झारखंड
2 महीने पहले
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विचारों
मेहनत और सही दिशा से बदली तकदीर
आज के दौर में ग्रामीण युवा रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, लेकिन कोडरमा जिले के डोमचांच प्रखंड स्थित मसनोडीह गांव के रहने वाले सुमन लाल मेहता ने गांव में ही रहकर सफलता की एक नई कहानी लिखी है। सुमन लाल मेहता ने साबित कर दिया है कि अगर सही प्रशिक्षण और संकल्प हो, तो अपने गांव की मिट्टी में भी कमाई के सुनहरे अवसर तलाशे जा सकते हैं। एक समय ऐसा था जब सुमन लाल मेहता परिवार का पेट पालने के लिए दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी किया करते थे, लेकिन अब वे खुद के मुर्गा पालन व्यवसाय के मालिक हैं और हर महीने हजारों रुपये कमा रहे हैं।
प्रशिक्षण बना सफलता की कुंजी
सुमन लाल मेहता का कहना है कि जब वे बाहर मजदूरी करते थे, तो उनकी मासिक आय महज 15 से 20 हजार रुपये तक ही सिमट कर रह जाती थी। इस मामूली कमाई से परिवार का भरण-पोषण करना और भविष्य की जरूरतों को पूरा करना बेहद कठिन था। इस संघर्षपूर्ण जीवन के दौरान उन्हें कृषि एवं पशुपालन विभाग की ओर से बरही के गौरियाकर्मा में आयोजित आठ दिवसीय मुर्गा पालन प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में पता चला। इस प्रशिक्षण सत्र ने उनके सोचने का नजरिया बदल दिया और उन्होंने इसी क्षेत्र में स्वरोजगार शुरू करने का मन बना लिया।
व्यावसायिक स्तर पर मुर्गा पालन
प्रशिक्षण लेने के बाद सुमन ने अपने गांव में खाली पड़ी भूमि का उपयोग किया और वहां करीब 15 हजार वर्ग फीट का एक बड़ा शेड तैयार करवाया। पूरी लगन और मेहनत के साथ उन्होंने मुर्गा पालन का काम शुरू किया। आज स्थिति यह है कि उनके फार्म में एक बार में करीब 10 हजार मुर्गे तैयार किए जा रहे हैं। उन्होंने मुर्गी पालन के गणित को बेहद सरल और प्रभावी तरीके से अपनाया है।
मुनाफे का पूरा हिसाब-किताब
सुमन लाल मेहता ने अपने मुनाफे का जो खाका पेश किया है, वह अन्य युवाओं के लिए प्रेरणादायक है:
- बाजार से एक चूजे की खरीद लगभग 35 रुपये में की जाती है।
- एक चूजे को पूरी तरह तैयार होने में करीब 35 से 40 दिनों का समय लगता है।
- दाने, दवाओं और अन्य देखरेख के खर्चों को जोड़कर प्रति चूजा लगभग 100 रुपये का निवेश आता है।
- तैयार होने के बाद मुर्गे का वजन औसतन एक किलो या उससे अधिक हो जाता है, जिसे लगभग 110 रुपये प्रति किलो के दाम पर बेचा जाता है।
सबसे खास बात यह है कि उन्हें अपना माल बेचने के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ता है। थोक मुर्गी फार्म संचालक खुद उनके फार्म पर आते हैं और मुर्गे खरीदकर ले जाते हैं। सुमन बताते हैं कि तमाम खर्च निकालने के बाद उन्हें हर मुर्गे पर करीब 10 रुपये का शुद्ध लाभ बच जाता है। इस तरह 10 हजार मुर्गों के एक बैच से उन्हें हर महीने लगभग एक लाख रुपये की कमाई हो रही है।
युवाओं के लिए प्रेरणा
सुमन लाल मेहता की यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि सरकारी प्रशिक्षण योजनाओं का लाभ उठाकर आत्मनिर्भर बना जा सकता है। उन्होंने अन्य युवाओं से भी अपील की है कि वे रोजगार के लिए केवल शहरों की ओर पलायन न करें, बल्कि अपने संसाधनों और सरकारी मदद का सही इस्तेमाल कर स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ाएं।
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