संकट और सदमे के बीच संभाली सत्ता, राजीव गांधी ने कैसे बदली भारत की तस्वीर राष्ट्रीय राजनीति 2 घंटे पहले 4
राजीव गांधी का जीवन एक साधारण पायलट से देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री बनने तक का सफर रहा। उनकी जयंती पर जानते हैं कि कैसे उन्होंने तकनीक और नवाचार के जरिए आधुनिक भारत की नींव रखी।

राजनीति से दूर थे राजीव गांधी

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ था। उनके जीवन का प्रारंभिक दौर सत्ता के केंद्र में बीता, क्योंकि उनके नाना जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री थे और उनकी मां इंदिरा गांधी ने भी आगे चलकर देश का नेतृत्व किया। हालांकि, राजीव गांधी का रुझान राजनीति की ओर बिल्कुल नहीं था। वे एक शांत जीवन जीने में विश्वास रखते थे। उन्होंने देहरादून के प्रतिष्ठित दून स्कूल में अपनी शुरुआती शिक्षा पूरी की और उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन चले गए। वहां उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज में प्रवेश लिया और बाद में लंदन के इंपीरियल कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। उन्हें पढ़ने-लिखने से अधिक फोटोग्राफी, रेडियो सुनने और संगीत में रुचि थी।

पायलट के रूप में उड़ान

राजीव गांधी का सबसे बड़ा जुनून आसमान में विमान उड़ाना था। ब्रिटेन से लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ्लाइंग क्लब की परीक्षा उत्तीर्ण की और कमर्शियल पायलट का लाइसेंस प्राप्त किया। वे इंडियन एयरलाइंस के साथ एक पायलट के तौर पर जुड़ गए और अपना करियर संवारने लगे। उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि विमान के कॉकपिट में बैठकर आसमान की ऊंचाइयों को छूने वाला यह युवा एक दिन भारत की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बनेगा। उनका सपना एक सामान्य और तकनीक से भरपूर जीवन जीने का था, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही योजना बना रखी थी।

संजय गांधी की मृत्यु और राजनीति का प्रवेश

राजीव गांधी के जीवन में सबसे बड़ा बदलाव 1980 में आया, जब एक विमान दुर्घटना में उनके छोटे भाई संजय गांधी का निधन हो गया। इस घटना ने पूरे गांधी परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। कांग्रेस पार्टी और परिवार की विषम परिस्थितियों ने राजीव गांधी को अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को छोड़कर राजनीति के मैदान में उतरने के लिए मजबूर किया। उन्होंने अमेठी से लोकसभा उपचुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की। इसके बाद वे धीरे-धीरे कांग्रेस की संगठनात्मक गतिविधियों में पूरी तरह शामिल हो गए और पार्टी के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरने लगे।

प्रधानमंत्री के रूप में बड़ी चुनौती

31 अक्टूबर 1984 की तारीख भारतीय इतिहास के सबसे काले दिनों में से एक थी, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। पूरा देश गम और सदमे के माहौल में डूबा हुआ था। कांग्रेस पार्टी के सामने नेतृत्व का बड़ा संकट था। ऐसे में, राजीव गांधी ने देश की बागडोर संभालने का निर्णय लिया। केवल 40 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले राजीव गांधी ने तुरंत आम चुनाव कराने की घोषणा की। इस चुनाव में कांग्रेस को जनता का अभूतपूर्व समर्थन मिला और पार्टी ने लोकसभा की 508 में से 401 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया।

आधुनिक भारत का सपना

प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने भारत को एक आधुनिक और तकनीक-आधारित राष्ट्र बनाने का दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने कहा था, 'भारत एक प्राचीन देश है, लेकिन यह एक युवा राष्ट्र भी है। मेरा सपना भारत को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही दुनिया के अग्रणी देशों की कतार में प्रथम पंक्ति में खड़ा करना है।' उन्होंने विज्ञान, कंप्यूटर और दूरसंचार क्षेत्र के विकास को अपनी प्राथमिकता बनाया। आज के समय में भारत में जो तकनीकी क्रांति दिखाई देती है, उसकी नींव बहुत हद तक राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान ही रखी गई थी। उन्होंने शिक्षा और युवा शक्ति पर विशेष जोर दिया ताकि भारत 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो सके।

गंभीर राजनीतिक चुनौतियां

राजीव गांधी का कार्यकाल आसान नहीं था। उन्हें कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पंजाब, असम और श्रीलंका के जातीय मुद्दों ने उनकी सरकार को काफी उलझाए रखा। देश के भीतर सामाजिक तनाव और राजनीतिक विरोधों के बावजूद, उन्होंने कभी भी अपने विजन से समझौता नहीं किया। वे जानते थे कि अगर भारत को एक वैश्विक महाशक्ति बनना है, तो तकनीक के बिना यह संभव नहीं है। उनका यह सफर, जो पायलट के रूप में शुरू हुआ था, देश को नई दिशा देने की ओर अग्रसर था।

श्रीपेरुम्बुदूर की दर्दनाक घटना

राजीव गांधी के जीवन का अंत भी उनकी राजनीति की शुरुआत की तरह ही अचानक और दर्दनाक रहा। 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरुम्बुदूर में वे एक चुनावी सभा को संबोधित करने गए थे। वहां हजारों की भीड़ उनके समर्थन में उमड़ी हुई थी। तभी एक महिला आत्मघाती हमलावर उनके करीब आई, जिसने उन्हें माला पहनाई और पैर छूने का नाटक किया। इसी दौरान उसके शरीर में छिपे विस्फोटक में जोरदार धमाका हुआ। इस आत्मघाती हमले में राजीव गांधी सहित 16 लोगों की मृत्यु हो गई। यह घटना पूरे देश के लिए एक गहरा आघात थी।

हत्या की साजिश और जांच

इस वीभत्स घटना की जांच सीबीआई को सौंपी गई। जांच के दौरान सामने आया कि यह साजिश श्रीलंका के तमिल उग्रवादी संगठन LTTE द्वारा रची गई थी। जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे हमले की योजना LTTE प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण के नेतृत्व में बनाई गई थी। इसे अंजाम देने के लिए शिवरासन को मुख्य जिम्मेदारी सौंपी गई थी और धनु एवं शुभा जैसे लोग इस नेटवर्क का हिस्सा थे। घटना के बाद पुलिस और जांच एजेंसियों ने कई आरोपियों को दबोचा। मुख्य षड्यंत्रकारी शिवरासन ने पकड़े जाने से बचने के लिए आत्महत्या कर ली। हर साल 20 अगस्त को उनकी जयंती को 'सद्भावना दिवस' के रूप में मनाकर देश उन्हें श्रद्धांजलि देता है और उनके योगदान को याद करता है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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