बांकीपुर उपचुनाव: कैसे '14 फीसदी' के समीकरण ने चमकाई अभिषेक सिन्हा बंटी की किस्मत, बीजेपी के इस फैसले के पीछे की पूरी कहानी बिहार एक महीने पहले 58
बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी ने अभिषेक सिन्हा बंटी को अपना उम्मीदवार बनाया है। जानिए आखिर किस तरह पार्टी ने अपने समर्पित कार्यकर्ता पर दांव खेलकर जातीय समीकरणों को साधा है।

बिहार के राजनीतिक गलियारों में इस समय पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव की सरगर्मी चरम पर है। इस बेहद महत्वपूर्ण और हाईप्रोफाइल सीट पर 30 जुलाई को मतदान होना है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने काफी मंथन के बाद आखिरकार इस सीट के लिए अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर दी है। पार्टी ने किसी बड़े या नामचीन चेहरे के बजाय अपने एक जमीनी और निष्ठावान कार्यकर्ता अभिषेक सिन्हा उर्फ बंटी पर भरोसा जताया है। इस घोषणा के बाद से ही राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर टिकट की दौड़ में शामिल कई दिग्गज नेताओं को पछाड़कर अभिषेक सिन्हा बंटी ने यह बाजी कैसे मारी। इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प गणित काम कर रहा है, जिसे '14 फीसदी का खेल' कहा जा रहा है।

क्या है 14 फीसदी का यह पूरा समीकरण?

बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का चुनाव हमेशा से ही सामाजिक समीकरणों और जातीय गणित के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। इस सीट पर सबसे निर्णायक भूमिका कायस्थ मतदाताओं की मानी जाती है, जिनकी आबादी कुल मतदाताओं में करीब 14 फीसदी है। दरअसल, यह सीट पहले बीजेपी के वरिष्ठ नेता, राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद नितिन नवीन के पास थी। उनके राज्यसभा जाने के कारण यह सीट खाली हुई और यहां उपचुनाव कराने की स्थिति बनी। बीजेपी इस सीट पर अपने पुराने और मजबूत सामाजिक समीकरण को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देना चाहती थी। यही वजह रही कि पार्टी ने एक बार फिर कायस्थ समाज के ही प्रतिनिधि पर दांव लगाना उचित समझा। अभिषेक सिन्हा बंटी इसी समाज से आते हैं और संगठन में उनकी गहरी पैठ है। जातीय गणित और पार्टी संगठन में उनकी पुरानी पकड़, इन दोनों कारकों ने मिलकर उन्हें टिकट की इस रेस में सबसे आगे खड़ा कर दिया।

बांकीपुर विधानसभा का जातीय गणित

बांकीपुर सीट की राजनीतिक तस्वीर को समझने के लिए यहां के सामाजिक और जातीय आंकड़ों पर नजर डालना बेहद जरूरी है। इस क्षेत्र में विभिन्न जातियों की हिस्सेदारी कुछ इस प्रकार मानी जाती है:

  • कायस्थ: 14%
  • यादव: 12%
  • मुस्लिम: 9%
  • चंद्रवंशी: 9%
  • वैश्य: 9%
  • दलित: 8%
  • भूमिहार: 8%
  • ब्राह्मण: 7%
  • राजपूत: 5%
  • कुर्मी: 5%
  • कुशवाहा: 3%
  • अन्य जातियां: 11%

इन आंकड़ों से साफ है कि कायस्थ मतदाता यहां सबसे बड़ी आबादी के रूप में मौजूद हैं। यही कारण है कि बीजेपी ने अपने इस मजबूत वोट बैंक को सहेजने के लिए अभिषेक सिन्हा पर दांव लगाया है।

बूथ अध्यक्ष से उम्मीदवार बनने तक का सफर: कौन हैं अभिषेक सिन्हा बंटी?

अभिषेक सिन्हा बंटी कोई नए या बाहरी नेता नहीं हैं, बल्कि वे पिछले करीब 27 वर्षों से बीजेपी के एक बेहद सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं। उनका राजनीतिक सफर बेहद प्रेरणादायक है, जिसे पार्टी ने टिकट देकर सम्मानित किया है। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत संगठन के सबसे निचले पायदान यानी एक बूथ अध्यक्ष के रूप में की थी। इसके बाद उन्होंने संगठन में सीढ़ी-दर-सीढ़ी तरक्की की:

  • उन्होंने सबसे निचले स्तर यानी बूथ अध्यक्ष के रूप में अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी।
  • इसके बाद वे मंडल मंत्री बने।
  • फिर उन्हें मंडल महामंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई।
  • वे बीजेपी पटना महानगर युवा मोर्चा के अध्यक्ष भी रहे।
  • वर्तमान में वे बीजेपी युवा मोर्चा, बिहार के प्रदेश उपाध्यक्ष के रूप में संगठन में लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

इतने लंबे समय तक पार्टी के विभिन्न कार्यक्रमों और चुनावी अभियानों में लगातार सक्रिय रहने का इनाम आखिरकार उन्हें मिला है। बीजेपी ने एक आम कार्यकर्ता को इतनी बड़ी जिम्मेदारी देकर अपने पूरे कैडर को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी के प्रति वफादारी और निरंतर मेहनत करने वालों को हमेशा बड़ा मौका मिलता है।

त्रिकोणीय मुकाबले में फंसा पेंच, राह नहीं होगी आसान

बांकीपुर का यह उपचुनाव केवल बीजेपी के लिए ही नहीं, बल्कि बिहार की पूरी राजनीति के लिए एक बड़ा इम्तिहान साबित होने जा रहा है। यहां मुकाबला बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय होने की उम्मीद है। बीजेपी के अभिषेक सिन्हा बंटी का मुकाबला मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की उम्मीदवार रेखा गुप्ता से होगा, जो मैदान में पूरी मजबूती के साथ खड़ी हैं। इसके साथ ही, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की सक्रियता भी इस मुकाबले को एक नया मोड़ दे रही है। इस त्रिकोणीय मुकाबले ने पटना की इस हाईप्रोफाइल सीट को पूरे बिहार की सबसे चर्चित और रोमांचक चुनावी जंग में तब्दील कर दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या बंटी अपने 27 साल के सांगठनिक अनुभव और 14 फीसदी के इस जातीय समीकरण के सहारे बीजेपी के इस अभेद्य किले को बचाने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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