बिहार
2 महीने पहले
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विचारों
सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल
बिहार के रोहतास जिले के करगहर इलाके में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच एकता और भाईचारे की एक ऐसी मिसाल देखने को मिलती है, जो न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि सदियों पुरानी सामाजिक विरासत का प्रमाण भी है। यहां हर साल मुहर्रम के मौके पर ताजिया का जुलूस तब तक अपने सफर की शुरुआत नहीं करता, जब तक एक हिंदू ब्राह्मण परिवार के वंशज इसकी सलामी न ले लें। यह परंपरा बीते कई दशकों से बदस्तूर जारी है और इसे निभाने के लिए दोनों समुदायों के लोग समान रूप से तत्पर रहते हैं।
जमींदारी काल से जुड़ी है परंपरा
इस अनूठी प्रथा के इतिहास पर नजर डालें तो जानकारी मिलती है कि यह परंपरा राजा-महाराजाओं और जमींदारी प्रथा के दौर से चली आ रही है। उस समय करगहर के जमींदार चेत पांडे हुआ करते थे। कहा जाता है कि उनके संरक्षण और नेतृत्व में इस परंपरा की नींव रखी गई थी। उस दौर में जब जमींदारी व्यवस्था प्रभावी थी, तब चेत पांडे ताजिया के जुलूस की सलामी लिया करते थे। वक्त बदला और जमींदारी प्रथा खत्म हो गई, लेकिन सामाजिक सद्भाव की यह लकीर आज भी धुंधली नहीं हुई है। आज भी चेत पांडे के परिवार के वंशज उसी परंपरा का पालन करते हुए पूरी गरिमा के साथ ताजिया को सलामी देते हैं।
इस बार सोनू पांडे ने संभाली जिम्मेदारी
इस वर्ष की मुहर्रम प्रक्रिया के दौरान भी यह परंपरा पूरे उत्साह के साथ दोहराई गई। करगहर के मुस्लिम समुदाय के खलीफा द्वारा आयोजित इस आयोजन में ब्राह्मण परिवार के प्रतिनिधि के रूप में विवेक कुमार पांडे, जिन्हें लोग सोनू पांडे के नाम से जानते हैं, ने सलामी की रस्म निभाई। इस खास मौके पर उन्हें साफा बांधकर और तलवार भेंट करके सम्मानित किया गया। इसके बाद ही ताजिया का जुलूस नगर भ्रमण के लिए निकला और देर रात तक शहर के विभिन्न हिस्सों से होकर गुजरा।
क्या कहते हैं परंपरा निभाने वाले वंशज
विवेक कुमार पांडे उर्फ सोनू पांडे का कहना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों की देन है, जिसे वे अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी मानकर निभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार का सम्मान उन्हें आज भी स्थानीय मुस्लिम समाज से मिलता है, वह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। उन्होंने कहा कि आज के समय में देश-दुनिया में हिंदू-मुस्लिम संबंधों को लेकर तमाम तरह की बातें होती हैं, लेकिन करगहर की धरती इन सभी नकारात्मक चर्चाओं के विपरीत एकता का संदेश दे रही है। उनका मानना है कि इस परंपरा को आगे आने वाली पीढ़ियां भी इसी तरह जीवित रखें, ताकि आपसी प्रेम और भाईचारा सदैव बना रहे।
मुस्लिम समुदाय का नजरिया
इस परंपरा के महत्व को समझाते हुए स्थानीय खलीफा अनवर राईन ने बताया कि यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों का आपसी सौहार्द है। उन्होंने इस कहानी को साझा करते हुए कहा कि बहुत पहले जब इस इलाके में मुसलमानों की संख्या काफी कम थी, तब ब्राह्मण परिवार के लोगों ने ही आगे आकर मुहर्रम, ईद और बकरीद जैसे त्योहारों को मनाने में मदद की थी। इसी सहयोग और सम्मान के बदले में आज के मुस्लिम समुदाय के लोग चेत पांडे के वंशजों को जुलूस से पहले सलामी का हक देते हैं। यह परंपरा साबित करती है कि संकट और खुशी के समय में एक-दूसरे का साथ देना ही असली सामाजिक धर्म है।
बदलते दौर में उम्मीद की किरण
आज के दौर में जब कई जगहों से सांप्रदायिक तनाव या वैचारिक मतभेदों की खबरें आती हैं, तब रोहतास के करगहर की यह तस्वीर एक सुखद एहसास दिलाती है। यह स्पष्ट करता है कि यदि समाज के लोग चाहें तो आपसी विश्वास और साझा विरासत को पीढ़ियों तक संजोकर रखा जा सकता है। यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि सम्मान और सहयोग का भाव किसी भी मजहबी सीमा से ऊपर है। स्थानीय निवासियों को पूरा विश्वास है कि आने वाले समय में भी करगहर की यह अनूठी पहचान इसी तरह कायम रहेगी और आने वाली नस्लें इसे एक धरोहर की तरह सहेज कर रखेंगी।
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