सीतामढ़ी की 150 साल पुरानी रसभरी का आज भी बरकरार है जलवा, स्वाद ऐसा कि दीवाने हो जाते हैं लोग जीवनशैली 2 घंटे पहले 6
बिहार के सीतामढ़ी में एक ऐसी मिठाई है जो पिछले डेढ़ सौ वर्षों से लोगों की जुबान पर छाई हुई है। शुद्धता और पारंपरिक विधि से तैयार यह रसभरी मुढ़ी और चूड़ा के साथ खाकर लोग बेहद आनंद लेते हैं।

सीतामढ़ी की गौरवशाली खाद्य विरासत

बिहार का सीतामढ़ी जिला न केवल अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए दुनिया भर में मशहूर है, बल्कि यहाँ का अनूठा खानपान भी सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। सीतामढ़ी के भूतही क्षेत्र में मिलने वाली मशहूर रसभरी कोई आम पकवान नहीं है, बल्कि यह करीब 150 वर्षों से चली आ रही एक समृद्ध स्वाद परंपरा का जीवंत उदाहरण है। पीढ़ियों से चली आ रही इस दुकान की विरासत आज भी अपनी पुरानी चमक और स्वाद के साथ कायम है।

पारंपरिक विधि और शुद्धता का संगम

दुकान के संचालक महेश कुमार के अनुसार, इस व्यंजन को बनाने की कला उनके दादाजी के समय से चली आ रही है। बदलते दौर में भी उन्होंने स्वाद और गुणवत्ता के साथ कभी समझौता नहीं किया। रसभरी को बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह से पारंपरिक है, जो इसे बाजार में मिलने वाले अन्य व्यंजनों से अलग बनाती है। इसे तैयार करने के लिए मुख्य रूप से शुद्ध चने के बेसन, बारीक कटे हुए प्याज और खास घरेलू मसालों का इस्तेमाल किया जाता है। इन सामग्रियों को एक सही अनुपात में मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है और फिर उसे शुद्ध सरसों तेल में मध्यम आंच पर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में किसी भी कृत्रिम रंग या हानिकारक केमिकल का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता है, जिसके कारण यह स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की भी पहली पसंद बनी हुई है। बाहर से कुरकुरी और अंदर से मुलायम रसभरी का स्वाद जब कड़वे सरसों तेल के तड़के के साथ मिलता है, तो यह खाने वालों के लिए एक यादगार अनुभव बन जाता है।

चूड़ा और मुढ़ी के साथ अनोखा नाश्ता

सीतामढ़ी में रसभरी खाने का अंदाज भी अपने आप में अनोखा है। स्थानीय निवासी इसे सिर्फ मिठाई के तौर पर नहीं, बल्कि नाश्ते के एक मुख्य हिस्से के रूप में देखते हैं। यहाँ आने वाले ज्यादातर लोग इसे चूड़ा या मुढ़ी के साथ मिलाकर खाना पसंद करते हैं। यह मेल न केवल पेट भरने वाला होता है, बल्कि इसका जायका भी बेमिसाल है। सबसे बड़ी बात यह है कि आज की महंगाई के दौर में भी इस लाजवाब स्वाद को बनाए रखने के लिए इसकी कीमत महज 10 रुपये प्रति पीस तय की गई है। इस किफायती दाम के कारण समाज के हर वर्ग के लोग इसका आनंद ले सकते हैं।

दूर-दूर से आते हैं ग्राहक

इस दुकान की लोकप्रियता केवल भूतही क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी साख आसपास के 20 से अधिक गांवों में फैली हुई है। यहाँ के स्वाद की चर्चा इतनी है कि जिले से बाहर और अन्य राज्यों से सीतामढ़ी आने वाले पर्यटक भी इस ऐतिहासिक रसभरी का चखना नहीं भूलते। संचालक के मुताबिक, यहाँ रोजाना औसतन 400 से अधिक पीस रसभरी बिक जाती है। रसभरी के साथ-साथ यहाँ मिलने वाली कचरी और पकौड़ों की भी काफी भारी मांग रहती है, जो इस दुकान की जबरदस्त लोकप्रियता का प्रमाण है। जब एक दुकान की बिक्री का स्तर इतना अधिक है, तो आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि आसपास मौजूद दर्जन भर अन्य दुकानों पर भी इसकी कितनी धूम रहती होगी।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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