राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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विचारों
जून 2026 की एक ही तारीख ने कश्मीर की दो बिल्कुल अलग तस्वीरें दुनिया के सामने रख दीं। नियंत्रण रेखा (LoC) के पश्चिमी हिस्से, यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के रावलकोट, मुजफ्फराबाद और मीरपुर की सड़कों पर प्रदर्शनकारी और सुरक्षा बल आमने-सामने थे। इंटरनेट ठप था, गिरफ्तारियों का सिलसिला जारी था और लोगों के भीतर पाकिस्तान सरकार के प्रति गहरा रोष साफ झलक रहा था। ठीक उसी समय LoC के पूर्व में, जम्मू-कश्मीर के जोजिला इलाके में इंजीनियर, मजदूर और अधिकारी एशिया की सबसे लंबी द्विदिशीय सड़क सुरंग — जोजिला टनल — की ऐतिहासिक उपलब्धि का जश्न मना रहे थे।
ये महज दो अलग-अलग घटनाएं नहीं थीं, बल्कि कश्मीर के दो हिस्सों की दो भिन्न राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हकीकतों की झलक थीं।
पीओके में क्यों भड़क रहा है असंतोष
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर बीते कुछ वर्षों से लगातार अस्थिरता झेल रहा है। वहां की जनता की नाराजगी केवल महंगाई तक सीमित नहीं है। बिजली की बढ़ती दरें, आटे और दूसरी जरूरी चीजों के दाम, राजनीतिक अधिकारों का अभाव और इस्लामाबाद की बढ़ती दखलंदाजी ने लोगों में गहरा असंतोष पैदा किया है।
जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) जैसे संगठन इसी असंतोष की पृष्ठभूमि से उभरे हैं। शुरुआत में यह आंदोलन मुख्य रूप से आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित था, लेकिन धीरे-धीरे यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व और स्वायत्तता की मांग तक पहुंच गया। पिछले कुछ वर्षों में कई बार व्यापक बंद, प्रदर्शन और विरोध मार्च आयोजित हुए। कई मौकों पर सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें भी हुईं, जिनमें जानें तक गईं।
रावलकोट, मुजफ्फराबाद और मीरपुर जैसे शहर आज पाकिस्तान की प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ बढ़ती नाराजगी का प्रतीक बन चुके हैं। कई प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस क्षेत्र के संसाधनों का दोहन तो किया जाता है, लेकिन विकास और राजनीतिक अधिकारों के मामले में इसे लगातार उपेक्षित रखा जाता है।
जोजिला टनल: विकास का नया प्रतीक
इसके ठीक उलट, भारत के जम्मू-कश्मीर में जोजिला टनल का निर्माण विकास की एक नई इबारत लिख रहा है। करीब 13.15 किलोमीटर लंबी यह सुरंग श्रीनगर और लेह के बीच पूरे साल आवाजाही बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएगी। हर साल भारी बर्फबारी के चलते जोजिला दर्रा कई महीनों तक बंद हो जाता था, जिससे लद्दाख का देश के बाकी हिस्सों से संपर्क टूट जाता था। सुरंग बनने के बाद यह दिक्कत काफी हद तक खत्म हो जाएगी।
इससे न सिर्फ आम लोगों को राहत मिलेगी, बल्कि पर्यटन, व्यापार, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा तक पहुंच भी बेहतर होगी। जोजिला टनल सिर्फ एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र में आधुनिक भारत की इंजीनियरिंग क्षमता और विकास दृष्टि का प्रतीक बन चुकी है।
विकास की लंबी कड़ी
जम्मू-कश्मीर में बदलाव केवल जोजिला टनल तक सीमित नहीं है। बीते कुछ वर्षों में कई बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं या तो पूरी हो चुकी हैं या निर्माणाधीन हैं। दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल माना जाने वाला चिनाब रेल ब्रिज कश्मीर को देश के रेल नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
जेड-मोड़ टनल, नए राष्ट्रीय राजमार्ग, सीमावर्ती सड़कों का विस्तार और वंदे भारत ट्रेनों का संचालन इस बदलाव को और मजबूती दे रहे हैं। इन परियोजनाओं ने यात्रा का समय घटाया है, लॉजिस्टिक्स को आसान बनाया है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी है। पर्यटन क्षेत्र में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई है। श्रीनगर, गुलमर्ग, पहलगाम और सोनमर्ग जैसे स्थलों पर लगातार बढ़ती पर्यटकों की संख्या इसका प्रमाण है।
अनुच्छेद 370 के बाद की तस्वीर
साल 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर के प्रशासनिक और आर्थिक ढांचे में बड़े बदलाव सामने आए। केंद्र सरकार ने निवेश आकर्षित करने, उद्योगों को बढ़ावा देने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने पर जोर दिया। नई औद्योगिक नीतियों, स्टार्टअप प्रोत्साहन योजनाओं और डिजिटल कनेक्टिविटी के विस्तार ने युवाओं के लिए नई राहें खोली हैं।
जहां कभी पत्थरबाजी और हिंसा की खबरें सुर्खियां बनती थीं, अब वहीं पर्यटन, स्टार्टअप और बुनियादी ढांचा विकास चर्चा के केंद्र में हैं। चुनौतियां भले अब भी मौजूद हों, लेकिन विकास का एजेंडा पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत नजर आता है।
दो व्यवस्थाएं, दो नतीजे
LoC के दोनों ओर की स्थितियां यह दिखाती हैं कि शासन की गुणवत्ता किसी क्षेत्र के भविष्य को किस तरह आकार देती है। पीओके में लोग बुनियादी सुविधाओं, राजनीतिक अधिकारों और आर्थिक अवसरों की मांग को लेकर सड़कों पर हैं। वहीं भारतीय जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निवेश तथा सड़क, रेल और सुरंग परियोजनाओं के जरिए विकास की प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ रही है।
यह फर्क सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि आम लोगों की जिंदगी में भी साफ दिखता है। एक ओर विरोध प्रदर्शन और सुरक्षा प्रतिबंध रोजमर्रा की खबर बन जाते हैं, तो दूसरी ओर नई परियोजनाएं और रोजगार के अवसर भविष्य की उम्मीद जगाते हैं।
सामरिक महत्व भी कम नहीं
जोजिला टनल का महत्व सिर्फ नागरिक सुविधाओं तक सीमित नहीं है। यह परियोजना सामरिक दृष्टि से भी बेहद अहम है। लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्र तक पूरे साल पहुंच बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी माना जाता है। बेहतर सड़क संपर्क से सुरक्षा बलों की आवाजाही और जरूरी सामग्री की आपूर्ति अधिक तेज और प्रभावी होगी। यही वजह है कि इस परियोजना को रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कश्मीर की बदलती तस्वीर
कश्मीर को लेकर राजनीतिक बहसें और दावे लंबे समय तक चल सकते हैं, लेकिन जमीन पर हो रहे बदलावों को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। एक तरफ पीओके में जनता अपने अधिकारों और बेहतर जीवन की मांग को लेकर संघर्ष कर रही है, तो दूसरी तरफ भारतीय जम्मू-कश्मीर में विकास परियोजनाएं नई संभावनाओं के दरवाजे खोल रही हैं। जून 2026 की ये दो तस्वीरें बताती हैं कि कश्मीर की कहानी सिर्फ सीमा विवाद की नहीं, बल्कि शासन, विकास, अवसर और जन-आकांक्षाओं की भी है।
निष्कर्ष
LoC के दोनों ओर बसे कश्मीर के लोगों की आकांक्षाएं मूल रूप से एक जैसी हैं — बेहतर जीवन, रोजगार, सुरक्षा और सम्मान। फर्क सिर्फ इतना है कि इन आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में दोनों क्षेत्रों की यात्रा अलग-अलग राहों पर चल रही है। एक ओर पीओके में असंतोष, प्रदर्शन और राजनीतिक बेचैनी बढ़ती दिख रही है, तो दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर में जोजिला टनल जैसी परियोजनाएं विकास, कनेक्टिविटी और नई उम्मीदों का प्रतीक बनकर उभर रही हैं। यही विरोधाभास आज कश्मीर की सबसे बड़ी और सबसे अहम कहानी बन चुका है।
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