बिहार
2 घंटे पहले
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विचारों
आरक्षण के मुद्दे पर एनडीए में टकराव
बिहार की राजनीति में इन दिनों आरक्षण के मुद्दे पर घमासान मचा हुआ है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के दो प्रमुख घटक दलों के नेताओं, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और बिहार सरकार के मंत्री संतोष कुमार सुमन के बीच चल रही तकरार अब व्यक्तिगत और राजनीतिक स्तर पर आ गई है। इस पूरी बहस की शुरुआत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में 'क्रीमी लेयर' और 'कोटे में कोटा' को लेकर हुई चर्चा से हुई, जिसने अब एक गंभीर सियासी रूप ले लिया है। चिराग पासवान ने हाल ही में जीतन राम मांझी और संतोष सुमन को निशाने पर लेते हुए उनसे इस्तीफा देने की बात कही थी, जिसके जवाब में संतोष सुमन ने अब उन्हें चुनौती दी है।
संतोष सुमन की दो टूक: पहले आप इस्तीफा दें
चिराग पासवान द्वारा इस्तीफा मांगे जाने के बयान पर पलटवार करते हुए हम पार्टी के अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि चिराग पासवान वास्तव में इस मामले पर गंभीर हैं, तो उन्हें इसकी शुरुआत खुद से करनी चाहिए। संतोष सुमन ने चुनौती दी कि अगर चिराग पासवान पहले इस्तीफा देकर सार्वजनिक रूप से सामने आते हैं, तो वह भी उनके साथ तुरंत अपना इस्तीफा देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि चिराग पासवान उनके छोटे भाई जैसे हैं, लेकिन राजनीति में उनकी पार्टी का जनाधार और उनका राजनीतिक इतिहास काफी गहरा है। उन्होंने कहा कि उनके पास तीसरी पीढ़ी का राजनीतिक अनुभव है, इसलिए चिराग को अपनी बात रखने से पहले जमीनी हकीकत को समझना चाहिए।
क्रीमी लेयर बनाम उप-वर्गीकरण
संतोष सुमन ने चिराग पासवान से अपील की है कि वे उनके बयानों और सोशल मीडिया पर किए गए ट्वीट को ध्यान से पढ़ें। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी मांग किसी भी तरह से आरक्षण को समाप्त करने या एससी-एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर को लागू करने की नहीं है। संतोष सुमन के अनुसार, लोग उनकी बात को गलत तरीके से समझ रहे हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि क्रीमी लेयर और आरक्षण के भीतर वर्गीकरण यानी 'कोटे में कोटा' दो बिल्कुल अलग मुद्दे हैं, जिन्हें आपस में मिलाना पूरब और पश्चिम को जोड़ने जैसा है। उन्होंने तर्क दिया कि क्रीमी लेयर का मुद्दा अलग है और इसके परिणाम भी अलग होंगे, लेकिन फिलहाल उनकी प्राथमिकता समाज के सबसे पिछड़े समुदायों को आरक्षण का वास्तविक लाभ दिलाना है।
आखिर संतोष सुमन क्या चाहते हैं?
इस पूरे विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि संतोष सुमन वास्तव में क्या मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि एससी-एसटी आरक्षण का जो लाभ अब तक दिया जा रहा है, वह उन सभी समुदायों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है जो वास्तव में हकदार हैं। उन्होंने यह सवाल उठाया है कि क्या शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ सभी वर्गों तक बराबर पहुंच रहा है। उनके तर्क के अनुसार, कुछ समुदाय अब भी विकास की मुख्यधारा से काफी पीछे हैं। इसलिए, आंकड़ों और वास्तविक स्थिति की समीक्षा होनी चाहिए। वे एससी-एसटी आरक्षण के भीतर एक उप-वर्गीकरण करने की पैरवी कर रहे हैं ताकि जो लोग अब तक वंचित रह गए हैं, उन्हें कोटे में कोटा की व्यवस्था के जरिए उनका अधिकार मिल सके।
आरक्षण विरोधी होने के आरोप पर सफाई
संतोष सुमन ने आरक्षण विरोधी होने के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। उन्होंने सवाल किया कि जो व्यक्ति समाज में सबसे पीछे खड़े लोगों के हक की बात कर रहा है, उसे आरक्षण विरोधी कैसे करार दिया जा सकता है? उन्होंने कहा कि उनकी मंशा किसी का भी आरक्षण छीनने या उसे खत्म करने की बिल्कुल नहीं है। वे केवल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सामाजिक न्याय की अवधारणा के तहत हर उस व्यक्ति को हिस्सेदारी मिले, जिसे अभी तक उसका वाजिब हक नहीं मिला है। उन्होंने इसे एक वास्तविक भागीदारी और न्याय का मुद्दा बताया है।
जीतन राम मांझी की भूमिका और एनडीए की राजनीति
इस पूरे विवाद में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की भूमिका भी काफी अहम मानी जा रही है। चिराग पासवान ने जिस तरह से जीतन राम मांझी के रुख पर सवाल उठाए थे, उससे एनडीए के भीतर मतभेद साफ नजर आने लगे हैं। चिराग पासवान जहां आरक्षण के वर्तमान स्वरूप में किसी भी तरह के बदलाव या क्रीमी लेयर जैसी चर्चा का विरोध कर रहे हैं, वहीं मांझी और उनके पुत्र संतोष सुमन आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण के समर्थक हैं। यह विचारधाराओं की लड़ाई अब एनडीए के अंदरूनी समीकरणों को प्रभावित कर रही है।
बहस भावनाओं पर नहीं, आंकड़ों पर हो
संतोष सुमन ने चिराग पासवान को सलाह दी है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर बहस भावनाओं में बहकर या राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें आंकड़ों पर गौर करना चाहिए कि आखिर कौन से समुदाय आरक्षण का लाभ लेने में सक्षम रहे हैं और कौन से समुदाय आज भी पीछे छूटे हुए हैं। जब तक सही आकलन नहीं होगा, तब तक किसी व्यवस्था पर अंतिम फैसला लेना मुश्किल है। अंत में, संतोष सुमन ने फिर दोहराया कि इस्तीफे की चुनौती का सामना करने के लिए वह तैयार हैं, बशर्ते चिराग पासवान पहले पहल करें। इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में एक नए विवाद को जन्म दे दिया है, जिसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
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