उत्तर प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
अयोध्या पर राजनीति और सीएम का कटाक्ष
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर एक तीखा राजनीतिक हमला किया है। अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर के निर्माण और वहां अखिलेश यादव के न जाने को लेकर मुख्यमंत्री ने अपनी नाराजगी जाहिर की। योगी आदित्यनाथ ने इस दौरान डॉ. राममनोहर लोहिया के रामायण मेले की याद दिलाई और कहा कि जिन लोहिया को समाजवादी अपना आदर्श मानते हैं, उन्हीं ने रामायण मेले की शुरुआत की थी। मुख्यमंत्री ने तंज कसते हुए कहा कि आज के समाजवादी प्रभु श्रीराम से इतनी दूरी क्यों बना रहे हैं? यह बयान महज एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि इसके पीछे समाजवाद के पुरोधा डॉ. लोहिया के सांस्कृतिक चिंतन और भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय छिपा है।
सांस्कृतिक चेतना के वाहक थे डॉ. लोहिया
भारतीय राजनीति के इतिहास में डॉ. राममनोहर लोहिया का नाम समाजवाद के सबसे बड़े प्रणेता के रूप में दर्ज है। हालांकि, लोहिया केवल राजनीति तक सीमित नहीं थे। उनका मानना था कि भारत को एक सूत्र में पिरोने के लिए संस्कृति का सहारा लेना अनिवार्य है। डॉ. लोहिया की दृष्टि में राम, कृष्ण और शिव जैसे महापुरुष केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं थे, बल्कि वे इस राष्ट्र को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने वाले सबसे बड़े प्रतीक थे। वे राम को उत्तर से दक्षिण तक भारत की एकता के सूत्रधार के रूप में देखते थे। यही कारण है कि उन्होंने भारतीय संस्कृति को आम जनता तक ले जाने के लिए रामायण मेले की परिकल्पना की थी।
रामायण मेले के पीछे का गहरा उद्देश्य
भगवान श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास का सबसे अधिक समय, लगभग साढ़े ग्यारह साल, चित्रकूट में व्यतीत किया था। डॉ. लोहिया का मानना था कि चित्रकूट का महत्व पूरे देश में फैलाया जाना चाहिए। इसी विचार को धरातल पर उतारने के लिए उन्होंने 1961 में पहली बार रामायण मेला आयोजित करने का विचार रखा। उनका सपना एक ऐसा मंच बनाने का था, जहां संत, विद्वान, कलाकार और आम आदमी एक साथ जुटें और रामकथा के माध्यम से मर्यादा, समता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर संवाद कर सकें। लोहिया चाहते थे कि यह आयोजन समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी श्रीराम के जीवन से प्रेरणा लेने का अवसर प्रदान करे।
मेले के साकार होने की 12 साल की तपस्या
डॉ. लोहिया का यह स्वप्न रातों-रात पूरा नहीं हुआ। इस मेले को हकीकत में बदलने के लिए पूरे 12 साल तक कठिन संघर्ष चला। चित्रकूट के स्थानीय विचारकों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने इस वैचारिक मशाल को जलाए रखने में अहम भूमिका निभाई। इनमें स्वतंत्रता सेनानी बलदेव प्रसाद गुप्त का नाम सबसे महत्वपूर्ण है, जो लोहिया के आने पर हर बार उनकी मेजबानी करते थे और सारी तैयारियों का जिम्मा संभालते थे। उनके साथ बाबूलाल गर्ग ने भी इस मिशन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। अंततः, वर्ष 1973 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के प्रयासों से रामायण मेले का भव्य आयोजन चित्रकूट में संपन्न हो सका। यह वर्ष ऐतिहासिक था क्योंकि 1973 में गोस्वामी तुलसीदास की अमर रचना रामचरितमानस के 400 वर्ष पूरे हुए थे, जिसे मानस चतुर्थशती के रूप में मनाया गया था।
राज नारायण और वह ऐतिहासिक तस्वीर
रामायण मेले के इतिहास से जुड़ा एक बहुत ही दिलचस्प और सादगी भरा किस्सा आज भी चर्चाओं में रहता है। यह किस्सा बलदेव प्रसाद गुप्त के संग्रह से दुनिया के सामने आया। एक बार जब डॉ. लोहिया और समाजवादी नेता राज नारायण चित्रकूट में मेले की तैयारियों के सिलसिले में बैठक कर रहे थे, तब एक फोटो खिंचवाने की बात आई। सभी नेता वहां मौजूद थे, लेकिन राज नारायण जी दुविधा में पड़ गए क्योंकि उनके पास पहनने के लिए साफ कपड़े उपलब्ध नहीं थे।
- राज नारायण के कपड़े धुलने के लिए गए हुए थे, जिससे वे काफी परेशान थे।
- डॉ. लोहिया ने स्थिति को भांपते हुए अपने ठेठ अंदाज में कहा कि बिस्तर की चादर ओढ़कर ही फोटो खिंचवा लो।
- बिना किसी संकोच के राज नारायण ने बिस्तर की चादर ओढ़ी और ग्रुप फोटो में शामिल हुए।
यह तस्वीर आज समाजवाद के उन दिग्गजों की सादगी और श्रीराम के प्रति उनके समर्पण की गवाह मानी जाती है। बलदेव प्रसाद गुप्त के पास यह तस्वीर लंबे समय तक सुरक्षित रही। बाद में जब इसे सार्वजनिक किया गया, तो रामायण मेले की स्मारिका में इसे प्रमुखता से जगह दी गई। आज जब भी समाजवादियों की श्रीराम के प्रति दूरी पर बात होती है, तो इतिहास का यह पन्ना स्वतः ही याद आ जाता है। सीएम योगी आदित्यनाथ का यह बयान इसी वैचारिक विरोधाभास की ओर इशारा करता है, जो लोहिया के आदर्शों और आज की सपा की राजनीति के बीच के फासले को दर्शाता है।
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