ऋषिकेश का 'आम बाग': जानिए कैसे पड़ा इस इलाके का यह अनोखा नाम उत्तराखंड एक घंटा पहले 2
ऋषिकेश के 'आम बाग' इलाके का नाम कई दशक पहले यहां फैले आम के घने बागों के कारण पड़ा। आबादी बढ़ने और मकान बनने के बावजूद यह नाम और कई पुराने आम के पेड़ आज भी इसकी पहचान को जीवित रखे हुए हैं।

ऋषिकेश को उसकी आध्यात्मिक पहचान, प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक विरासत के लिए जाना जाता है। लेकिन इस शहर में कुछ इलाके ऐसे भी हैं, जिनके नाम अपने भीतर एक दिलचस्प कहानी छिपाए हुए हैं। ऐसा ही एक क्षेत्र है 'आम बाग'। यहां पहुंचने वाले कई लोगों के मन में अकसर यह जिज्ञासा उठती है कि आखिर इस इलाके का नाम आम बाग कैसे पड़ा। आज भी यहां कई घरों के बाहर खड़े आम के पेड़ इस पहचान को बनाए हुए हैं।

कभी आम के घने बागों से भरा था यह क्षेत्र

स्थानीय निवासी इंद्रबहादुर बताते हैं कि कई दशक पहले यह पूरा क्षेत्र आम के घने बागों से भरा हुआ था। दूर-दूर तक फैले आम के पेड़ों के कारण ही लोग इस जगह को आम बाग के नाम से बुलाने लगे। उस दौर में यहां आबादी बेहद कम थी और अधिकांश जमीन बागवानी के काम में ली जाती थी। गर्मियों के मौसम में पेड़ों पर लदे आम इस इलाके की खास पहचान हुआ करते थे।

समय बीतने के साथ हालात बदलते गए। आबादी बढ़ी और बागों की जगह मकान खड़े होने लगे, मगर इलाके का नाम वैसा ही बना रहा। यहां के लोगों ने इसे अपनी पहचान और इतिहास के रूप में संजोकर रखा।

सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं आम के पेड़

इस इलाके में वर्षों से बागवानी कर रहे माली नरेश का मानना है कि आम के पेड़ केवल फल देने वाले पेड़ नहीं हैं, बल्कि ये इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा हैं। उनके मुताबिक, पहले यहां बड़ी तादाद में आम के पेड़ हुआ करते थे। हालांकि अब उनकी संख्या घट गई है, फिर भी कई परिवार आज भी अपने घर के बाहर या आंगन में आम का पेड़ लगाना पसंद करते हैं। इससे जहां हरियाली बनी रहती है, वहीं पुरानी यादें भी ताजा हो जाती हैं।

इतिहास के गवाह हैं पुराने पेड़

आम बाग की गलियों में टहलते हुए यह आसानी से महसूस किया जा सकता है कि यहां के लोग अपने पेड़ों से गहरा लगाव रखते हैं। कई घरों के बाहर वर्षों पुराने आम के पेड़ आज भी खड़े हैं, जो इस इलाके के इतिहास के गवाह बने हुए हैं। गर्मियों में जब इन पेड़ों पर फल आते हैं, तो पूरे माहौल की रंगत ही बदल जाती है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी इन पेड़ों से जुड़ी यादें साझा करते नजर आते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि आम के पेड़ों ने इस क्षेत्र को सिर्फ एक नाम ही नहीं, बल्कि एक अलग पहचान भी दी है।

विरासत को बचाने की कोशिश

शहरीकरण के इस तेज दौर में, जब कई पुराने पेड़ और बाग धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं, आम बाग के लोगों ने अपनी इस विरासत को संभालने की कोशिश की है। यही वजह है कि यहां आज भी हरियाली का एक अलग ही एहसास मिलता है। कई परिवार नए पौधे रोपकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी यह जान सकें कि आखिर इस इलाके का नाम आम बाग क्यों पड़ा।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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