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4 घंटे पहले
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अमेरिका और दक्षिण कोरिया के रिश्तों में आया नाटकीय मोड़
अमेरिका और दक्षिण कोरिया की दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी में अचानक एक बड़ी दरार देखने को मिल रही है। यह स्थिति तब पैदा हुई है जब उत्तर कोरिया अपनी विस्तारवादी नीतियों और सैन्य आक्रामकता के साथ पड़ोसी देश पर लगातार नजरें गड़ाए बैठा है और उसे रूस व चीन जैसे देशों का मौन समर्थन भी हासिल है। ऐसे नाजुक समय में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दक्षिण कोरिया के प्रति अपनाई गई आक्रामक नीति ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को एक अनिश्चितता के दौर में धकेल दिया है। यह न केवल दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों के लिए एक झटका है, बल्कि वैश्विक राजनीति में अमेरिका की भूमिका को लेकर भी नए सवाल खड़े कर रहा है।
ट्रंप और ली जे म्युंग की वह फोन कॉल
मंगलवार को ओवल ऑफिस से की गई एक फोन कॉल इस पूरे तनाव की जड़ बन गई। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे म्युंग से सीधा सवाल किया कि क्या वे ईरान के खिलाफ चल रहे अमेरिकी सैन्य अभियान में मदद करेंगे। इस पर दक्षिण कोरियाई पक्ष से जो जवाब मिला, वह ‘नो थैंक्स’ था। यह दो शब्द राष्ट्रपति ट्रंप को नागवार गुजरे और उन्होंने इसे अपनी नीति बदलने का आधार बना लिया। ट्रंप ने साफ शब्दों में अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि उनके 39,000 सैनिक दक्षिण कोरिया में किम जोंग उन से उनकी रक्षा कर रहे हैं, लेकिन जब अमेरिका को मदद की जरूरत पड़ी, तो उनका सहयोगी देश पीछे हट गया। ट्रंप ने इस रवैये को न केवल अजीब बताया, बल्कि इसे अपना अपमान भी माना।
सहयोग और सुरक्षा का गणित
ट्रंप का मानना है कि यदि उनके सहयोगी देश अमेरिकी सैन्य अभियानों में हाथ बंटाने के लिए तैयार नहीं हैं, तो अमेरिका उनकी सुरक्षा के लिए अरबों डॉलर खर्च क्यों करे। उन्होंने केवल दक्षिण कोरिया ही नहीं, बल्कि NATO जैसे अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों पर भी इसी तर्ज पर सवाल उठाए हैं। ट्रंप का तर्क सीधा है कि वे किसी और की सुरक्षा का बोझ अनिश्चित काल तक उठाने के लिए बाध्य नहीं हैं। उनका यह रुख अमेरिका की पुरानी विदेश नीति को चुनौती देता है, जहाँ अमेरिका अपने सहयोगियों के लिए ढाल बनकर खड़ा रहता था। अब ट्रंप के अनुसार, सुरक्षा की कीमत सहयोग से चुकानी होगी, न कि केवल उम्मीदों से।
सैन्य अभ्यास में कटौती का बड़ा फैसला
ट्रंप की नाराजगी केवल शब्दों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को आदेश दिया कि दक्षिण कोरिया के साथ किए जाने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों को जितना संभव हो सके, कम किया जाए। ट्रुथ सोशल पर अपने पोस्ट के माध्यम से ट्रंप ने दुनिया को यह स्पष्ट कर दिया कि वे इन अभ्यासों के तरीकों से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने उत्तर कोरिया के प्रति अपने व्यक्तिगत संबंधों का हवाला देते हुए कहा कि किम जोंग उन की सरकार उनके प्रति सम्मान दिखा रही है, ऐसे में महंगे और शत्रुतापूर्ण अभ्यास जारी रखना औचित्यहीन है। यद्यपि इन अभ्यासों को पूरी तरह रद्द करना संभव नहीं था, लेकिन उनमें की गई भारी कटौती दक्षिण कोरियाई रक्षा प्रतिष्ठान के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है।
दक्षिण कोरिया की सफाई और कूटनीतिक मजबूरियां
अपनी सुरक्षा को खतरे में पड़ता देख दक्षिण कोरियाई सरकार ने अब डैमेज कंट्रोल शुरू कर दिया है। सियोल की ओर से बयान दिया गया है कि वे होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही की आजादी बहाल करने और ईरान के संदर्भ में वाशिंगटन के साथ सलाह-मशविरा कर रहे हैं। हालांकि, दक्षिण कोरियाई पक्ष ट्रंप की मांग के अनुरूप पूर्ण सैन्य समर्थन देने में संकोच कर रहा है। उनकी यह कूटनीतिक सफाई यह दर्शाती है कि वे ट्रंप की नाराजगी मोल तो नहीं लेना चाहते, लेकिन वे पूरी तरह से अमेरिकी सैन्य अभियानों का हिस्सा भी नहीं बनना चाहते। यह संतुलन बनाना उनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है।
बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के मायने
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ ईरान या दक्षिण कोरिया तक सीमित नहीं है। यह अमेरिका की उस पुरानी नीति का अंत हो सकता है जिसमें अमेरिका दुनिया भर में सुरक्षा का सारा बोझ खुद उठाता था। दक्षिण कोरिया की ओर से आई ‘ना’ ने ट्रंप के इस संदेह को पुख्ता कर दिया है कि सहयोगी देश केवल सुरक्षा चाहते हैं, बदले में सहयोग नहीं। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दक्षिण कोरिया इस तल्खी को कम कर पाएगा और क्या अमेरिका अपने सुरक्षा वादों को दोबारा परिभाषित करेगा। फिलहाल के लिए, ट्रंप का संदेश स्पष्ट है: यदि सहयोग नहीं मिलेगा, तो सुरक्षा का बोझ भी अकेले नहीं उठाया जाएगा। यह स्थिति आने वाले समय में प्रशांत क्षेत्र के पूरे सुरक्षा ढांचे को बदलने की क्षमता रखती है।
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