राष्ट्रीय राजनीति
एक दिन पहले
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विचारों
ब्रिक्स समिट का वायरल पल और भू-राजनीतिक मायने
दिल्ली में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन से सामने आई एक तस्वीर ने वैश्विक पटल पर चर्चा छेड़ दी है। इस वायरल फ्रेम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बेहद आत्मीयता के साथ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान का हाथ थामकर आगे बढ़ते देखा जा सकता है। उनके साथ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा की उपस्थिति इस तस्वीर को और भी प्रभावशाली बनाती है। यह दृश्य केवल शिष्टाचार की मुलाकात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरे कूटनीतिक संदेश की तरह है, जिसने दुनिया की बड़ी ताकतों का ध्यान खींचा है। विशेष रूप से यह तस्वीर अमेरिका और वहां के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दी गई धमकियों के जवाब के रूप में देखी जा रही है।
कूटनीति में बॉडी लैंग्वेज का महत्व
ब्रिक्स भारत 2026 के आधिकारिक बैकड्रॉप के सामने खींची गई यह तस्वीर सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की वैश्विक मीडिया में छाई हुई है। तस्वीर में प्रधानमंत्री मोदी जिस सहजता और मुस्कान के साथ मसूद पेजेशकियान का हाथ थामे हुए हैं, वह उनके बीच के भरोसे को दर्शाती है। कूटनीतिक भाषा में ऐसी बॉडी लैंग्वेज के गहरे अर्थ होते हैं। जब दो देशों के प्रमुख इस प्रकार सार्वजनिक रूप से हाथ में हाथ डालकर चलते हैं, तो यह स्पष्ट करता है कि उनके संबंध केवल औपचारिक समझौतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक मजबूत व्यक्तिगत तालमेल और रणनीतिक विश्वास का प्रतीक है। भारत ने इस कदम के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने अंतरराष्ट्रीय दोस्तों के साथ कठिन परिस्थितियों में भी चट्टान की तरह खड़ा है।
वाशिंगटन और ट्रंप कैंप के लिए चेतावनी
हाल के दिनों में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिक्स देशों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि जो भी देश ब्रिक्स का हिस्सा बनकर डॉलर की वैश्विक प्रभुता को चुनौती देंगे या अमेरिका विरोधी रुख अपनाएंगे, उन पर 100 फीसदी का कड़ा टैरिफ लगाया जाएगा। इसके अतिरिक्त, पश्चिमी देश लगातार ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसे वैश्विक व्यवस्था से अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में दिल्ली के मंच से पीएम मोदी द्वारा ईरानी राष्ट्रपति का हाथ थामना सीधे तौर पर वाशिंगटन के नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। यह घटनाक्रम संदेश देता है कि भारत किसी भी तीसरे देश के दबाव या धमकी में आकर अपने विदेशी संबंधों को प्रभावित नहीं होने देगा। भारत अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
नया वैश्विक क्रम और नेताओं का साथ
इस तस्वीर में केवल पीएम मोदी और मसूद पेजेशकियान का ही नहीं, बल्कि व्लादिमीर पुतिन और सिरिल रामाफोसा का अंदाज भी गौर करने योग्य है। ब्लैक सूट में पुतिन मुस्कुराते हुए इन नेताओं की ओर देख रहे हैं, जो ग्लोबल साउथ के उदय और नई वैश्विक ताकतों के एकजुट होने का प्रमाण है। यह फ्रेम दर्शाता है कि दुनिया का पावर सेंटर धीरे-धीरे परिवर्तित हो रहा है। पश्चिमी देशों का जो वर्चस्व दशकों से चला आ रहा था, उसे यह तस्वीर एक स्पष्ट चुनौती पेश कर रही है। अब उभरती अर्थव्यवस्थाएं एकजुट होकर अपने भविष्य के एजेंडे को तय करने के लिए तत्पर हैं।
भारत और ईरान के बीच रणनीतिक साझेदारी
भारत और ईरान की यह नजदीकी केवल दिखावे के लिए नहीं है, बल्कि इसके पीछे अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक आधार हैं। ईरान भारत के लिए मध्य एशिया, अफगानिस्तान और रूस तक पहुंच बनाने का सबसे महत्वपूर्ण द्वार है। इसके कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- चाबहार पोर्ट का मास्टरप्लान: भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह का विकास कर रहा है, जो पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए भारत को सीधे मध्य एशिया और यूरेशिया से जोड़ता है।
- INSTC कॉरिडोर: 7,200 किलोमीटर लंबा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर भारत को समुद्र और रेल नेटवर्क के जरिए रूस से जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
- ऊर्जा सुरक्षा: ईरान से तेल और गैस की आपूर्ति भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए अनिवार्य है। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे क्षेत्रों में बढ़ते तनाव के बीच यह साझेदारी व्यापारिक सुरक्षा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
टैरिफ और पाबंदियों के बीच ब्रिक्स का कड़ा संदेश
पश्चिमी देशों द्वारा रूस और ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद, ब्रिक्स का यह मंच एक नया रास्ता दिखा रहा है। इन देशों पर लगाए गए बैन का प्रभाव अब कम होता नजर आ रहा है क्योंकि ब्रिक्स सदस्य देश अब आपस में अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने पर जोर दे रहे हैं। डिजिटल करेंसी और तीव्र भुगतान प्रणाली को जोड़ने की दिशा में की जा रही पहल से अमेरिकी डॉलर की दादागीरी को चुनौती मिल रही है। जब भारत, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ईरान जैसे बड़े देश एक साथ आकर व्यापार को सुगम बनाएंगे, तो इससे डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय प्रणाली का प्रभुत्व स्वतः ही कमजोर हो जाएगा। यही वह वास्तविकता है जो अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
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