देवघर में सावन की धूम: मैदा या उड़द नहीं, आलू से बनी इस खास फलाहारी जलेबी के दीवाने हो रहे शिवभक्त, जानें इसकी अनोखी रेसिपी जीवनशैली 4 घंटे पहले 1
झारखंड के देवघर में सावन के पावन महीने में आलू से तैयार होने वाली फलाहारी जलेबी श्रद्धालुओं और कांवरियों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। शुद्ध घी में तली और चाशनी में डूबी यह कुरकुरी जलेबी व्रत रखने वाले लोगों की पहली पसंद बन गई है।

सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही झारखंड के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल देवघर में चारों तरफ शिव भक्ति का अद्भुत रंग देखने को मिलता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा बैद्यनाथ धाम के दर्शन और जलाभिषेक के लिए देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु और कांवरिया यहां पहुंचते हैं। देवघर की सड़कें और गलियां भगवान शिव के जयकारों और केसरिया रंग से सराबोर हो जाती हैं। इस पावन अवसर पर देवघर का बाजार भी पूरी तरह से सज-धजकर तैयार हो जाता है। विशेष रूप से यहां के स्थानीय व्यंजनों की खुशबू श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। आमतौर पर आपने मैदा या उड़द की दाल से बनी कुरकुरी जलेबियां तो बहुत खाई होंगी, लेकिन देवघर की गलियों में सावन के दौरान बिकने वाली एक अनूठी मिठाई इन दिनों बेहद चर्चा में है। हम बात कर रहे हैं आलू से तैयार होने वाली फलाहारी जलेबी की, जिसका स्वाद चखने के लिए हर कोई बेताब नजर आता है।

सावन के महीने में देवघर का बदला स्वाद

सावन के इस पावन अवसर पर देवघर के स्थानीय हलवाई और दुकानदार तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान तैयार करते हैं। बाबा बैद्यनाथ के दरबार में आने वाले भक्तों के लिए भोजन और मिठाइयों की विशेष व्यवस्था की जाती है। इन पकवानों में आलू की जलेबी सबसे अलग और खास पहचान रखती है। सावन के महीने में, विशेषकर सोमवार के दिन जब बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और श्रद्धालु व्रत रखते हैं, तब फलाहारी व्यंजनों की मांग बहुत अधिक बढ़ जाती है। ऐसे समय में उपवास रखने वाले लोगों के लिए यह आलू की जलेबी एक बेहतरीन और स्वादिष्ट विकल्प बनकर सामने आती है। दुकानदारों की कड़ाही से छनकर निकलती गरमा-गरम, सुनहरी जलेबियां भक्तों को तृप्ति का अहसास कराती हैं। दूर-दराज से आने वाले कांवरिए भी देवघर की इस अनोखी जलेबी का स्वाद लेना कभी नहीं भूलते और इसे बाबा के प्रसाद के रूप में भी बड़े चाव से खाते हैं।

क्यों इतनी खास है आलू की यह जलेबी?

पारंपरिक रूप से जलेबी बनाने के लिए मैदा या खमीर उठी उड़द की दाल का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे अमूमन व्रत में खाना वर्जित माना जाता है। लेकिन देवघर की इस खास जलेबी का मुख्य आधार उबला हुआ आलू होता है। यह पूरी तरह से शुद्ध और फलाहारी होती है, जिसे उपवास के दौरान बिना किसी संकोच के खाया जा सकता है। इसे बनाने में इस्तेमाल होने वाली हर सामग्री शुद्धता के मानकों पर खरी उतरती है। इसे बनाने के लिए उबले हुए आलू, अरारोट और दूध का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद इसे शुद्ध देसी घी में तला जाता है, जिससे इसका स्वाद और सुगंध दोनों ही कई गुना बढ़ जाते हैं। यह बाहर से जितनी कुरकुरी होती है, अंदर से उतनी ही रसीली और मुलायम होती है।

आलू की फलाहारी जलेबी बनाने की पूरी विधि

अगर आप भी बाबा धाम की इस प्रसिद्ध आलू जलेबी के स्वाद का लुत्फ उठाना चाहते हैं, तो इसकी बेहद आसान रेसिपी को समझ सकते हैं। देवघर के हलवाई इसे पारंपरिक तरीके से बनाते हैं, जिसकी प्रक्रिया इस प्रकार है:

  • आलू को अच्छी तरह उबालना: इस जलेबी को बनाने की शुरुआत बेहतरीन गुणवत्ता वाले आलू को उबालने से होती है। आलुओं को करीब एक घंटे तक अच्छी तरह उबाला जाता है ताकि वे पूरी तरह से नरम और मखमली हो जाएं।
  • ठंडा करके मैश करना: उबलने के बाद आलुओं को कड़ाही या कुकर से निकालकर कुछ समय के लिए ठंडा होने के लिए छोड़ दिया जाता है। जब आलू ठंडे हो जाते हैं, तो उन्हें बिना किसी गांठ के बहुत ही अच्छी तरह से मैश या कद्दूकस कर लिया जाता है।
  • अरारोट का मिश्रण: मैश किए हुए आलू में पर्याप्त मात्रा में अरारोट मिलाया जाता है। अरारोट मिलाने से जलेबी को तलते समय एक बेहतरीन कुरकुरापन मिलता है और वह बिखरती नहीं है।
  • दूध से घोल तैयार करना: आलू और अरारोट के इस सूखे मिश्रण में धीरे-धीरे दूध मिलाया जाता है। दूध मिलाकर इसे अच्छी तरह फेंटा जाता है ताकि जलेबी का एक गाढ़ा और चिकना घोल तैयार हो सके।
  • शुद्ध घी में तलना: घोल तैयार होने के बाद इसे जलेबी बनाने वाले विशेष कपड़े या कोन में भरा जाता है। इसके बाद एक चपटी कड़ाही में शुद्ध देसी घी को गर्म किया जाता है। गर्म घी में बेहद सावधानी के साथ जलेबी का गोल आकार देते हुए इसे डाला जाता है।
  • सुनहरा होने तक पकाना: धीमी और मध्यम आंच पर तलते हुए यह जलेबी धीरे-धीरे अपना रंग बदलने लगती है और सुनहरी तथा अत्यंत कुरकुरी हो जाती है।
  • चाशनी में डुबोना: दोनों तरफ से अच्छी तरह सिक जाने के बाद जलेबियों को घी से बाहर निकाला जाता है और तुरंत पहले से तैयार चीनी की गाढ़ी चाशनी में डाल दिया जाता है। कुछ मिनटों तक चाशनी सोखने के बाद, रसीली आलू की जलेबी परोसने के लिए तैयार हो जाती है।

स्थानीय दुकानदारों की बढ़ी कमाई

आलू की इस अनूठी जलेबी का स्वाद साधारण जलेबी से काफी भिन्न होता है। इसका अनूठा स्वाद, बाहर का कड़कपन और भीतर की रसीली मिठास लोगों को बार-बार इसे खाने पर मजबूर करती है। देवघर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बाबा बैद्यनाथ के दर्शन और पूजा-अर्चन के साथ-साथ इस फलाहारी जलेबी का स्वाद लेना उनकी धार्मिक यात्रा का एक अहम हिस्सा बन चुका है। यही वजह है कि सावन के पूरे महीने में इस जलेबी की भारी मांग रहती है, जिससे देवघर के स्थानीय दुकानदारों को भी अच्छी-खासी आमदनी होती है। त्योहार और आस्था के इस संगम में आलू की जलेबी ने देवघर के खान-पान की संस्कृति में अपना एक विशेष और अमिट स्थान बना लिया है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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