मोदी का संदेश: रील बनाने से वोट नहीं मिलते, अभी और रिकॉर्ड टूटने बाकी हैं भारत 2 घंटे पहले 5
विविधता और गठबंधन की राजनीति वाले देश में 12 साल तक लगातार जनता का भरोसा जीतना बड़ी बात है। साथ ही ममता की पार्टी में टूट, और पाक अधिकृत कश्मीर में फौज के खिलाफ बगावत की तस्वीर।

भारत जैसे विविधता से भरे देश में, जहां बहुदलीय शासन व्यवस्था है और गठबंधन की राजनीति का माहौल है, वहां लगातार 12 साल तक जनता का भरोसा बनाए रखना कोई आसान उपलब्धि नहीं है। आम तौर पर देखा जाता है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद सरकार के प्रति लोगों में नाराजगी पनपने लगती है, मगर नरेन्द्र मोदी के मामले में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। उनके प्रति जनता का विश्वास घटने के बजाय लगातार मजबूत होता जा रहा है। मोदी के नाम और उनके किए गए कामों के सहारे केवल बीजेपी ही नहीं, बल्कि एनडीए के सहयोगी दल भी चुनावी जीत हासिल कर रहे हैं।

देश की राजनीति में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। किसी एक नेता को जनता का इतना व्यापक समर्थन शायद ही कभी मिला हो। दिल्ली में एनडीए नेताओं के सामने मोदी ने कहा कि जो कुछ भी हासिल हुआ है, वह जनता के सहयोग और आशीर्वाद से ही संभव हुआ, लेकिन अब रुकने या थकने का वक्त नहीं है, नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ते रहना है। उन्होंने इशारा किया कि इन दिनों दो किस्म के नेता दिखाई देते हैं — एक वे जो रील बनाकर उसे वायरल कराने में जुटे रहते हैं, और दूसरे वे जो जनता का वोट हासिल करते हैं। मोदी दूसरी श्रेणी के नेता हैं। बीते 12 वर्षों में उन्होंने लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीता और देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को तीन अंकों के आंकड़े तक भी नहीं पहुंचने दिया।

जब मोदी प्रधानमंत्री बने थे, उस वक्त सात राज्यों में एनडीए की सरकारें थीं, जबकि आज 22 जगहों पर बीजेपी-एनडीए की सरकारें हैं। लोकतंत्र में असली नेता वही माना जाता है जो असंभव को संभव कर दिखाए और अपनी पार्टी में जीत की भूख जगाए रखे। बंगाल और असम के चुनाव इसी सोच के ताजा उदाहरण हैं। मोदी ने तुष्टिकरण की राजनीति पर विराम लगाकर पूरी बाजी पलट दी, देश में स्थिर सरकार चलाकर दिखाई और लोगों के मन में सरकार के प्रति भरोसा पैदा किया। एक बार जहां बीजेपी जीती, ज्यादातर जगहों पर उसने वहां दोबारा हार का सामना नहीं किया।

नेहरू जी की तुलना में लंबा कार्यकाल हासिल करना अपने आप में बड़ी बात है, मगर उससे भी अहम है कि वहां तक पहुंचने की राह कैसे तय की गई। मोदी ने बीजेपी को हर बूथ पर मैदान में डटकर लड़ना सिखाया और यह भी सिखाया कि चुनाव छोटा हो या बड़ा, जीत के लिए पूरी जान लगानी पड़ती है। एक चुनाव खत्म होते ही वे अगले की तैयारी में जुट जाते हैं। यही कारण है कि आज विपक्षी दलों के पास उनका मुकाबला करने लायक कोई चेहरा नहीं है। रील बनाने या इंस्टाग्राम पर हिट्स बटोरने से चुनाव नहीं जीते जाते। आने वाले दिनों में और भी रिकॉर्ड टूटेंगे, क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है।

ममता: पार्टी जाए, पर भतीजा न जाए

ममता बनर्जी की पार्टी से नेताओं और सांसदों के निकलने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। ममता की करीबी मानी जाने वाली सुष्मिता देव ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उनके सबसे खास सहयोगियों में गिने जाने वाले कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी ने उन्हें अपमानित किया और साफ कहा कि अगर अभिषेक पार्टी में बने रहेंगे तो वह पार्टी छोड़ देंगे। फिलहाल राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के 11 सांसद बचे हैं और इनमें से भी कई पार्टी से किनारा करने की तैयारी में हैं। लोकसभा में 20 सांसदों ने ऐलान कर दिया है कि वे स्पीकर से खुद को अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग करेंगे।

विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के 64 विधायकों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया और ममता के साथ केवल 16 विधायक रह गए हैं। इसी बीच ममता ने सोनिया गांधी से और अभिषेक ने राहुल गांधी से मुलाकात की। खबरों के मुताबिक कांग्रेस की ओर से ममता से कहा गया कि अगर पार्टी को बचाना है तो एकमात्र रास्ता यही है कि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय कर दिया जाए। ममता ने शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस पार्टी को खड़ा करने में उन्होंने 28 साल लगाए, वह महज 28 दिनों में बिखर जाएगी। जिन विधायकों को उन्होंने टिकट देकर जिताया, उनमें से 60 से ज्यादा ने साथ छोड़ दिया, और जिन्हें सांसद बनाया उनमें से 20 ने मुंह मोड़ लिया।

ममता के मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि आखिर यह एहसानफरामोशी क्यों हो रही है। इसकी वजह सिर्फ अभिषेक बनर्जी की तानाशाही नहीं हो सकती। उनके शासनकाल में इतनी लूट मची और लोगों को इतना डराकर रखा गया कि अब जैसे ही ढक्कन खुला, सारी नाराजगी उबलकर बाहर आने लगी।

PoK में बगावत: आसिम मुनीर परेशान

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अब आम लोगों ने पाकिस्तानी फौज के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। बागियों ने पाकिस्तानी सेना के एक एम-17 हेलीकॉप्टर को मार गिराया और इस हादसे में सवार सभी 21 फौजी मारे गए। पाकिस्तानी सेना ने सफाई देते हुए कहा कि यह दुर्घटना तकनीकी खराबी के चलते हुई और हेलीकॉप्टर पर कोई हमला नहीं हुआ, लेकिन पीओके के लोगों का दावा है कि यह फौज के अत्याचारों का नतीजा है और अब आर-पार की लड़ाई होगी।

पीओके में जनता सड़कों पर उतर आई है और पाकिस्तानी रेंजर्स लोगों पर सीधे गोलियां चला रहे हैं। दर्जनों लोग अब तक मारे जा चुके हैं। बगावत को कुचलने के लिए फौज लगातार ऑपरेशन चला रही है। मस्जिदों, मदरसों और सरकारी इमारतों से ऐलान कराया जा रहा है कि मुजफ्फराबाद, रावलाकोट, मीरपुर और दूसरे शहरों की तरफ बढ़ रहे बागी शहरी इलाकों से दूर रहें। पूरे पीओके में झेलम घाटी, ददियाल, कोटली, भीमबर और हजीरा जैसे दूर-दराज के इलाकों से हजारों लोग बड़े-बड़े काफिलों के रूप में शहरों की ओर कूच कर रहे हैं। इन्हें रोकने के लिए पाकिस्तानी सेना ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है और अंधाधुंध फायरिंग कर लोगों को डराने की कोशिश की जा रही है।

पीओके के लोगों का कहना है कि फौज की फायरिंग में अब तक कितने लोगों की जान गई है, इसका कोई ठीक-ठीक अंदाजा नहीं है, क्योंकि शव छुपाए जा रहे हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि पाकिस्तान ने कभी अपनी जनता के प्रति संवेदना नहीं दिखाई। वहां सत्ता असल में फौज के हाथ में है और फौज सिर्फ गोली की भाषा समझती है। हमारे कश्मीर के जिस हिस्से पर पाकिस्तान ने कब्जा किया हुआ है, वहां के लोगों को उसने कभी सुकून से जीने नहीं दिया, उन्हें गरीब और लाचार बनाए रखा और उन पर लगातार जुल्म किए। अब बगावत की यह आग पाकिस्तानी हुकूमत के काबू से बाहर हो चुकी है। लोग अपनी जान की परवाह किए बिना लोहा लेने को तैयार खड़े हैं और यह आग पाकिस्तान को बहुत भारी पड़ने वाली है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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