झारखंड में शिक्षा मंत्रियों की लगातार मौत से फैली सनसनी, क्या अंधविश्वास के घेरे में है शिक्षा मंत्रालय? बिहार 5 घंटे पहले 2
झारखंड में शिक्षा विभाग का प्रभार संभाल रहे तीन मंत्रियों के असामयिक निधन ने राजनीति के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। जगरनाथ महतो, रामदास सोरेन और सुदिव्य सोनू के निधन के बाद अब इस पद को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

राजनीति और अंधविश्वास का पुराना नाता

भारतीय राजनीति के इतिहास में अंधविश्वास से जुड़ी कई ऐसी कहानियां हैं, जो अक्सर चर्चाओं में बनी रहती हैं। कई नेताओं ने अपने सरकारी बंगलों को अशुभ मानकर उन्हें छोड़ दिया, तो कई ने विशेष शहरों के दौरे से परहेज किया। झारखंड का वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम भी अब इसी तरह की चर्चाओं के केंद्र में आ गया है। राज्य में एक के बाद एक लगातार तीन शिक्षा मंत्रियों का असमय निधन होने से लोगों के मन में कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। क्या यह केवल एक दुखद संयोग है या इसके पीछे कोई गहरा राज़ है? इस घटनाक्रम ने राजनीति में फैले अंधविश्वास के उस पुराने पन्ने को फिर से पलट दिया है, जहाँ लोग तर्क से परे जाकर घटनाओं को अशुभ या शुभ मान लेते हैं।

बिहार में भूतिया बंगले का शोर

अंधविश्वास की ऐसी ही एक चर्चित कहानी बिहार की राजधानी पटना से जुड़ी है। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव ने साल 1918 में मंत्री पद से हटने के बाद अपने आवंटित सरकारी आवास, 3, देशरत्न मार्ग को लेकर बेहद चौंकाने वाला दावा किया था। उनका कहना था कि इस बंगले में भूत का साया है और वहां रहने वाला कोई भी व्यक्ति सुख-शांति से नहीं रह सकता। तेज प्रताप ने तो यहां तक आरोप लगाया था कि भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मिलकर इस आवास में भूत भेज दिए हैं। हालांकि, राजनीति के जानकारों का मानना है कि मंत्री पद से हटने की उनकी वजह पूरी तरह से राजनीतिक थी, न कि बंगले का कोई भूत। यह आवास बाद में विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह को दिया गया।

अशुभ आवासों की लंबी फेहरिस्त

पटना में केवल एक आवास ही नहीं, बल्कि कई अन्य सरकारी बंगलों को भी अशुभ माना जाता रहा है। 39, हार्डिंग रोड और स्ट्रैंड रोड के बंगला नंबर 6 के बारे में भी ऐसी ही लोक-धारणाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इन आवासों में जो भी मंत्री रहा, वह अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा नहीं कर सका। हालांकि, इस तरह की धारणाओं का वास्तविकता से कोई ठोस संबंध नहीं होता। यह अक्सर उन मंत्रियों की राजनीतिक विफलताओं को छिपाने का एक तरीका होता है, जिन्हें समय से पहले अपना पद छोड़ना पड़ा।

नोएडा जाने से डरते थे मुख्यमंत्री

उत्तर प्रदेश के नोएडा को लेकर भी भारतीय राजनीति में दशकों तक एक बड़ा अंधविश्वास कायम रहा। यह धारणा इतनी गहरी थी कि कई मुख्यमंत्री नोएडा जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते थे। माना जाता था कि जो भी मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान नोएडा का दौरा करेगा, उसकी कुर्सी छिन जाएगी। इस डर को हवा तब मिली जब जून 1988 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह नोएडा गए और जल्द ही उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद 1989 में एनडी तिवारी के साथ भी ऐसा ही हुआ। यही कारण रहा कि मुलायम सिंह यादव, मायावती और कल्याण सिंह जैसे दिग्गजों ने भी नोएडा जाने से परहेज किया। वर्ष 2012 से 2017 के बीच अखिलेश यादव ने भी मुख्यमंत्री रहते हुए नोएडा जाने का साहस नहीं किया और वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए ही कामकाज निपटाया। लेकिन, योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद इस अंधविश्वास को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जेवर एयरपोर्ट के उद्घाटन के समय इस बात का जिक्र किया था कि कैसे पुराने नेता कुर्सी जाने के डर से नोएडा से दूरी बनाए रखते थे।

झारखंड में शिक्षा मंत्रियों का सिलसिला

अब बात करते हैं झारखंड की, जहां शिक्षा मंत्रालय को लेकर चर्चाएं गर्म हैं। वर्ष 2019 में हेमंत सोरेन के सत्ता में आने के बाद टाइगर के नाम से विख्यात जगरनाथ महतो को शिक्षा मंत्री बनाया गया था। कोरोना काल के दौरान फेफड़ों के गंभीर संक्रमण के चलते 6 अप्रैल 2023 को उनका दुखद निधन हो गया। जगरनाथ महतो के बाद इस महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी रामदास सोरेन को सौंपी गई। दुर्भाग्य देखिए कि केवल एक साल के भीतर ही उनका भी निधन हो गया। इसके बाद हेमंत सोरेन ने सुदिव्य सोनू को शिक्षा मंत्री के रूप में नियुक्त किया। सुदिव्य सोनू न केवल हेमंत सरकार के संकट मोचक माने जाते थे, बल्कि जेएमएम में अत्यंत भरोसेमंद नेता थे। हाल ही में 6 सितंबर 2026 को सुदिव्य सोनू का भी निधन हो गया।

आगे क्या होगा?

लगातार तीन शिक्षा मंत्रियों की मौत ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक खामोशी और डर का माहौल बना दिया है। फिलहाल अगले शिक्षा मंत्री के नाम को लेकर अटकलें तो लग रही हैं, लेकिन कोई भी इस जिम्मेदारी को लेने में हिचकिचा रहा है। राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चा है कि इस बार हेमंत सोरेन कांग्रेस कोटे के किसी मंत्री को यह पद सौंप सकते हैं। इसके अलावा, एक और संभावना यह भी जताई जा रही है कि हेमंत सोरेन अपनी पत्नी और विधायक कल्पना सोरेन को मंत्रिमंडल में शामिल कर सकते हैं, या यदि कोई और तैयार नहीं हुआ तो वे स्वयं इस मंत्रालय का प्रभार अपने पास रख सकते हैं। देखना यह होगा कि क्या यह सिलसिला यहीं रुकता है या फिर यह अंधविश्वास की कहानियां और भी गहरी होती जाती हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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