ममता को अब सोनिया का सहारा क्यों चाहिए भारत एक महीने पहले 15
दिल्ली में 25 विपक्षी दलों की इंडी अलायंस बैठक के बीच तृणमूल कांग्रेस तीन गुटों में बंटती दिखी, जब 28 में से बीस सांसदों ने एनडीए को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। ममता बनर्जी की पार्टी इस वक्त बैसाखियों पर टिकी नजर आ रही है।

दिल्ली में सोमवार को 25 विपक्षी दलों के नेता इंडी अलायंस की बैठक में जुटे। तय हुआ कि बीते मतभेदों को भुलाकर अब बीजेपी के खिलाफ एकजुट होकर मैदान में उतरा जाएगा। पर असल सवाल यही है कि क्या ये तमाम पार्टियां एक ही गठबंधन की छतरी के नीचे टिकी रह पाएंगी? यह बैठक ममता बनर्जी के आग्रह पर ही बुलाई गई थी। ममता को इस वक्त सहारे की जरूरत है, क्योंकि उनकी पार्टी बैसाखियों के बल पर खड़ी दिख रही है। वह दौर अब बीत चुका है जब इंडी अलायंस के भीतर ममता बनर्जी की तूती बोलती थी। उसी दौर में उन्होंने विधानसभा चुनाव में बीजेपी को शिकस्त दी थी और लोकसभा में भी उनके पास ठीक-ठाक संख्या में सांसद थे, लेकिन देखते ही देखते सारा समीकरण पलट गया।

इंडी अलायंस में इस समय कांग्रेस सबसे बड़ा दल है और तीन राज्यों में उसकी सरकारें हैं, मगर गठबंधन की लड़ाई तो राष्ट्रीय स्तर की है और कांग्रेस लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव हार चुकी है। चुनाव हार चुके क्षेत्रीय चेहरों में तेजस्वी यादव, शरद पवार, उद्धव ठाकरे और अखिलेश यादव शामिल हैं। कुछ समय पहले तक केजरीवाल और स्टालिन जैसे दो और कद्दावर नेता भी साथ थे। हार के बाद ये सभी कांग्रेस से छिटकते चले गए और इंडी अलायंस बिखरने लगा।

राहुल गांधी इस मायने में कुछ फायदे में दिखते हैं कि चुनाव हार चुके नेता एक बार फिर गठबंधन गढ़ने को मजबूर हैं। यह वक्त की मजबूरी है, क्योंकि दिल से कोई एक-दूसरे को नहीं अपनाता। हालत ऐसी है कि न तो साथ रहा जा रहा है और न ही अलगाव सहा जा रहा है।

गद्दार कौन और वफादार कौन

दिलचस्प बात यह रही कि ममता बनर्जी जब दिल्ली में मौजूद थीं, ठीक उसी वक्त दिल्ली में ही उनकी पार्टी संसद के भीतर बिखर गई। फिर भी ममता ने इस टूट पर एक शब्द तक नहीं कहा। तृणमूल कांग्रेस के 28 में से बीस सांसदों ने अपनी अलग राह पकड़ ली। काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर बता दिया कि अब वे सदन में एनडीए का साथ देंगे।

इस घड़ी तृणमूल कांग्रेस तीन धड़ों में बंटी नजर आ रही है। पहला धड़ा ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का है। दूसरा धड़ा काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले उन सांसदों का है, और तीसरा धड़ा बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी का है। सियासत में वक्त किस तरह करवट लेता है, यह सोमवार को दिल्ली में साफ दिखाई दिया। एक ओर ममता बनर्जी सोनिया और राहुल के साथ बैठकर मोदी से मुकाबले की रणनीति बुन रही थीं, तो वहीं कुछ ही दूरी पर उनकी पार्टी के दो-तिहाई सांसद दीदी का साथ छोड़कर मोदी के समर्थन वाली चिट्ठी का मसौदा तैयार कर रहे थे।

यह सच है कि अलग होने वालों में काकोली घोष दस्तीदार जैसे सांसद भी हैं, जो उम्र भर तृणमूल कांग्रेस के साथ रहे, इसलिए उनके पाला बदलने को गद्दारी करार दिया गया। मगर यह देखना भी जरूरी है कि गद्दार का तमगा देने वाले खुद कौन हैं। कीर्ति आजाद, जो जीवन भर बीजेपी में रहे और कुछ ही साल पहले टिकट की खातिर दीदी की शरण में आए, अब टीएमसी छोड़ने वालों को गद्दार बता रहे हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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