कारण इस बार यह भारी उछाल देखने को मिला है।

सतना के आसमान में दिखती हैं गिद्धों की ये प्रजातियां

मध्य प्रदेश की समृद्ध जैव विविधता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां गिद्धों की कुल सात प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से तीन प्रवासी प्रजातियां हैं जो बाहरी देशों या क्षेत्रों से आती हैं, जबकि चार स्थानीय प्रजातियां हैं जो यहीं निवास करती हैं। मौसम के हिसाब से इन प्रजातियों की मौजूदगी में भी बदलाव देखने को मिलता है।

फरवरी महीने में हुई शीतकालीन गणना के दौरान सतना के जंगलों में गिद्धों की कुल पांच प्रजातियां देखी गई थीं। इन प्रजातियों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • सिनेरियस वल्चर (यह एक प्रमुख प्रवासी प्रजाति है)
  • इजिप्शियन वल्चर
  • व्हाइट रम्प्ड वल्चर
  • किंग वल्चर
  • लॉन्ग-बिल्ड वल्चर

वहीं दूसरी ओर, मई के महीने में चिलचिलाती गर्मी के दौरान हुई गणना में प्रवासी प्रजातियों की संख्या तो कम रही, लेकिन भारत की स्थानीय चारों प्रजातियां भारी संख्या में विंध्य की पहाड़ियों और जंगलों में उड़ान भरती दिखाई दीं। इससे यह साबित होता है कि सतना का पर्यावरण इन स्थानीय प्रजातियों के फलने-फूलने के लिए बेहद अनुकूल है।

सटीक आंकड़ों के पीछे है वन कर्मियों का वैज्ञानिक प्रशिक्षण

गिद्धों की इस रिकॉर्ड संख्या के सामने आने के पीछे केवल प्रकृति का योगदान नहीं है, बल्कि वन विभाग की सुनियोजित रणनीति और कर्मचारियों की कड़ी मेहनत भी शामिल है। DFO मयंक चांदीवाल के अनुसार, इस साल गणना शुरू होने से पहले विभाग ने जमीनी स्तर पर काम करने वाले अपने कर्मचारियों के लिए विशेष तकनीकी और वैज्ञानिक प्रशिक्षण का आयोजन किया था।

इस मुहिम में गिद्ध संरक्षण के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय और अनुभवी पर्यावरण कार्यकर्ता दिलशेर खान ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सबसे पहले सीधी जिले में एक विशेष कार्यशाला का संचालन किया था। इसके बाद उनके मार्गदर्शन में सतना जिले में भी वन विभाग के कर्मचारियों के लिए दो दिवसीय व्यापक प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। इस कार्यशाला में वन विभाग के विभिन्न स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों ने हिस्सा लिया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल थे:

  • वन रक्षक और फॉरेस्ट गार्ड
  • डिप्टी रेंजर और रेंज ऑफिसर
  • एसडीओ (SDO) कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी

इस विशेष प्रशिक्षण के दौरान मैदानी कर्मचारियों को गिद्धों की विभिन्न प्रजातियों की सटीक पहचान करना सिखाया गया। इसके अलावा, गणना के दौरान आमतौर पर होने वाली मानवीय त्रुटियों को कैसे कम किया जाए और वैज्ञानिक पद्धतियों का इस्तेमाल करके किस तरह से बिल्कुल सही आंकड़े दर्ज किए जाएं, इसके गुर भी सिखाए गए। वन विभाग का मानना है कि इसी गहन और वैज्ञानिक प्रशिक्षण का परिणाम रहा कि इस बार की गणना पहले के मुकाबले कहीं अधिक सटीक और पारदर्शी ढंग से पूरी हो सकी।

सतना से कजाकिस्तान तक: यूरेशियन गिद्ध की ऐतिहासिक कहानी

यह पहला मौका नहीं है जब सतना ने गिद्ध संरक्षण की दिशा में देश और दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा हो। इससे पहले भी सतना जिला एक अनोखी अंतरराष्ट्रीय घटना के कारण सुर्खियों में आ चुका है। कुछ समय पहले सतना जिले के एक खेत में अत्यंत दुर्लभ प्रजाति का एक यूरेशियन गिद्ध गंभीर रूप से घायल और असहाय स्थिति में मिला था।

वन विभाग की मुस्तैद टीम ने तुरंत त्वरित कार्रवाई करते हुए उस घायल पक्षी का सुरक्षित रेस्क्यू किया। इसके बाद उसे उचित उपचार और विशेष देखरेख के लिए राजधानी भोपाल भेजा गया। भोपाल में विशेषज्ञों की देखरेख में उसका गहन इलाज किया गया। जब वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया, तो वन्यजीव वैज्ञानिकों ने उसकी गतिविधियों और प्रवास पथ का अध्ययन करने के लिए उसकी पीठ पर एक अत्याधुनिक जीपीएस ट्रैकर (GPS tracker) फिट किया और उसे वापस खुले आसमान में छोड़ दिया।

इसके बाद जो डेटा सामने आया, उसने दुनिया भर के वन्यजीव वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया। इस गिद्ध ने सतना और भोपाल की सरहदों को पार करते हुए आसमान में लगभग 2300 किलोमीटर लंबी और साहसिक उड़ान भरी। जीपीएस ट्रैकर से मिले आंकड़ों के अनुसार, यह पक्षी भारत की सीमा को पार करते हुए सीधे कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान तक जा पहुंचा। इस बेमिसाल घटना ने वैश्विक स्तर पर मध्य प्रदेश और विशेष रूप से सतना जिले के सफल रेस्क्यू और वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की धाक जमा दी थी।

प्रकृति के सबसे बड़े सफाईकर्मी को बचाना क्यों है जरूरी?

मानव सभ्यता और पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने में गिद्धों की भूमिका को कभी कमतर नहीं आंका जा सकता। इन्हें हमारे पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) का प्राकृतिक सफाईकर्मी माना जाता है। गिद्ध जंगलों और ग्रामीण इलाकों में मृत पशुओं के शवों को खाकर वातावरण को पूरी तरह स्वच्छ रखते हैं। यदि गिद्ध न हों, तो सड़ने वाले शवों से हैजा, रेबीज और एंथ्रेक्स जैसी भयानक बीमारियां फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

एक समय ऐसा था जब मवेशियों को दी जाने वाली दर्द निवारक दवाओं के घातक दुष्प्रभावों के कारण देश भर में गिद्धों की आबादी लगभग समाप्त होने की कगार पर पहुंच गई थी। लेकिन अब मध्य प्रदेश वन विभाग की लगातार चौकसी, समय पर रेस्क्यू ऑपरेशन्स, चिकित्सा सुविधाओं, व्यापक जन-जागरूकता अभियानों और आधुनिक वैज्ञानिक मॉनिटरिंग के सकारात्मक परिणाम धरातल पर दिखने लगे हैं। सतना जिले से सामने आए ताजा और रिकॉर्डतोड़ आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि यदि सही दिशा में निरंतर प्रयास किए जाएं, तो विलुप्तप्राय वन्यजीवों को एक बार फिर उनके प्राकृतिक आवास में गरिमापूर्ण ढंग से वापस लाया जा सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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