झारखंड राज्यसभा चुनाव: दो सीट और कई दावेदार, विधायकों के गणित में उलझा 'इंडिया' गठबंधन, क्यों दिलचस्प हुआ मुकाबला? झारखंड एक महीने पहले 22
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाला चुनाव निर्णायक दौर में पहुंच गया है। नामांकन की अंतिम तारीख 8 जून और मतदान व मतगणना 18 जून को होगी, जिसमें सत्तारूढ़ 'इंडिया' गठबंधन के भीतर की खींचतान ने मुकाबले को रोचक बना दिया है।

झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर होने वाला चुनाव अब अपने अहम पड़ाव पर आ खड़ा हुआ है। नामांकन भरने की आखिरी तारीख कल यानी 8 जून (सोमवार) है, जबकि आगामी 18 जून को मतदान और मतगणना दोनों ही होंगे। राजनीतिक हलकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मुकाबला केवल इन्हीं दो सीटों तक सीमित रहेगा या फिर कोई अतिरिक्त नाम सामने आकर पूरे समीकरण को रोमांचक बना देगा। झारखंड का इतिहास रहा है कि राज्यसभा चुनावों में अंतिम क्षणों में ऐसे चेहरे उभरते हैं, जो पूरी तस्वीर बदल देते हैं।

नामांकन के नियम और प्रस्तावकों की शर्त

नामांकन भरने वाले हर प्रत्याशी को अपने साथ प्रस्तावकों के हस्ताक्षर लेकर जाने होंगे। नियमों के मुताबिक, राजनीतिक दलों के उम्मीदवार के लिए 10 प्रतिशत विधायकों का हस्ताक्षर प्रस्तावक के रूप में जरूरी होता है। झारखंड विधानसभा की क्षमता को देखते हुए यह संख्या 9 विधायकों के हस्ताक्षर के बराबर बैठती है। वहीं निर्दलीय प्रत्याशी को बतौर प्रस्तावक 10 विधायकों के हस्ताक्षर जुटाने होंगे। उल्लेखनीय है कि नामांकन के समय प्रस्तावक विधायकों को साथ ले जाना अनिवार्य नहीं है, उनके हस्ताक्षर ही पर्याप्त माने जाते हैं।

'इंडिया' गठबंधन के भीतर की रार

इस चुनावी संग्राम का असली रोमांच सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर पनप रही खींचतान से उपजा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने पूर्व मंत्री बैद्यनाथ राम को अपना पहला उम्मीदवार घोषित किया है, जो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की उपस्थिति में अपना नामांकन दाखिल करेंगे। पेच दूसरी सीट पर अटका है। कांग्रेस ने केंद्रीय नेतृत्व के करीबी प्रणव झा को अपना प्रत्याशी बनाया है, जबकि झामुमो के कई विधायक इस बात पर अड़े हैं कि पार्टी को दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने चाहिए।

झामुमो नेताओं का तर्क है कि सदन में उनके पास 34 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास केवल 16 सदस्य हैं। ऐसे में संख्या बल के लिहाज से वे दोनों सीटें जीतने की स्थिति में हैं। इस तनातनी को सुलझाने के लिए कांग्रेस ने आनन-फानन में भूपेश बघेल को पर्यवेक्षक बनाकर रांची भेजा है।

एनडीए का गणित और क्रॉस वोटिंग की आशंका

दूसरी ओर, विपक्षी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में अहम भूमिका निभा रही भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी एक सीट पर दावेदारी कर रही है। यह सीट बीजेपी के दीपक प्रकाश का कार्यकाल समाप्त होने से खाली हो रही है। विधानसभा में एनडीए के पास कुल 24 विधायक हैं, जिनमें बीजेपी के 21 तथा आजसू, लोजपा और जदयू के 1-1 विधायक शामिल हैं। किसी एक उम्मीदवार की सीधी जीत के लिए कम से कम 28 प्रथम वरीयता के वोट जरूरी होते हैं।

'इंडिया' ब्लॉक का समीकरण

'इंडिया' ब्लॉक के पास कुल 56 विधायक हैं, जो दोनों सीटें जीतने के लिहाज से पर्याप्त हैं। मगर अगर झामुमो और कांग्रेस के बीच सहमति नहीं बनी या किसी निर्दलीय उम्मीदवार ने ताल ठोक दी, तो क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ जाएगा। झारखंड का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह है कि राज्यसभा चुनावों में विधायकों की 'अंतरात्मा की आवाज' और क्रॉस वोटिंग कई बार बड़ा उलटफेर कर चुकी है।

चुनावी कार्यक्रम

चुनाव आयोग ने इन दो सीटों के लिए सख्त और स्पष्ट समय-सारिणी तय की है:

  • 8 जून: नामांकन पत्र दाखिल करने की अंतिम तिथि।
  • 9 जून: नामांकन पत्रों की जांच यानी स्क्रूटनी।
  • 11 जून: नाम वापस लेने की अंतिम तिथि।
  • 18 जून: सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान और इसी दिन मतगणना।

क्या तीसरा उम्मीदवार बढ़ाएगा रोमांच?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है। यदि केवल दो सीटों के लिए दो प्रमुख उम्मीदवार ही मैदान में रहे, तो चुनाव लगभग निर्विरोध जैसा हो सकता है। लेकिन यदि कोई निर्दलीय या किसी छोटे दल का प्रत्याशी नामांकन दाखिल करता है, तो राजनीतिक समीकरण पलट सकते हैं। हालांकि इसके लिए कम से कम 10 विधायकों का समर्थन जुटाना अनिवार्य होगा। यही वजह है कि राजनीतिक पर्यवेक्षक नामांकन के अंतिम दिन पर खास नजर बनाए हुए हैं।

सत्ता पक्ष और विपक्ष की रणनीति

जानकारों का मानना है कि सत्तारूढ़ गठबंधन की कोशिश रहेगी कि चुनाव बिना किसी अनावश्यक जोखिम के संपन्न हो जाए। वहीं विपक्ष भी अपने संख्या बल के आधार पर अधिकतम राजनीतिक संदेश देने की रणनीति पर काम कर सकता है। दरअसल, राज्यसभा चुनाव केवल सांसद चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह विधानसभा के भीतर दलों की असली ताकत, गठबंधन की मजबूती और राजनीतिक अनुशासन की भी परीक्षा माना जाता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल अपने विधायकों को एकजुट रखने पर विशेष जोर देते हैं।

नामांकन के बाद साफ होगी तस्वीर

8 जून को नामांकन की समय सीमा खत्म होते ही यह स्पष्ट हो जाएगा कि मुकाबला कितना बड़ा और कितना रोचक होने वाला है। यदि अतिरिक्त उम्मीदवार सामने आते हैं तो विधायकों की भूमिका और भी अहम हो जाएगी, जबकि मुकाबला प्रमुख दलों के उम्मीदवारों तक सीमित रहा तो परिणाम लगभग तय माने जाएंगे। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह चुनाव महज औपचारिकता बनकर रह जाएगा या नामांकन के अंतिम दिन कोई ऐसा राजनीतिक दांव चला जाएगा, जो इसे सुर्खियों में ला दे। देखना दिलचस्प होगा कि आखिरी दिन कितने सूरमा विधानसभा सचिव के समक्ष अपना पर्चा दाखिल करते हैं और प्रस्तावक जुटाने की इस परीक्षा में निर्दलीय या असंतुष्ट गुट कोई नया गुल खिला पाते हैं या नहीं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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