रायपुर में डॉक्टरों का कमाल: नौ साल की बच्ची के कान से निकाला सालभर पुराना लोहे का छर्रा, टली बड़ी विपत्ति छत्तीसगढ़ 2 घंटे पहले 3
रायपुर के डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल में डॉक्टरों ने तीन घंटे की जटिल सर्जरी के बाद नौ वर्षीय बच्ची के कान से लोहे का छर्रा निकाला, जिससे वह बहरेपन और लकवे के खतरे से सुरक्षित बच गई।

बच्चों की खेल-खेल में की गई छोटी सी भूल कभी-कभी पूरे परिवार के लिए बड़ी मुसीबत बन जाती है। ऐसा ही एक बेहद हैरान करने वाला मामला छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सामने आया है। यहां के डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति चिकित्सालय के कान, नाक और गला (ईएनटी) विभाग के डॉक्टरों ने एक नौ वर्षीय बच्ची के कान से सालभर पुराना लोहे का छर्रा सुरक्षित बाहर निकाला है। यह छर्रा इतने लंबे समय से कान के भीतर फंसा हुआ था कि उसने बच्ची के कान के पर्दे और सुनने वाली नाजुक हड्डियों को भारी नुकसान पहुंचाया था। डॉक्टरों की सूझबूझ और तत्परता के चलते बच्ची को जीवनभर के बहरेपन से बचा लिया गया है।

तीन घंटे तक चला अत्यंत नाजुक ऑपरेशन

राजधानी के डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल के ईएनटी विभाग में इस असाधारण और चुनौतीपूर्ण सर्जरी को अंजाम दिया गया। ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. हंसा बंजारा के कुशल निर्देशन में डॉ. दुर्गेश गजेंद्र और उनकी टीम ने लगभग तीन घंटे तक चले अत्यंत सूक्ष्म ऑपरेशन के बाद आखिरकार उस लोहे के छर्रे को बच्ची के कान से सफलतापूर्वक बाहर निकाल लिया।

दरअसल, इस बच्ची के बाएं कान के भीतर पिछले लगभग एक साल से लोहे का एक छोटा छर्रा फंसा हुआ था। इतने लंबे समय तक कान के बेहद संवेदनशील हिस्से में लोहे की चीज दबे रहने के कारण बच्ची के कान का पर्दा और उसके अंदर की सुनने वाली अत्यंत नाजुक हड्डियां पूरी तरह से गल चुकी थीं। छर्रा निकालने के साथ ही डॉक्टरों ने मरीज के ही टिश्यूज (उत्तकों) का उपयोग करके कान के क्षतिग्रस्त पर्दे और गल चुकी नाजुक हड्डियों का दोबारा सफलतापूर्वक निर्माण किया।

आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों का किया गया इस्तेमाल

डॉक्टरों ने इस बेहद बारीक ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का सहारा लिया। इसके अंतर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित जटिल प्रक्रियाएं अपनाई गईं:

  • माइक्रोस्कोपिक सर्जरी: कान के अत्यंत संकीर्ण और बारीक हिस्सों को स्पष्ट देखने के लिए विशेष माइक्रोस्कोपिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
  • टिमपैनोप्लास्टी: इस तकनीक के जरिए डॉक्टरों ने बच्ची के स्वयं के टिश्यूज का उपयोग कर कान के फटे हुए पर्दे को दोबारा दुरुस्त किया।
  • ऑसिकलॉप्लास्टी: इस प्रक्रिया के तहत गलकर नष्ट हो चुकीं सुनने की नाजुक हड्डियों को सर्जरी के माध्यम से फिर से ठीक किया गया।

चेहरे के लकवे और बहरेपन का था बड़ा खतरा

अस्पताल के अधीक्षक डॉ. संतोष सोनकर ने इसे एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण सर्जरी बताते हुए डॉक्टरों की टीम की सराहना की है। ऑपरेशन को लीड करने वालीं डॉ. दुर्गेश गजेंद्र ने बताया कि जब बच्ची को अस्पताल लाया गया, तो उसकी स्थिति गंभीर थी। सीटी स्कैन कराने पर पता चला कि लोहे का छर्रा कान के सबसे संवेदनशील हिस्से 'मिडिल ईयर' (मध्य कर्ण) तक पहुंच चुका था।

डॉ. गजेंद्र के मुताबिक, इस ऑपरेशन में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि डॉक्टरों को चेहरे की मुख्य नस के बेहद करीब जाकर काम करना था। यदि सर्जरी के दौरान हाथ थोड़ा सा भी हिल जाता या जरा सी भी चूक हो जाती, तो बच्ची के चेहरे की नस क्षतिग्रस्त हो सकती थी। इसके कारण बच्ची को हमेशा के लिए चेहरे का लकवा मार सकता था और उसका चेहरा तिरछा हो सकता था। लेकिन डॉक्टरों के सधे हुए हाथों ने इस बड़े खतरे को पूरी तरह से टाल दिया।

मस्तिष्क तक संक्रमण फैलने की थी आशंका

चिकित्सकों ने स्पष्ट किया कि यदि इस मामले में समय पर सर्जरी नहीं की जाती, तो कान का यह संक्रमण तेजी से फैलते हुए बच्ची के मस्तिष्क तक पहुंच सकता था, जो बेहद जानलेवा साबित हो सकता था। इस सफल ऑपरेशन के बाद बच्ची अब पूरी तरह से स्वस्थ है। डॉक्टरों को पूरी उम्मीद है कि जल्द ही उसकी सुनने की क्षमता भी पूरी तरह से सामान्य हो जाएगी।

अभिभावकों के लिए चिकित्सकों की बेहद जरूरी सलाह

इस घटना के बाद डॉक्टरों ने सभी अभिभावकों से बच्चों के मामले में विशेष सावधानी बरतने की अपील की है:

  • बच्चे अक्सर खेलते समय नाक या कान में छोटी चीजें जैसे मोती, बीज, छर्रा या सिक्का डाल लेते हैं, इसलिए उन पर पैनी नजर रखें।
  • यदि बच्चा कान में दर्द, भारीपन या कम सुनाई देने की शिकायत करता है, तो उसे कतई मामूली समझकर नजरअंदाज न करें।
  • कान में कोई चीज फंसने पर कभी भी घरेलू नुस्खे न आजमाएं और न ही खुद पिन, चिमटी या सुई से उसे निकालने की कोशिश करें। ऐसा करने से वह वस्तु और अंदर जा सकती है, जिससे कान का पर्दा फट सकता है।
  • ऐसी स्थिति होने पर बिना देरी किए तुरंत किसी योग्य ईएनटी विशेषज्ञ या नजदीकी सरकारी अस्पताल में संपर्क करें।
अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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