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7 घंटे पहले
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विचारों
बाढ़ के मलबे में वफादारी का अनूठा उदाहरण
नेपाल के त्रिशूली बाजार में आई विनाशकारी बाढ़ ने कई परिवारों को उजड़ने का गम दिया है। इस भयानक त्रासदी के बीच एक ऐसी घटना सामने आई है जो किसी का भी दिल पसीजने के लिए काफी है। बाढ़ की चपेट में आकर चार घर पूरी तरह से बह गए थे और अब वहां केवल मलबे का ढेर बचा है। लेकिन इन सबके बीच एक वफादार कुत्ता अपने आशियाने की पुरानी चौखट को छोड़ने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है। इस बेजुबान की कहानी सोशल मीडिया और राहत शिविरों में चर्चा का विषय बनी हुई है।
मशीनों के शोर और मलबे के बीच खामोश इंतजार
नुवाकोट जिले के त्रिशूली बाजार में पिछले हफ्ते जब कुदरत का कहर बरपा, तो पूरा मोहल्ला ही काल के गाल में समा गया। अब वहां राहत और बचाव का काम तेजी से चल रहा है। आधे दर्जन से ज्यादा जेसीबी (JCB) और भारी मशीनें दिन-रात मलबे और कीचड़ को हटाने में लगी हुई हैं। इन मशीनों के शोर से पूरा इलाका गूंज रहा है, लेकिन उस कुत्ते पर इसका कोई असर नहीं होता। वह ब्लैक एंड व्हाइट कुत्ता अपने गले में बंधे मालिक के पट्टे के साथ मलबे के बीच एकटक बैठा रहता है। न तो उसकी पूंछ हिलती है और न ही उसकी आंखों में डर दिखाई देता है, बस एक गहरी निराशा और उम्मीद है कि शायद उसके परिजन वापस लौट आएंगे।
कोशिशें नाकाम, बिस्कुट भी नहीं खिला सके
राहत कार्यों में जुटे वॉलंटियर बिक्रम थापा बताते हैं कि इस कुत्ते को वहां से हटाने की काफी कोशिश की गई है। लोगों ने उसे पुचकारा, उसका नाम लेकर पुकारा और खाने के लिए बिस्कुट भी दिए, लेकिन उसने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा। वह मलबे के उस टुकड़े को छोड़कर हिलने को तैयार नहीं है जिसे वह अपना घर मानता है। उसके गले में मौजूद पट्टा इस बात का प्रमाण है कि तबाही से पहले वह किसी परिवार का बेहद लाडला सदस्य रहा होगा। भारी मशीनों के ऑपरेटर सुनील तामांग के अनुसार, खुदाई करने वाली बड़ी मशीनें जब उसके बिल्कुल करीब से गुजरती हैं, तब भी वह अपनी जगह से नहीं हिलता। ऐसा लगता है जैसे उसने अपनी जगह नहीं छोड़ने की कसम खा रखी हो।
मलबे में दबा हुआ एक अनकहा रिश्ता
बाढ़ के बाद उस पूरे मोहल्ले का वजूद ही खत्म हो गया है। वहां अब सिर्फ कीचड़ और मलबे के ढेर हैं। बचाव दल के किसी भी सदस्य को यह जानकारी नहीं है कि यह कुत्ता उन चार बहे हुए घरों में से किस घर का है या इसके असली मालिक कौन थे। बावजूद इसके, उसका उस खास जगह पर जाकर बैठना और आंगन की सीमा को न लांघना यह साबित करता है कि उसे भली-भांति पता है कि उसका घर यहीं था। जहां अन्य जानवर जान बचाने के लिए ऊंची जगहों की ओर भाग गए, यह डॉगी वहीं डटा रहा।
अपनों के लौटने की आस में बिता रही हैं दिन
स्थानीय लोग और कम्युनिटी एनिमल रेस्क्यू वॉलंटियर रीता गुरुंग का कहना है कि अब उन्होंने उसे वहां से जबरदस्ती हटाने की कोशिश करना छोड़ दिया है। अब वे हर कुछ घंटों के अंतराल पर उसके पास सूखा खाना और साफ पानी रख देते हैं, जिसे वह सन्नाटा होने पर चुपचाप खा लेता है। वहीं, बाढ़ के शिकार हुए और बेघर हो चुके दिनेश बस्थाल का दर्द इस बेजुबान के प्रति सहानुभूति के रूप में सामने आता है। वे कहते हैं, हम इंसान तो यह जानते हैं कि त्रासदी में क्या हुआ है, लेकिन इस बेजुबान को यह समझ नहीं आ रहा कि उसकी पूरी दुनिया यानी उसके अपने लोग कहां गायब हो गए। वह बस इतना जानता है कि जब तक उसके परिवार वाले वापस नहीं आते, उसे इस स्थान को छोड़कर कहीं नहीं जाना है। यह वफादारी की वह मिसाल है जो शब्दों के परे है।
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